<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962</id><updated>2012-02-12T10:04:29.871-08:00</updated><category term='ISSUE'/><category term='samvedna'/><category term='vichar'/><category term='सम सामयिक'/><title type='text'>The Power of Truth</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/'/><link 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से पहले सुधार जरूरी</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-uxkD8Lgs_fU/Tzf-6g3cgqI/AAAAAAAAAI0/jout1YjwrFI/s1600/vote.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 285px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-uxkD8Lgs_fU/Tzf-6g3cgqI/AAAAAAAAAI0/jout1YjwrFI/s320/vote.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5708311333923750562" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनिवार्य वोटिंग पर एक बार फिर से बहस छिड़ गई है, इस बार बहस की शुरूआत की है वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने। मतदाता दिवस के मौके पर आडवाणी ने गिरते वोटिंग प्रतिशत का हवाला देकर वोटिंग को अनिवार्य बनाने की बात कही। इस तरह की बहस पहली बार कई बार छिड़ चुकी हैं मगर सबका नतीजा एक ही रहा, ये बहस भी ज्यादा देर तलक नहीं चल पाएगी। लेकिन फिर भी सवाल तो है कि क्या वोटिंग को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर पिछले कुछ सालों के आंकड़े निकाले जाएं तो इस सवाल का जवाब हां में देने की जरूरत खुद ब खुद महसूस होगी। वार्ड स्तर पर होने वाले चुनाव ही नहीं, देश और राज्यों की दिशा तय करने वाले महाचुनावों में भी जनता की भागीदारी नाम मात्र की है। वोटिंग का प्रतिशत 40-50 के आसपास ही सिमटकर रह गया है। इसके पीछे कई कारण हैं, सबसे पहला तो यही कि हमारे देश के नेताओं से लोगों का विश्वास उठ गया है। उन्हें लगता है कि पूरी की पूरी सियासी जमात एक जैसी है, चाहे किसी को भी वोट दो तस्वीर बदलने वाली नहीं है। इसलिए वो लोकतंत्र का हिस्सा बनने के बजाए घर की चारदीवारी के भीतर रहना ज्यादा पसंद करता है। ज्यादातर राजनीतिज्ञों का खुद का चरित्र इस काबिल नहीं है कि जनता को वोट डालने के लिए प्रेरित कर सकें। आलम ये है कि विधानसभाओं से लेकर संसद तक में अपराधिक छवि वाले नेताओं का बोलबाला है। अफसोस की बात कि घटने के बजाए ये प्रतिशत दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है। उत्तर प्रदेश में जारी सियासी द्वंद्व का ही उदाहरण लें, यहां हर पार्टी को दागियों से प्यार है। भ्रष्टाचार और साफ-सुथरी राजनीति की बात करने वाली पार्टियां भी दागियों को टिकट थमाए बैठी हैं। कांग्रेस के खाते में 26 दागी हैं, इतने ही भाजपा के साथ हैं। वहीं सपा ने महज दो कम यानी 24 दागियों को टिकट दिया है। भ्रष्टाचार के आरोप में मंत्रियों को सत्ता से बेदखल करने वाली मायावती की पार्टी बसपा भी इस मामले में दूसरों से पीछे नहीं है। दरअसल, सियासी दलों के लिए महज जीत मायने रखती है और इसके लिए वो किसी को भी उम्मीदरवार बना सकते हैं। बड़े-बड़े दावे करने वाले दल सिस्टम के हिसाब से अपनी नीतियों में बदलाव कर लेते हैं। यानी यूपी जैसे राज्य जहां जाति और दबंगई के गणित के आधार पर वोट पड़ते हैं वहां, व्यक्तिगत योगयता भी जाति और दबंगई होती है। ऐसे में वोटिंग का प्रतिशत बढ़े भी तो कैसे? दागियों को सियासत में आने से रोकने के लिए अब तक कुछ खास नहीं किया गया है। मौजूदा नियमों के मुताबिक अपराध सिद्ध होने पर ही किसी को चुनाव लडऩे से रोका जा सकता है। हमारी न्याय व्यवस्था की रफ्तार से सब वाकिफ हैं। मामूली मामलों के निपटारे में ही सालों लग जाते हैं। जब तक किसी नेता के खिलाफ फैसला आने का आधार तय हो, तब तक वो इस स्थिति में आ जाता है कि फैसले को प्रभावित कर सके। गंभीर आरोपों का सामना कर रहे ऐसे इतने नेता हैं जिन्हें सजा हुई। राजा, कलमाड़ी जैसे मामले बिरले ही सुनने में आते हैं। इन दोनों को भी तिहाड़ की यात्रा कोर्ट की सख्ती की वजह से करनी पड़ी, वरना मामला कब का रफा-दफा हो गया होता। राजा और कलमाड़ी ने सीधे देश के खजाने और उसकी छवि को नुकसान पहुंचाया था, इसलिए कॉमनवेल्थ और स्पेक्ट्रम घोटाले की गूंज सुनाई देती रही। अगर बलात्कार, हत्या जैसे खलिस अपराधी मामले होते तो न इतना शोर होता और न इतनी बड़ी कार्रवाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर राजनीतिक पार्टी इस नियम की कमजोरी का फायदा उठाकर दागियों को जनता के प्रतिनिधि की कुर्सी तक पहुंचाती है। कायदे में होना तो ये चाहिए कि दागियों को चुनाव लडऩे की इजाजत ही न मिले। और यदि ऐसा नहीं हो पाता तो राजनीतिज्ञों से संबंधित मामलों के निपटारे की समय सीमा निधार्रित की जानी चाहिए। महज छह महीने के भीतर ऐसे मामले निपटाए जाएं। जनता को पोलिंग बूथ तक खींचने के लिए ये सबसे पहला कदम है। अनिवार्य वोटिंग की मांग केवल भारत में ही नहीं उठी है, कई देशों में इसे लेकर बहस चल रही है और कई देश इसपर अमल भी कर चुके हैं। गुजरात में ही निचले स्तर के चुनावों में वोटग को अनिवार्य किया गया है। निश्चित तौर पर वोटिंग को अनिवार्य बनाने से मतदान का प्रतिशत बढ़ेगा, लोग कार्रवाई के डर से पोलिंग बूथ तक पहुंचेंगे ही। मैं व्यक्तिगत तौर पर वोटिंग को अनिवार्य बनाए जाने का पक्षधर हूं, लेकिन इससे पहले व्यवस्था में सुधार बेहद जरूरी है। बगैर सुधार के ये फैसला भी बोझ बन जाएगा। मजबूरी में किया गया काम, परिणाम के लिहाज से अच्छा नहीं होता। लोग वोट देने इसलिए नहीं जाएंगे कि उन्हें देश का भविष्य निधार्रित करने में भागीदारी निभानी है, बल्कि इसलिए जाएंगे कि जुर्माना न भरना पड़े। सुधार के साथ-साथ वोटिंग प्रक्रिया को आसान बनाने की भी जरूरत है। आज के वक्त में जब हर काम ऑनलाइन होता है तो वोटिंग क्यों नहीं? अमूमन नौकरीपेशा लोग एक राज्य से दूसरे राज्य में जाते रहते हैं, ऐसे में उनके पास मताधिकार का प्रयोग न करने के अलावा कोई और चारा नहीं रह जाता। अगर ऑनलाइन वोटिंग की सुविधा हो तो ऐसे लोगों को भी मताधिकार का प्रयोग करने का अवसर मिल जाएगा। आजकल का युवा जागरुक है, इसमें कोई दोराय नहीं लेकिन जागरुक होने के साथ-साथ वो अत्याधिक टेक-सेवी भी है। उसे हर काम एक क्लिक पर करने की आदत है, जब रेलवे से लेकर सड़क परिवहन तक तकनीक के हिसाब से अपने को परिवर्तित कर रहे हैं तो चुनाव आयोग को भी आगे आना चाहिए। चुनाव के दौरान अव्यवस्था का आलम, लंबी कतारें, निजी, सार्वजनिक परिवहन पर पाबंदी जैसी बातें वोटरों को पोलिंग बूथ से दूर रहने के लिए मजबूतर करती हैं। ऑनलाइन वोटिंग की सुविधा होगी तो वो घर से बैठे-बैठे ही अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकेगा। ये सिर्फ कहने की बातें हैं कि इतनी बड़ी जनसंख्या वाले देश में इतना बड़ा बदलाव आसान नहीं होगा। बदलाव कभी भी आसान नहीं होता, पुरानी व्यवस्था को बदलने में परेशानियों का सामना करना ही पड़ता है, लेकिन क्या परेशानियों से डरकर आगे बढऩा छोड़ देना चाहिए? जिस तरह से ऑनलाइन टिकट बुक कराई जा सकती है, पासपोर्ट के लिए आवेदन किया जा सकता है वैसे वोट क्यों नहीं डाला जा सकता? चुनाव आयोग को इस बारे में भी ध्यान देने की जरूरत है कि वोटर बनाने की प्रक्रिया आसान होने के साथ व्यवस्थित भी हो। कहने को तो घर-घर जाकर वोटर बनाए जाते हैं, लेकिन इसकी पेचीदगियों से जिसका सामना होता है वही समझ सकता है कि आसान दिखने वाली इस प्रक्रिया में कितने पेंच हैं। मैं अपनी ही बात करूं तो, 30 साल के जीवन में मुझे सिर्फ वो बार वोटिंग का सौभागय प्राप्त हुआ है। वो भी विधानसभा चुनावों में। कई वोटर लिस्ट में नाम लिखवाने के बाद भी पोलिंग बूथ पर नाम नदारद मिला। जब मतदाता फोटो परिचय पत्र बने तो फोटो भी खिंचवाई लेकिन अगले चुनाव में फिर नाम नदारद मिला। राज्य बदलने के बाद भी हालात नहीं बदले, यहां भी अनुभव पुराने जैसा रहा। मध्यप्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर काफी वक्त पहले ऑनलाइन आवेदन भी किया लेकिन आज तक कोई हलचल नहीं हुई। निर्वाचन अधिकारी को व्यक्तिगत तौर पर समस्या से अवगत कराया लेकिन इस कवायद का भी कोई परिणाम नहीं आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी लचर प्रक्रिया से लोगों को वोटिंग के प्रति प्रोत्साहित कैसे किया जा सकता है। व्यवस्था में सुधार सबसे जरूरी है, अगर इसके बाद भी वोटिंग का प्रतिशत नहीं बढ़ता तब वोटिंग को अनिवार्य किया जाना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-3080558726260662615?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/3080558726260662615/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=3080558726260662615' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/3080558726260662615'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/3080558726260662615'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2012/02/blog-post.html' title='अनिवार्य वोटिंग से पहले सुधार जरूरी'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-uxkD8Lgs_fU/Tzf-6g3cgqI/AAAAAAAAAI0/jout1YjwrFI/s72-c/vote.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-8366834745537921189</id><published>2011-12-26T10:01:00.000-08:00</published><updated>2011-12-26T10:02:45.361-08:00</updated><title type='text'>असहमति का ये अंदाज कितना जायज</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-1D6Cqb_Vlt0/Tvi2tiDNCDI/AAAAAAAAAIY/iJi5VC5ySrQ/s1600/beniprasadvermab.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-1D6Cqb_Vlt0/Tvi2tiDNCDI/AAAAAAAAAIY/iJi5VC5ySrQ/s320/beniprasadvermab.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5690499022533232690" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीरज नैयर&lt;br /&gt;मानसिक दीवालियापन क्या होता है, ये कांंग्रेसी नेता बहुत अच्छे से समझते हैं। यूं तो लगभग हर राजनीतिज्ञ कभी न कभी इस स्थिति से गुजरता है लेकिन जिस तरह से कांग्रेसी अन्ना हजारे के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं उससे कांग्रेस के बिगड़ते मानसिक संतुलन का आभास स्वत: ही हो जाता है। पहले दिग्विजय सिंह अन्ना के खिलाफ आगे आए, फिर कमान मनीष तिवारी ने संभाली अब केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद जहर उगल रहे हैं। बीते कुछ दिनों में ही बेनी प्रसाद कई बार अन्ना पर हमला बोल चुके हैं, इन हमलों के लिए उन्होंने जिन शब्दों का इस्तेमाल किया वो गंदी राजनीति के परिचायक हैं। बेनी ने अन्ना को पागल बूढ़े से लेकर भगोड़ा फौजी तक कह डाला, अफसोस की बात तो ये है कि उन्हें इसका कोई पछतावा भी नहीं है। उल्टा दिन ब दिन उनके शब्दों का स्तर और गिरता जा रहा है। बेनी का निजी जीवन कैसा रहा ये अलग बात है, लेकिन एक केंद्रीय मंत्री के तौर पर इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल कहां तक जायज है ये सवाल कांग्रेस से पूछा जाना चाहिए। बेहद अफसोस की बात है कि हमारे देश में सरकार या सांसदों के खिलाफ आम आदमी के शब्दों को विशेषाधिकार हनन मान लिया जाता है, लेकिन सांसद या सरकार में बैठे नेताओं को कुछ भी बोलने की आजादी है। क्या आम आदमी का कोई विशेषाधिकार नहीं है, क्या इज्जत और सम्मान पर महज माननीयों का कॉपीराइट है? मतभिन्नता अलग बात है, किसी की बातों-विचारों से असहमत हुआ जा सकता है। लेकिन इस असहमति को अपशब्दों में बयां करना कितना उचित है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गली-मोहल्ले के मवाली से तो उम्मीद नहीं की जा सकती कि वो सभ्य व्यक्ति की तरह पेश आए।  महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग एवं बुद्धिजीवियों से ही ऐसी अपेक्षा होती है, लेकिन इनका नैतिक और वैचारिक पतन निश्चित तौर पर चिंता का विषय है। बेनी प्रसाद की बदजुबानी की असल वजह, अन्ना द्वारा राहुल का विरोध है। लोकपाल बिल पर अन्ना ने राहुल को सीधे तौर पर टारगेट किया, इसे लेकर ही बेनी सरीखे कांग्रेसी मर्यादाओं को तार-तार करने पर तुले हैं। अन्ना ने साफ, सरल , स्पष्ट और सभ्य शब्दों में राहुल को कमजोर लोकपाल के लिए जिम्मेदार ठहराया, लेकिन वो अपनी मर्यादा नहीं भूले। उन्होंने मनमोहन सिंह या किसी दूसरे मंत्री को भी कठघरे में खड़ा किया तो शब्दों के इस्तेमाल में सतर्कता बरती, मगर कांग्रेस नेता शुरूआत से ही बदजुबानी और बेहयाई की हदें पार करते आ रहे हैं। सबसे ज्यादा ताज्जुब की बात तो ये है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी अपने नेताओं के इस आचरण को उनकी निजी राय बताकर पल्ला झाड़ लेती है। क्या बेनी, दिग्गी और तिवारी का विषवैमन उनकी निजी राय है, अगर  है, तो क्या कांग्रेस को उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं करनी चाहिए। जुबान कभी-कभी फिसलती है, पर जिस तरह से दिग्गी, बेनी बोलते आए हैं उसे जुबान फिसलना नहीं जुबान की खाज मिटाना कहा जाएगा। कांग्रेस अलाकमान की खामोशी से साफ जाहिर होता है कि असहमति के इस अंदाज को उसका समर्थन है। बेनी अन्ना को फौज का भगोड़ा बताते हैं, लेकिन अपनी पृष्ठिभूमि में झांकने की हिम्मत नहीं करते। बेनी और उनके बेटे पर हत्या के प्रयास का मामला चल रहा है, तो क्या उन्हें अपराधी कहकर संबोधित नहीं किया जाना चाहिए।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेनी और दिग्गी अन्ना को संघ का एजेंट बताने पर तुले हैं, दिग्गी ने तो एक समाचार पत्र में छपी खबर का हवाला देते हुए अपने आरोपों को सच साबित करने की कोशिश की है। इस तस्वीर में अन्ना संघ पदाधिकारी नानाजी के साथ नजर आ रहे हैं, लेकिन एक तस्वीर ऐसी भी है जिसमें दिग्विजय खुद नानाजी के साथ हैं। मगर उनके और कांग्रेस के लिए दोनों के मायने बिल्कुल अलग हैं। यदि वो तस्वीर अन्ना और संघ के रिश्तों को उजागर करती है तो फिर दिग्गी खुद भी संघ के एजेंट हुए। दरअसल, कांग्रेस ये साबित करना चाहती है कि अन्ना भाजपा और संघ के इशारे पर उसे निशाना बना रहे हैं। इस कोशिश में वो इतना रम गई है कि सही- गलत में अंतर भी नजर नहीं आ रहा है। अलबत्ता तो किसी के साथ खड़े होने या मुलाकात करने से उनके बीच में संबंध स्थापित नहीं हो जाता और यदि अन्ना का संघ से जुड़ाव रहा भी है तो इसमें हो-हल्ले वाली बात क्या है। संघ को तो कांग्रेसी ऐसे प्रचारित करते हैं जैसे वो कोई आतंकवादी संगठन हो। गनीमत है कि सरकार या कांग्रेसियों को अन्ना के किसी पाकिस्तानी से बातचीत/ मुलाकात के सबूत नहीं मिले, वरना उन्हें देशद्रोही भी करार दे दिया जाता। अलग-अलग विचारधाराओं के राजनेता खुद भी जब किसी समारोह में मिलते हैं तो खिलखिलाकर बातें करते हैं, तो क्या वो एक-दूसरे के एजेंट हो गए। तमाम मंत्री, नेता नरेंद्र मोदी के गले लगते हैं, ऐसे में तो उन्हें भी गुजरात दंगों का गुनाहगार ठहराया जाना चाहिए। पीडीपी प्रमुख मेहबूबा मु$फ्ती ने सरकारी बैठक में मोदी की तारीफों के पुल बांधें थे, सरकार के पास इसके रिकॉर्ड भी मौजूद हैं। फिर क्यों नहीं उनके खिलाफ जांच शुरू कराई जाती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बात को कांग्रेस भी अच्छे से जानती है कि उसके नेता जिन तथ्यों को आधार बनाकर अन्ना संघ में तार जोडऩे में लगे हैं, उनमें कोई दम नहीं। लेकिन चूंकि अन्ना को बदनाम करना है, इसलिए कोशिशों को परवान चढ़ाया जा रहा है। अन्ना के पहले आंदोलन के वक्त भी सरकार ने उन्हें गलत साबित करने के लिए सारे रिकॉर्ड खंगाल डाले, मगर उसे ऐसा कुछ भी नहीं मिला जिसे अन्ना के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके। तब भी अन्ना के लिए भगोड़ा जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया, मगर सेना ने ऐसे आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। बावजूद इसके बेनी प्रसाद फिर से अन्ना पर उंगली उठा रहे हैं,  कांग्रेस अगर समझती है कि इस तरह की ओछी राजनीति से वो जनता का समर्थन प्राप्त कर लेगी तो ये उसकी भूल है। जनता इस बात को बखूबी जानती है कि सरकार की स्थिति खिसयानी बिल्ली जैसी है, वो खंबा नोचेगी ही। इसलिए बेहतर होगा कि कांग्रेस अन्ना पर कीचछ उछालने के बजाए सहमति का रास्ता खोजे। बड़ी से बड़ी मुश्किल संवाद के रास्ते हल की जा सकती है। टीम अन्ना बातचीत की मेज पर आने को तैयार है, सरकार को भी अपना अहंकार छोड़कर आगे बढऩा चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-8366834745537921189?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/8366834745537921189/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=8366834745537921189' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/8366834745537921189'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/8366834745537921189'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='असहमति का ये अंदाज कितना जायज'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-1D6Cqb_Vlt0/Tvi2tiDNCDI/AAAAAAAAAIY/iJi5VC5ySrQ/s72-c/beniprasadvermab.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-4729666768033913042</id><published>2011-11-06T08:18:00.001-08:00</published><updated>2011-11-06T08:19:09.544-08:00</updated><title type='text'>बेहयाई न पालो मनमोहनजी जनता भी ऐसे ही पेश आएगी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-_1FIYvLjvFE/TrazdLPgCfI/AAAAAAAAAIA/l7yDrH0fH1I/s1600/Manmohan-hint%2BSingh.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-_1FIYvLjvFE/TrazdLPgCfI/AAAAAAAAAIA/l7yDrH0fH1I/s320/Manmohan-hint%2BSingh.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5671918094535100914" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीरज नैयर&lt;br /&gt;सरकार के मुखिया कहते हैं कि महंगाई बढऩे की वजह आम आदमी है, यानी वो आम आदमी जिसके वोटों के बल पर कांग्रेस सत्ता में आई और मनमोहन पीएम बने खुद ही महंगाई बढ़ा रहा है और खुद ही आंसू बहा रहा है। बकौल मनमोहन, लोग पहले के मुकाबले ज्यादा कमाने लगे हैं, ज्यादा कमा रहे हैं इसलिए ज्यादा खा रहे हैं नतीजतन महंगाई बढ़ रही है। कल तक सीधे साधे अर्थशास्त्री के तौर पर पहचाने जाने वाले मनमोहन इतने बेहया हो गए हैं कि इसे भी सरकार की उपलब्धि बता रहे हैं। उनको लगता है कि सरकार की सामाजिक सुधारों वाली योजनाओं के बल पर ही गरीबों के हाथ में पैसा आने लगा है। इस बयान के बाद तो गुस्से से ज्यादा सरकार के इस मुखिया की अक्ल पर तरस आती है, कमाई बढ़ी है और निश्चित तौर पर बढ़ी है, लेकिन किसकी। हर आदमी को तो महंगाई भत्ता नहीं मिलता, सरकारी मुलाजिमों को वोट की चाह में सरकार महंगाई से मुकाबले के लिए कुछ ताकत दे देती है मगर बाकी का क्या। उन बेचारों को तो जितनी कमाई है उसी में काम चलाना है, और वैसे भी एक औसत आम आदमी की तनख्वाह में सालाना कितना इजाफा होता है, ये बात अब अच्छे से जानते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल बेशर्मी की चादर ओढ़ चुके मनमोहन और उनके मंत्रियों के लिए महंगाई डायन अब भी फिल्मों तक ही सीमित है, गाड़ी पर लाल बत्ती लगने के बाद से उन्होंने बाजार का हाल जानना ही बंद कर दिया होगा। फिर उन्हें चढ़ती कीमतों से मायूस होते आम आदमी की मुझाई सूरत भला क्या नजर आएगी। मनमोहन खुद किसी प्राइवेट नौकरी से घर की गाड़ी चला रहे होते तो उन्हें आटे-दाल के भाव पता चलते, लेकिन अफसोस कि ऐसी स्थिति कभी आने वाली नहीं है। दूसरी बार सत्ता संभालने के बाद यूपीए सरकार का पूरा कुनबा लगता है अपने घर भरने में ही लगा हुआ है, यदि ऐसा न होता तो पूरी सरकार में कोई एक तो अपनी गलतियों को स्वीकारता। सोनिया गांधी, राहुल गांधी से लेकर शरद पवार, प्रणब मुखर्जी और मनमोहन सिंह तक सब अपनी नाकामयाबियों के लिए कभी मौसम तो कभी आम आदमी की संपन्नता को दोष देते रहे हैं। पिछले मौसम में कहा गया, बादलों की बेरुखी ने महंगाई को आग लगाई और अब जनता की आमदनी पर नजरें गढ़ाई जा रही हैं। चंद रोज पहले कांग्रेस के भावी प्रधानमंत्री ने महंगाई के लिए गठबंधन की मजबूरी का रोना रोया था, रोना रोते-रोते अपनी बात साबित करने के लिए वो इंदिरा गांधी के कार्यकाल तक पहुंच गए थे। वो ये बताना चाहते थे कि उस वक्त एक पार्टी का राज होने के चलते कीमतें आसमान नहीं जमीं पर थीं, लेकिन बेचारे राहुल शायद भूल गए हैं कि उनकी दादी के शासनकाल में महंगाई और भ्रष्टाचार का आलम मौजूदा सरकार जैसा ही था। तभी तो 'देखो इंदिरा का खेल, खा गई राशन, पी गई तेलÓ जैसे नारों की गूंज कांग्रेस नेतृत्व की परेशानी बन गई थी। महंगाई और भ्रष्टाचार रोकने के लिए यूपीए सरकार ने सिर्फ और सिर्फ वादे किए, ठीक ऐसे ही वादे उसके नेताओं ने चुनावी संग्राम के वक्त जनता के आगे हाथ जोड़कर किए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; कांग्रेस नीत गठबंधन ने जब सत्ता संभाली महंगाई का मिजाज इतना तल्ख नहीं था, हालांकि राजग के कार्यकाल में भी प्याज ने आंसू निकाले मगर हालत बेकाबू जैसे फिर भी नहीं थे। आटे-दाल से लेकर फल-सब्जियों तक आज सबकुछ आम आदमी की पहुंच से दूर होता जा रहा है। दूध जैसे पद्धार्थ की कीमत ही चार सालों में सौ प्रतिशत बढ़ी है, जबकि इन्हीं चार सालों में इसके उत्पादन में चार प्रतिशत का इजाफा हुआ है। चार साल पहले जो घी 150-160 के आसपास था, आज 300 रुपए प्रति किलो के करीब बिक रहा है। आमतौर पर माना जाता है कि सर्दियों के वक्त सब्जियों के दाम नीचे आ जाते हैं, लेकिन इस बार पूरी सर्दियां प्याज और टमाटर के दाम सुनते-सुनते ही निकल गईं, प्याज की कीमतों के लिए सरकार ने नासिक में होने वाली बरसात को दोषी बताया। जबकि वहां के किसानों तक ने बारिश के नुकसान को इतना बड़ा मानने से मना कर दिया था। जब भी महंगाई की बात आती है सरकार उत्पादकता और मांग के अंतर का रोना रोने लगती है, पर हकीकत में उचित भंडारण के अभाव में हर साल लाखों टन अनाज, फल-सब्जियां सड़ जाती हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार खुद भी सालाना 58 हजार करोड़ रुपए का अनाज बर्बाद होने की बात स्वीकार चुकी है। ऐसे में कम उत्पादन का सवाल ही ऐसे उठता है, साफ है कि सरकार के मुखिया और उनके मंत्रियों की दिलचस्पी वातानुकूलित कमरों से बाहर निकलकर हालात का पता लगाने में बिल्कुल भी नहीं है। जिसके जैसे मन में आ रहा है, वो वैसे ही नीतियों-नियमों को तोड़मरोड़कर अपनी सेहत सुधारने में लगा है। पिछले साल जब चीनी की कीमतें सारे रिकॉर्ड तोडऩे पर अमादा थीं, तब ही सरकार की धन्ना सेठों का फायदा पहुंचाने वाली नीति उजागर हो गई थी। गन्ने की उपज सामान्य होने के बावजूद 12 रुपए की दर से तकरीबन 48000 टन चीनी का निर्यात किया गया। जब बाजार में चीनी की किल्लत से दाम आसमान पर पहुंचने लगे और विपक्ष हो-हल्ला करने लगा तब सरकार ने चीनी के आयात का फैसला लिया। ये आयात 27 रुपय प्रति किलो के हिसाब से किया गया। यानी जो चीनी हम सस्ते में दूसरे मुल्कों को दे रहे थे उसकी ही हमने दोगुने से ज्यादा कीमत चुकाई। प्याज के मामले में भी सरकार ने ऐसा ही किया, पहले पाकिस्तान आदि को भर-भर के प्याज पहुंचाई गई और बाद में उन्हीं से आयात करनी पड़ी। सरकार में बैठने वालों से ज्यादा अक्ल तो एक गृहणी में होती है, उसे पता होता है कि कौन सा सामान कब तक खत्म हो सकता है। बिन बुलाए मेहमानों की आवभगत के बावजूद वो घर की गाड़ी पटरी से उतरने नहीं देती, लेकिन अर्थशास्त्री कहलाने वाले मनमोहन और उनके दूसरे साथी इतना भी हिसाब नहीं रख सके कि अपना हिस्सा दूसरों को देने से कहीं हम खुद ही भूखे न रह जाएं। आयात-निर्यात के खेल में सरकार उन सालों की कसर पूरी कर रही है जो उसने सत्ता में आने के इंतजार में गुजारे। किसी भूखे को अगर खाना मिल जाए तो वो पेट भरने के बाद भी उसे तब तक खाता रहता है जब तक कि खाना खत्म न हो जाए, मनमोहन सरकार का हाल भी कुछ ऐसा ही लग रहा है। शायद उसे लगने लगा है कि भ्रष्टाचार और महंगाई के विस्फोटों के बाद उसका पुन: सत्ता में लौटना मुमकिन नहीं इसलिए जितना बटोर सकते हो बटोर लो। जिस सरकार को आम आदमी के लिए दी जाने वाली सब्सिडी ही बोझ लग रही हो, उसके खुद के मंत्री करोड़ों के घोटाले कर रहे हैं। यह मानना बहुत मुश्किल है कि इन घोटालों में वो बड़े-बड़े नाम शामिल नहीं होंगे जो कार्रवाई का ढोंग रच रहे हैं। कॉमनवेल्थ के करप्शन किंग कलमाड़ी और स्पेक्ट्रम के करप्ट राजा क्या अकेले बिना ऊपर वालों को विश्वास में लिए इतना बड़ा खेल कर सकते हैं, सोचने में ही अटपटा लगता है। कलमाड़ी तो साफ-साफ कह चुके हैं कि उन्होंने जो कुछ भी किया अकेले नहीं किया, फैसले सब मिल बैठकर लिया करते थे। सरदारजी और सोनिया गांधी जनता को बेवकूफ समझ रहे हैं, एक घोटालों और महंगाई पर बेहयाई वाले बयानों का समर्थन करता है तो दूसरा चिंता जताकर गंभीर होने का ढोंग। मगर दोनों शायद भूल गए हैं कि जल्द ही उन्हें फिर से हाथ जोड़कर वोट के लिए दर-दर भटकना पड़ेगा, और तब शायद जनता भी उनसे ऐसे ही पेश आए जैसा कि वो सत्ता में आने के बाद आते रहे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-4729666768033913042?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/4729666768033913042/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=4729666768033913042' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/4729666768033913042'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/4729666768033913042'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='बेहयाई न पालो मनमोहनजी जनता भी ऐसे ही पेश आएगी'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-_1FIYvLjvFE/TrazdLPgCfI/AAAAAAAAAIA/l7yDrH0fH1I/s72-c/Manmohan-hint%2BSingh.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-8477877644631602531</id><published>2011-09-24T11:14:00.000-07:00</published><updated>2011-09-24T11:20:44.026-07:00</updated><title type='text'>मोंटेकजी आप कर सकते हैं 32 रुपए में गुजारा</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-OjxV8rqP2b4/Tn4fFI9y-cI/AAAAAAAAAHw/lYFXXD0w8us/s1600/03montek.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 226px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-OjxV8rqP2b4/Tn4fFI9y-cI/AAAAAAAAAHw/lYFXXD0w8us/s320/03montek.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5655992355190405570" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीरज नैयर&lt;br /&gt;इंदिरा गांधी के जमाने में एक नारा दिया गया था, 'गरीबी उन्नमूलनÓ, लेकिन आज लगता है ये बदलकर 'गरीब उन्नमूलनÓ हो गया है। सरकार आज गरीबी नहीं हटाना चाहती बल्कि अपना बोझ हल्का करने के लिए गरीबों को ही कम करने पर तुली है। योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा दिया है, उससे सरकार और स्वयं आयोग की नीयत पर सवाल खड़े हो गए हैं। यहां, ये कहना कि आयोग की इस राय में सरकार शरीक नहीं है, सरासर गलत होगा। योजना आयोग का अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है, इस नाते मनमोहन सिंह अच्छे से जानते होंगे कि अहलूवालिया क्या गुल खिलाने वाले हैं। योजना आयोग कहता है कि शहरों में 32 रुपए और गांवों में 26 रुपए प्रति दिन खर्च करने वाला गरीबी रेखा के नीचे नहीं आ सकता। इतना खर्च उसे संपन्नता की निशानी दिखता है। इन 32 और 26 रुपए में महज खाना ही नहीं, किराया, कपड़ा, स्वास्थ्य और शिक्षा का खर्च भी शामिल है। यानी एक आम आदमी इन रुपयों में पेट भरने से लेकर बच्चों के स्कूल की फीस और उनके इलाज तक सबकुछ कर सकता है। आयोग तो यहां तक मानता है कि अगर एक आदमी रोजाना 5.50 रुपए दाल पर, 1.02 चावल-रोटी पर, 2.33 दूध, 1.55 तेल, 1.95 सब्जी, 44 पैसे फल, 70 पैसे चीनी, 78 पैसे नमक, 1.51 पैसे अन्य खाद्यय पदार्थों पर और 3.75 ईंधन पर खर्च करने की हैसीयत रखता है तो वो स्वस्थ्य जीवन यापन कर सकता है। आराम से जीवन बिताने के मामले में आयोग कहता है कि 49.10 रुपए मासिक किराया देने वाला व्यक्ति भी इस श्रेणी में आता है। योजना आयोग के हलफनामे में और गहराई में चलें तो पता चलता है कि शिक्षा पर 99 पैसे प्रतिदिन खर्च करने वाला अच्छी तालीम पाने की हैसीयत रखता है। इसके अलावा अगर कोई व्यक्ति चप्पल आदि पर 9.6 रुपए खर्च करता है तो वो आयोग की नजर में गरीब नहीं है। गरीबी का ये पैमाना कौनसे गणित से तैयार किया गया, इसका जवाब अहलूवालिया और स्वयं प्रधानमंत्री के अलावा कोई नहीं दे सकता। ऐसे वक्त में जब महंगाई सिर पर पैर रखकर भागे जा रही है, ये कहना कि 32 रुपए पाने वाला गरीब नहीं, गरीबों का मजाक नहीं तो और क्या है। अहलूवालिया साहब को यदि 32 रुपए संपन्नता की निशानी लगते हैं तो इस लिहाज से भारत दुनिया का सबसे संपन्न देश कहा जाना चाहिए। आयोग 99 पैसे हर रोज में बेहतर शिक्षा की बात करता है, 99 पैसे के हिसाब से महीने के हुए 29.7 रुपए। महज 29 रुपए में कौनसा स्कूल बच्चों को दाखिला देगा, सरकारी स्कूल भी इतने में कम में दूर से हाथ जोड़ देंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बारगी मान भी लिया जाए कि 29 रुपए मासिक फीस पर कोई स्कूल तालीम दे रहा है तो भी आयोग को समझना चाहिए कि शिक्षा महज स्कूल में दाखिला लेने भर से नहीं आ जाती, कॉपी-किताब, रबड-पैंसिल पर भी खर्चा करना पड़ता है। आयोग 49.10 रुपए प्रति माह में आराम से किराए पर मकान की बात भी कहता है, मगर हकीकत ये है कि अहलूवालिया ऐड़ी-चोटी का जोर भी लगा लेंगे तो भी इतने कम में कोई उन्हें घर के सामने खड़ा तक नहीं होने देगा। आज से 10 साल पीछे भी जाएं तो भी 49 रुपए में किराए पर मकान नहीं मिल सकता। जहां तक बात पेट भरने की है तो सरकार के सरदार और उनके जूनियर यानी अहलूवालिया आम जनता के पेट को चिडिय़ा का पेट समझते हैं। उन्हें लगता है कि दो दाने उसे जिंदा रखने के लिए काफी है। दो दानों को काफी मान भी लिया जाए तो भी सवाल ये उठता है कि चंद पैसों में ये दो दाने किस दुकान से मिलेंगे। मनमोहन सिंह या अहूलवालिया इसका इंतजाम कर दें तो बात अलग है। वैसे ऐसा पहली बार नहीं है जब अहलूवालिया ने गरीबों का मजाक उड़ाया हो, इससे पहले भी कई बार तो महंगाई को लेकर बेहयाई वाली बयान देते रहे हैं। फर्क बस इतना है कि इस बार उनकी बेहयाई कागजों पर सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंची है। इसे जमीनी अनुभव की कमी कह सकते हैं, अहलूवालिया या दूसरे वीवीआईपी को थैला उठाकर बाजार में मोल-भाव नहीं करना पड़ता, उन्हें ये हिसाब भी नहीं लगाना पड़ता कि महंगाई में खुद को जिंदा रखने के लिए उन्हें किन-किन जरूरतों में कटौती करनी होगी। लालबत्ती में घूमने वाले अहलूवालिया जैसे लोगों को सबकुछ थाली में सजा-सजाया मिल जाता है, इसलिए इन्हें अहसास ही नहीं होता कि किस चीज के कितने दाम चुकाने होते हैं। सबसे ज्यादा अफसोस की बता तो ये है कि योजना आयोग के इस तर्क को आम आदमी की बात करने वाली कांग्रेस ने भी खारिज नहीं किया है। कांग्रेस इसके ऐवज में पुराने आंकड़े याद दिलाने में लगी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कांग्रेस का कहना है कि 2004-2005 में गरीबी की जो रेखा खींची गई थी, उसके हिसाब से 32 रुपए काफी ज्यादा हैं। पर शायद वो ये भूल गई कि इन छ सालों में खाद्य वस्तुओं के दाम कितने ऊपर पहुंच गए हैं। जितनी रकम की बात उस वक्त की गई थी वो भी नाकाफी थी और आज जिस 32 या 26  रुपए की बात की जा रही है वो भी नाकाफी है। कांग्रेस और अहलूवालिया जैसे लोग संसाधनों का भी रोना रोते हैं, उनके मुताबिक सरकार के पास सीमित संसाधन हैं, ऐसे में वो सबसे पहले उसकी मदद करना चाहेगी जिसका पेट बिल्कुल खाली है। जरूरतमंद को सबसे पहले मदद मिले इससे इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन अगर संसाधनों की वास्तव में इतनी कमी है तो फिर कटौती का प्रतिशत सबके लिए बराबर क्यों नहीं रखा जाता। सरकार ऐसा नहीं कर सकती की आम आदमी को मिलने वाली सब्सिडी खत्म करती जाए और कॉरपोरेट सेक्टर को टैक्स छूट और प्रोत्साहन पैकेज जारी करने में जरा भी देर न लगाई जाए। एक अनुमान के तौर पर 2004 से अब तक सरकार ने कॉरपोरेट सेक्टर को22 लाख करोड़ रुपए की टैक्स छूट दी है। अगर सरकार समझती है कि उद्योग घरानों को खड़े रहने के लिए मदद की जरूरत है तो वो ये कैसे सोच सकती है कि आम आदमी उसके द्वारा पैदा की गई महंगाई में बिना किसी सहारे के मजबूती से खड़ा रहेगा। उद्योग घराने सरकार के आर्थिक विकास के लक्ष्य को पूरा करने में मदद करते हैं इसलिए उन्हें देते वक्त सरकार के हाथ नहीं दुखते, लेकिन जब बात उसे सत्ता में पहुंचाने वाले आम आदमी की आती है तो वो तानाशाह बन जाती है। कांग्रेस भले ही कितनी भी आम आदमी की बात करे, लेकिन ये अब साफ हो चला है कि उसकी सरकार की नजर में आम आदमी की कोई अहमियत नहीं। योजना आयोग का काम देश के संसाधनों का प्रभावी और संतुलित ढंग से उपयोग करने के लिए योजनाएं बनाना है, लेकिन यूपीए सरकार के कार्यकाल में उसका मकसद उद्योग घराने का विकास करना ज्यादा दिखाई दे रहा है। योजना आयोग का गठन 15 मार्च 1950 को पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में किया गया था। पहली पंचवर्षीय योजना 1951 से शुरू हुई, इसमें कृषि पर खासा जोर दिया गया। इसके बाद भी बनने वाली योजनाओं में कृषि को प्रमुखता से स्थान दिया गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1997 से नौवीं पंचवर्षीय योजना से उद्योगों के आधुनिकीकरण की शुरूआत हुई, लेकिन फिर भी उसमें मानवीय विकास पर जोर दिया गया। मगर यूपीए के सत्ता संभालने के बाद इस पंचवर्षीय योजना का मुख्य उद्देश्य महज आर्थिक विकास पर ही केंद्रित हो गया। 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-2012) में 8.2 फीसदी आर्थिक वृद्धि अनुमान लगाया गया, इसके अलावा हाल में 12वीं (2012-2017) पंचवर्षीय योजना के जिस दृष्टिकोण पत्र को सरकार ने मंजूरी दी है, उसमें भी 9 फीसदी विकास दर का लक्ष्य रखा गया है। यानी सरकार के एजेंडें से कृषि पूरी तरह बाहर हो चुकी है। जबकि यही सरकार कम उत्पादकता का रोना रोती रहती है। आर्थिक विकास जितनी जरूरी है उतनी ही जरूरत कृषि में सुधार की भी है। ये बात केवल वही समझ सकता है जो जिसने कभी एसी कमरों से बाहर निकलकर हकीकत जानने का प्रयास किया हो, अहलूवालिया जैसे लोग अर्थ का अनर्थ ही कर सकते हैं इससे ज्यादा कुछ नहीं। अहलूवालिया के इस मजाक के लिए एक महीने उन्हें उसी गणित के हिसाब से तनख्वाह दी जाए जिसके इस्तेमाल से उन्होंने आम आदमी को करोड़पति बना दिया है। इन 30 दिनों में सरकार के सरदार के इस जूनियर को आटे-दाल के भाव अच्छे से पता चल जाएंगे, तब शायद उनकी गणित की समझ में कुछ वृद्धि हो सके।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-8477877644631602531?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/8477877644631602531/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=8477877644631602531' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/8477877644631602531'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/8477877644631602531'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/09/32.html' title='मोंटेकजी आप कर सकते हैं 32 रुपए में गुजारा'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-OjxV8rqP2b4/Tn4fFI9y-cI/AAAAAAAAAHw/lYFXXD0w8us/s72-c/03montek.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-1823561424664421733</id><published>2011-09-08T11:50:00.000-07:00</published><updated>2011-09-08T11:51:26.510-07:00</updated><title type='text'>यूं ही मरते रहेंगे हम</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-_7a-_MtRTmw/TmkOnULvXLI/AAAAAAAAAHo/Dfi0mYCZHgc/s1600/blast.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-_7a-_MtRTmw/TmkOnULvXLI/AAAAAAAAAHo/Dfi0mYCZHgc/s320/blast.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5650063276108635314" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीरज नैयर&lt;br /&gt;दिल्ली में आतंकी हमले के बाद फिर वही पुराने सवाल सामने आ गए हैं। ये सवाल हर हमले के बाद उठते हैं, शोर मचाते हैं और थोड़े वक्त बाद फिर गुमनामी में चले जाते हैं।  विपक्ष को नया मुद्दा मिल जाता है, सरकार नाकामी छिपाने का नया बहाना ढूंढ लेती है और जनता दो जून की रोटी की जुगाड़ में लग जाती है। ये हमला भी चंद आंसू बहाने के बाद कुछ रोज में भुला दिया जाएगा। भुला दिया जाएगा कि कुछ घरों के चिराग बुझ गए, कुछ महिलाओं के माथे का सिंदूर उजड़ गया, कुछ बच्चे हमेशा के लिए अनाथ हो गए। सड़क पर चलते वक्त गिरने का खतरा हमेशा रहता है, लेकिन जब हम बार-बार गिरने लगे तो हमें अपनी कमजोरियों का आभास हो जाना चाहिए। अफसोस कि हमारी सरकार अब तक अपनी कमजोरी को पहचान नहीं पाई है, या कह सकते हैं कि पहचानना ही नहीं चाहती। मुंबई हमले के बाद जरूरत व्यवस्था बदलने की थी मगर चेहरे बदले गए, शिवराज पाटिल को गृहमंत्री की कुर्सी से हटाकर चिदंबरम को बैठाया गया। साबित करने की कोशिश की गई कि सफेदी की चमकार में डूबे रहने वाले पाटिल से धोती पहनने वाले चिदंबरम ज्यादा सख्त होंगे। लेकिन ये सख्ती आतंकियों के दिल में खौफ पैदा करने में नाकम रही। गंभीर चेहरे देखाकर खून की होली खेलने वालों को अगर रोका जा सकता तो आतंक का ये दौर कब का खत्म हो गया होता। पाटिल के कार्यकाल में अगर आतंकी बेखौफ  थे तो चिदंबरम के कार्यकाल में उनके हौसले और भी ज्यादा बुलंद हो गए हैं। इस बुलंदी की जिम्मेदार कोई और नहीं सरकार है, मुंबई के दहलने के बाद यदि सख्त कदम उठाए गए होते तो दिल्ली के दहलने की नौबत ही नहीं आती। ऐसा लगता है जैसे ये देश बहुत सहनशील हो गया है, और इसकी सरकार की सहनशीलता कर्ण को भी मात देने लगी है। कर्ण ने तो फिर भी बिच्छु के डंक की पीड़ा को एक बार सहन किया था, लेकिन सरकार बार-बार मिलने वाले जख्मों को अपनी नियती मान बैठी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुस्साहस की ताकत प्रतिक्रियाओं के अभाव में पनपती है। आतंकी भी इस बात को जान गए हैं कि भारत की सहनशीलता बहुत गहरी है। चाहे देश के दिल को दहलाओ या उसकी आर्थिक नब्ज दबाओ कोई प्रतिक्रिया नहीं होगी, गर होगी भी तो महज बयान मात्र की। बीते दिनों मुंबई में सीरीयल धमाकों के बाद गृहमंत्रालय लेकर प्रधानमंत्री तक ने बड़ी दृढ़ता के साथ कहा था कि अब ऐसी घटनाएं नहीं होंगी, वो अब फिर इसी दृढ़ता के साथ कह रहे हैं कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। पीएम कहते हैं कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई एक युद्ध है और हम इसमें जरूर जीतेंगे। लेकिन कब जीतेंगे ये शायद वो खुद नहीं जानते। 12 मार्च 1993 को मुंबई में 13 श्रृखलांबद्ध धमाके हुए थे, उस वक्त को 18 साल गुजर चुके हैं, 18 साल में एक बच्चा बालिग हो जाता है। अपना बुरा-भला, दोस्त दुश्मन की पहचान करने लगता है। इतना ताकतवर भी हो जाता है कि दुश्मन का मुकाबला कर सके। लेकिन इन 18 सालों में हमारा देश कहां है, ये बताने की जरूरत नहीं। उस वक्त हम जिस स्थिति में आज भी वहीं हैं, फर्क बस इतना है कि तब जख्मों पर आंसू बहाने वाले हम अकेले थे और अब अमेरिका जैसे ताकतवर मुल्क का हमें कंधा मिल गया है। लेकिन इससे ज्यादा नाकारापन और क्या हो सकता है कि अमेरिका के कंधे पर टिकने के बाद भी हम उससे दृढ़ता और इच्छाशक्ति का पाठ नहीं सीख पाए हैं। अमेरिका में आखिरी आतंकवादी हमला 2009 में हुआ था, इसके बाद आतंकी उसकी तरफ नजर उठाकर देखने का साहस भी नहीं जुटा पाए। अमेरिका छोटे-छोटे राज्यों का देश है, बावजूद इसके वहां आतंकवाद के मुद्दों पर राजनीति नहीं होती। वहां, सद्दाम या लादेन को बचाने के लिए विधानसभाओं में प्रस्ताव पारित नहीं होते। लादेन तो फिर भी एक मिशन में मारा गया, लेकिन सद्दाम को बाकायदा फांसी पर चढ़ाया गया था। 9/11 के बाद लादेन की तलाश में इराक से पाकिस्तान तक सैन्य कार्रवाई के बुश के फैसले जैसा अगर कुछ भारत में होता पूरे देश को सिर पर उठा लिया गया होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजनीति का इससे विकृत रूप कहीं और देखने को नहीं मिल सकता, अफजल गुरु ने देश की संसद पर हमला किया लेकिन वो आज भी जिंदा है। पूर्व प्रधानमंत्री को मारने वाले जेल में आराम फरमा रहे हैं, कांग्रेस नेता पर हमला करने वाला भुल्लर दया की आस पाले बैठा है। अफजल मुस्लिम है, उसे फांसी मिली तो अल्पसंख्यक वोट बिदक जाएंगे, राजीव के हत्यारे तमिल हैं, उन्हें सजा हुई तो तमिल भड़क जाएंगे, भुल्लर पंजाबी है उसकी मौत से सिख समुदाय आहत होगा, आतंकवादियों को इस रूप में केवल भारत में ही देखा जा सकता है। कसाब का गुनाह हजारों लोगों ने देखा, इसके बाद भी उसके खिलाफ सुबूत जुटाए, अदालत में दोषी को दोषी साबित करने की प्रक्रिया अपनाई गई। आज भी ये साफ नहीं है कि वो कभी फांसी के फंदे पर लटकेगा भी या नहीं, हो सकता है कल कसाब पर भी सियासत शुरू हो जाए। मुस्लिम वोट बैंक बताकर उसे अफजल की तरह जिंदा रखा जाए। वोट बैंक के नाम पर आतंकवादियों से सहानभूति रखने वाले सियासतदा शायद ये भूल जाते हैं कि बंदूक से निकली गोली और बारूद से निकले शोले जाति-धर्म देखकर तबाही नहीं मचाते। आतंकी हमलों में हिंदू भी मरते हैं और मुस्लिम भी, सिख भी मरते हैं और ईसाई भी तो क्या इन लोगों के दिल में अपनों के हत्यारों के प्रति कोई लगाव हो सकता है? ये कुछ और नहीं सिर्फ डर है, जब आपको अपनी काबलियत पर भरोसा न हो तो आप हर चीज से डरने लगते हैं। पांच साल तक जनता के पैसों पर रोटिया तोडऩे वाले, सिर्फ और सिर्फ अपना भले सोचने वाले नेताओं के दिल में यही खौफ घर कर गया है। इसलिए उन्हें आतंकियों में भी मजहबी वोट बैंक नजर आने लगता है। जो नेता और सरकार महंगाई की रफ्तार को नियंत्रित नहीं पाए हों उनसे भला आतंकवादियों पर काबू पाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। आतंकवादियों के पास विनाश के हथियार होते हैं, लेकिन महंगाई निहत्थे। बावजूद इसके महंगाई सरकार को परास्त करे हुई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश में होने वाली हर छोटी-बड़ी आतंकवादी घटनाओं के लिए पाकिस्तान को कुसूरवार ठहराया जाता है, ढेरों सुबूत जुटाए जाते हैं, और अंत में उसी पाकिस्तान के साथ रिश्तों की मजबूती का हवाला देकर सारे जख्म भुला दिए जाते हैं। अगर पाकिस्तान कुसूरवार है तो फिर उससे रिश्ते कैसे? देश की जनता आज तक ये समझ नहीं पाई है कि आखिर आतंकवाद के जनक पाकिस्तान के आगे भारत सरकार इतनी बेबस क्यों हो जाती है। एक अदना का जानवर भी अपनों की जान बचाने के लिए जान की बाजी लगा देता है, वो ये नहीं देखता उसका दुश्मन कितना ताकतवर है, मगर इस देश की सरकार अपने दुश्मन से कई गुना ज्यादा ताकतवर होने के बाद भी खामोशी ओढ़े बैठी है, ये कायरपन नहीं तो और क्या है? जब तक इस कायरपन से बाहर आने के प्रयास नहीं होते हम भारतीय हूं ही मरते रहेंगे, यूं ही सुबोध कांत जैसे लोग हमारे दर्द पर अट्टहास लगाते रहेंगे और यूं ही सरकार आश्वासन देती रहेगी। अगले धमाके के बाद यही सब सवाल एक बार फिर सामने आ जाएंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-1823561424664421733?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/1823561424664421733/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=1823561424664421733' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/1823561424664421733'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/1823561424664421733'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/09/blog-post_08.html' title='यूं ही मरते रहेंगे हम'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-_7a-_MtRTmw/TmkOnULvXLI/AAAAAAAAAHo/Dfi0mYCZHgc/s72-c/blast.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-7701238580621599386</id><published>2011-09-04T11:21:00.000-07:00</published><updated>2011-09-04T11:22:40.076-07:00</updated><title type='text'>टीम अन्ना पर कार्रवाई के मायने</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-KQjMplMJsgw/TmPB3xivnfI/AAAAAAAAAHc/DomZDk6H8hE/s1600/team%2Banna.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 236px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-KQjMplMJsgw/TmPB3xivnfI/AAAAAAAAAHc/DomZDk6H8hE/s320/team%2Banna.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5648571521588764146" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चीन के बारे में कहा जाता है कि वो दुश्मन को कमजोर करने के लिए कभी सीधे तौर पर हमला नहीं करता, वो ऐसे रास्तों से वार करता है जहां से चोट भी पहुंचे और उसे नुकसान भी न हो। यही वजह है कि चीन की पहचान एक कुटिल मुल्क के रूप में बन गई है। 1963 में भारत-चीन की लड़ाई के बाद उसने तमाम मतभेदों के बावजूद कभी इतिहास दोहराने का प्रयास नहीं किया। लेकिन खामोशी से शनै: शनै: अपने भारत विरोधी अभियान को आगे बढ़ाता रहा। कुछ यही तरीका आजकल सरकार अपना रही है। अपने विरोधियों पर सीधे हमला करने के बजाए सरकार दूसरे रास्तों से उनपर घेरा कसने में लगी है। बाबा रामदेव ने कालेधन को लेकर सरकार के खिलाफ आवाज उठाई तो बदले में उन्हें जांच एजेंसियों के फेर में उलझा दिया गया। उनके सहयोगी बालकृष्ण की नागरिकता पर सवाल उठाए गए। उनके पासपोर्ट को फर्जी बताया गया और बाद में उनके प्रमाणपत्रों को अवैध बताकर उन्हें पुलिस थाने के दर्जनों चक्कर लगवाए गए। अन्ना के आंदोलन के माध्यम से बाबा ने जब फिर आवाज बुलंद करने की कोशिश की तो उन्हें प्रवर्तन निदेशालय का डर दिखाया गया। विदेशों के लेन-देन के नाम पर उनके खिलाफ मामले दर्ज किए गए। इसके अलावा ये भी बताया गया कि निदेशालय बाबा की विदेशों में संचित संपत्ति की खोज-खबर में जुट गया है। अब इसी तरीके से अन्ना के सदस्यों से निपटा जा रहा है। पहले किरण बेदी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस भेजा गया, फिर प्रशांत भूषण और इसके बाद अरविंद केजरीवाल को। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केजरीवाल को इस नोटिस के अलावा आयकर विभाग से भी नोटिस थमाए गए। सबसे अजीब रहा कुमार विश्वास को नाटिस भेजना। विश्वास से एडवांस में टैक्स डिक्लियर करने को कहा गया है। इससे पहले कभी उन्हें इस तरह का नोटिस नहीं मिला। जो इंसान समय पर टैक्स का भुगतान करता हो, अचानक से उसे एडवांस में टैक्स डिक्लियर करने को कहना क्या सामान्य प्रक्रिया कही जा सकती है? एकबारगी टीम अन्ना के प्रमुख सदस्यों की बात छोड़ दें तो भी विश्वास को नोटिस गले उतरने वाली बात नहीं है। इससे साफ होता है कि सरकार हर उस शख्स को सबक सिखाना चाहती है, जिसने अन्ना का साथ देने का साहस दिखाया। जाहिर है, ऐसे में अभी कई और लोग निशाना बन सकते हैं। अन्ना के अनशन को जितना जनसमर्थन मिला, उसकी उम्मीद सरकार ने नहीं की थी। सरकार और उसके रणनीतिकार मान बैठे थे कि थोड़ी बहुत सख्ती से आंदोलन को कुचल दिया जाएगा। पहले सरकार अन्ना के सदस्यों को अनशन की इजाजत के लिए यहां-वहां दौड़ाती रही, और जब इजाजत दी तो तमाम शर्तें लगा दी गईं। जब इससे भी बात नहीं बनी तो अनशन वाले दिन अन्ना को गिरफ्तार कर लिया गया। इस गिरफ्तारी और इसके बाद रामलीला मैदान में जो कुछ भी हुआ उससे सरकार का खीजना लाजमी था। सिंहासन पर बैठने वाले को कभी वो चेहरे नहीं सुहाते जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर उसके उपहास में शामिल हों। अन्ना के मंच से स्वयं अन्ना और उनके सहयोगियों ने सरकार पर कई बार हमले बोले, शब्दबाणों के इन हमलों में कई शब्द तीखे भी थे। लेकिन इनके तीखे होने की वजह खुद सरकार ने पैदा की थी। वैसे शब्दों के तीखेपन का अहसास संसद में बैठने वालों को बिल्कुल भी नहीं होता अगर ये हजारों लोगों की मौजूदगी में नहीं बोले गए होते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरविंद, किरन, प्रशांत और ओमपुरी को भेजे गए विशेषाधिकार हनन के नोटिस के बाद ये बात भी विचारणीय हो गई है कि क्या विशेषाधिकार सिर्फ माननीयों के होते हैं। कांग्रेस प्रवक्ता और सांसद मनीष तिवारी ने अन्ना हजारे के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल किया उसे क्या कहा जाए। हाल ही में जेडीयू अध्यक्ष शरद यादव ने राष्ट्रपति और राज्यपाल के बारे में जो कुछ कहा, क्या उसे लेकर उन्हें नोटिस नहीं भेजा जाना चाहिए। इसका मतलब तो ये हुआ कि माननीय एक दूसरे पर चाहे जितनी कीचड़ ऊछालें, जितने चाहे अपशब्द कहें, किसी को कोई परेशानी नहीं होती। लेकिन अगर सांसदों-नेताओं के आचरण से त्रस्त जनता कुछ बोल दे तो वो उनकी शान के खिलाफ हो जाता है। टीम अन्ना ने नेताओं के खिलाफ जो कुछ भी कहा, आम जनता को उससे कोई ऐतराज नहीं होगा, ऐसा इसलिए नहीं कि लोगों को माननीयों का उपहास उड़ाने की आदत है बल्कि इसलिए कि उनका आचरण उपहास उड़ाने लायक बन गया है। सरकार अब भले ही कितनी भी सफाई दे मगर टीम अन्ना और बाबा के खिलाफ उठाए गए कमद बदले की कार्रवाई ही माने जाएंगे। इन दोनों मामलों में ये बात काबिले गौर है कि जिन बातों को कार्रवाई का आधार बनाया गया, उसके तहत पहले भी कार्रवाई की जा सकती थी। मसलन, बाबा पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि उनकी कंपनियों में वित्तीय अनियमित्तांए, हैं, उन्होंने गुपचुप तरीके से विदेशों में संपत्ति जुटा रखी है आदि. आदि। बाबा रामदेव सालों से देश को योग का पाठ पढ़ा रहे हैं, देश के बाहर भी उनके अनुयायियों की लंबी-चौड़ी तादाद है। बाबा की कई कंपनियां आयुर्वेद उत्पादों को लोगों को बीच पहुंचा रही हैं। यानी सरकारी जुबान में अगर बाबा कुछ गलत कर रहे हैं तो ये सिलसिला काफी पहले से चल रहा होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा तो हो नहीं सकता कि कालेधन पर सत्याग्रह पर बैठने के तुरंत बाद उनकी कंपनियां गोरखधंधों में लिप्त हो गईं। इसी तरह अरविंद केजरीवाल को नौकरी का हवाला जिस मामले में उलझाया जा रहा है, वो भी काफी पुराना है। अरविंद ने 2006 में ज्वाइंट इनकम टैक्स कमिश्रर का पद छोड़ा था। लेकिन सरकार को अब याद आ रहा है कि उन्होंने सेवा शर्तों का उल्लंघन किया। उनपर 9 लाख की देनदारी भी निकाली जा रही है। यदि सरकार की मंशा बदले की नहीं होती तो इन कार्रवाईयों को गलती सामने आने के बाद ही अंजाम दिया जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, इसका क्या मतलब निकाला जाए। निश्चित तौर पर यही कि सरकार अपने खिलाफ उठती आवाजों को बर्दाश्त नहीं कर पाई। बेहतर होता अगर सरकार इन आवाजों के साथ गूंज रहे जनता के स्वरों को भी पहचान लेती। पिछले कुछ दिनों में सरकार की छवि पर जितना बट्टा लगा है, उसमें इन कार्रवाईयों ने थोड़ा और इजाफा करने का काम किया है। गनीमत है कि हाल-फिलहाल चुनाव नहीं हैं, अन्यथा अहंकार चूर होते देर नहीं लगती। वैसे भी अहंकार का पेड़ कितना भी ऊंचा क्यों न हो जाए ज्यादा देर मजबूती के साथ खड़ा नहीं रह सकता। एक न एक दिन उसे जमीन पर आना ही पड़ता है। सरकार ये अहंकार कितने दिनों तक टिकता ये देखने वाली बात होगी।&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-7701238580621599386?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/7701238580621599386/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=7701238580621599386' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/7701238580621599386'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/7701238580621599386'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/09/blog-post_04.html' title='टीम अन्ना पर कार्रवाई के मायने'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-KQjMplMJsgw/TmPB3xivnfI/AAAAAAAAAHc/DomZDk6H8hE/s72-c/team%2Banna.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-7366016854900150235</id><published>2011-09-01T12:27:00.000-07:00</published><updated>2011-09-01T12:36:23.833-07:00</updated><title type='text'>कहां तक वाजिब है अन्ना और गांधी की तुलना</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-3heRmPcqx7o/Tl_eUUQropI/AAAAAAAAAHQ/Unc4-DINmEw/s1600/anna.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 184px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-3heRmPcqx7o/Tl_eUUQropI/AAAAAAAAAHQ/Unc4-DINmEw/s320/anna.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5647476898363318930" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अन्ना के आंदोलन की अलोचना का सिलसिला अनशन खत्म होने के बाद भी खत्म नहीं हुआ है। जिन लोगों के मन में इस आंदोलन की खिलाफत में थोड़ी बहुत कसर रह गई थी, उसे वो अब पूरा कर रहे हैं। इन आलोचकों में अरुंधति राय सबसे आगे हैं, वैसे तो लालू यादव जैसे राजनीतिज्ञ भी आंदोलन को गलत करार दे रहे हैं मगर ये उनकी महज खीज है। कुछ लोगों को इसमें भी आपत्ति है कि अन्ना की तुलना महात्मा गांधी से की जा रही है। उनके मुताबिक गांधी देश की आजादी के लिए लड़े थे। इसे सोच का फर्क कह सकते हैं, ऐसे लोगों के लिए शायद आजादी के मायने गैरों के चुंगल से मुक्त होना भर है। अगर अंग्रेजों के जाने के बाद भी हमारे अधिकारों का हनन हो रहा है, हमारी आवाज को दबाया जा रहा है, हमारे हितों की अनदेखी की जा रही है तो हम अब भी गुलाम हैं। फर्क बस चमड़ी का है। वैसे मेरे नजरीय में भी अन्ना का आंदोलन गांधी के आंदोलन से अलग है, लेकिन मेरे मायने जुदा हैं। गांधी के आंदोलन की शुरूआत उनके साथ हुए गलत आचरण से शुरू हुई। जबकि अन्ना ने जन-जन की समस्या को मुद्दा बनाया। इस बात में कोई दोराय नहीं कि जिस पीड़ा से गांधीजी गुजरे उसी दर्द का अनुभव हजारों-लाखों भारतीय भी कर रहे थे। लेकिन यदि बापू को ट्रेन से न उतारा गया होता तो शायद वो आजादी की लड़ाई के अगुवा नहीं होते। गांधीजी उन दिनों दक्षिण अफ्रिका में थे, उन्हें फस्र्ट क्लास का टिकट होने के बाद भी थर्ड क्लास में जाने को कहा गया, जब उन्होंने ऐसा नहीं किया तो ट्रेन से बाहर कर दिया गया। ऐसे ही एक दूसरे मामले में बग्घी ड्राइवर ने गांधीजी के साथ महज इसलिए मारपीट की क्योंकि उन्होंने यूरोपियन यात्री को जगह देने से मना कर दिया। इन सबके अलावा दक्षिण अफ्रिका के कई होटलों में गांधीजी का प्रवेश प्रतिबंधित था, डरबन के मजिस्ट्रेट ने तो उन्हें पगड़ी उतारने तक का फरमान भी सुना दिया था, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया। ये कुछ ऐसी घटनाएं थी, जिन्होंने गांधीजी को अन्याय और रंगभेद के खिलाफ आवाज उठाने पर मजबूर किया। यहां मजबूरी काबिले-गौर शब्द है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांधीजी ने देश के लिए जो किया, उसे कोई नहीं भुला सकता। आजादी में उनका योगदान हमेशा याद किया जाता रहेगा। विरोध का अहिंसक हथियार महात्मागाधी की ही देन है। लेकिन ये याद उस मजबूरी की भी याद दिलाती रहेगी। अब अन्ना की बात करें तो उन्हें भ्रष्टाचार से त्रस्त आम जनता का दर्द व्यक्तिगत अनुभव से नहीं हुआ, उन्होंने आस-पास जो होते देखा-सुना उसके खिलाफ लामबंद हो गए। फिर भी गांधी और अन्ना की तुलना को कहीं से भी जायज नहीं कहा जा सकता। तुलना करने से हम किसी को थोड़ा ऊपर, और किसी को थोड़ा नीचे कर देते हैं। जो गांधी ने किया वो अन्ना नहीं कर सकते और जो अन्ना कर रहे हैं उसे करने के लिए गांधी हमारे बीच हैं ही नहींं। इसलिए दोनों में अंतर निकालना या समानता बताना दोनों ही गलत हैं। बात केवल अन्ना के आंदोलन पर केंद्रित होनी चाहिए। अरुंधति राय मानती हैं कि अन्ना के समर्थन में सड़कों पर जनसैलाब का उमड़ाना हैरान करने वाला नहीं है, क्योंकि इससे ज्यादा भीड़ वो कश्मीर में देख चुकी हैं। कश्मीर को देश के बाकी इलाकों को जोड़कर देखना अरुंधति की सबसे पहली मूर्खता है। घाटी में जो हालात हैं, उसके लिए पाक परस्त हुर्रियत जिम्मेदार है। जहां तक बात भीड़ के उमडऩे की है तो, कश्मीरियों को इस्लाम के नाम पर आजादी का नारा बुलंद करने का पाठ पढ़ाया जा रहा है। धर्म के नाम पर भीड़ कैसे जुटती है, ये बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौरान देश देख चुका है। शरीर पर बम बांधकर अपने को उड़ा लेने और हंसते-खेलते जान निछावर करने का परिणाम भले ही मौत हो, मगर दोनों के आश्य अलग हैं। कश्मीर में जुटने वाली भीड़ बम बांधे हुए लोगों की तरह है, जो दूसरों के इशारों पर प्रतिक्रिया करती है जबकि अन्ना के समर्थन में उतरे लोग अपनी मर्जी से सड़क पर आए। अरुंधति को सबसे पहले इन दोनों के बीच का फर्क समझने की जरूरत है। आंदोलन के अहिंसक स्वरूप पर अरुंधति कहती हैं कि इसकी वजह पुलिस का डर था। यानी अगर पुलिस डरी नहीं होती तो आंदोलन को अहिंसक नहीं कहा जा सकता था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजादी के दौर में गांधीजी के आंदोलनों को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने कई बार जुल्म ढहाए मगर फिर भी उन आंदोलनों को अहिंसक कहा गया। इसलिए अगर पुलिस बेखौफ होती तो ये जरूरी नहीं कि लोग भी रक्तपात पर उतर आते। जनता के धैर्य और उत्तेजना को काबू रखना बेहद मुश्किल काम है, लेकिन अन्ना ने इस मुश्किल को आसान कर दिखाया। कम से कम इसके लिए तो उनकी तारीफ की ही जानी चाहिए। अरुंधति अन्ना के आंदोलन को मिले मीडिया कवरेज पर भी सवाल उठा रही हैं, इस लेखिका को लगता है कि कुछ चैनलों को साधकर आंदोलन को प्रमोट किया गया। ये बात बिल्कुल सही है कि आंदोलन की सफलता में मीडिया की भूमिका काफी अहम रही, पर क्या इसका ये मतलब निकाला जाना चाहिए कि सबकुछ पेड था। मीडिया मसाले की तलाश में रहता है, और अन्ना के आंदोलन में उसे वो मसाला मिला। आम जनता सिर्फ और सिर्फ अन्ना के बारे में जानना चाहती थी। चाय की दुकान से लेकर दफ्तरों तक में अन्ना की चर्चा थी, ऐसे में मीडिया कुछ और दिखाता या पढ़ाता भी तो कैसे। इस विवादास्पद लेखिका को इस बात पर भी ऐतराज है क लोगों ने हाथ में तिरंगे लेकर वंदेमातरम के नारे क्यों लगाए। बकौल अरुंधति वंदेमातरम का सांप्रदायिक इतिहास रहा है। इस्लाम में मूर्ति पूजा की मनाही है, इसी तर्क को लेकर शाही इमाम ने मुस्लिमों से आंदोलन से दूर रहने को कहा, मगर मुसलमान पहले से भी ज्यादा तादाद में अन्ना का साथ देने पहुंचे। जिन दो बच्चियों ने अन्ना का अनशन तुड़वाया वो भी मुस्लिम थीं। तो फिर इसमें सांप्रदायिकता की बात कहां से आ गई। जब मुस्लिमों को इन नारों के बीच भी खुद को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का हिस्सा बनाने पर कोई ऐतराज नहीं तो फिर अरुंधति ऐतराज जताने वाली कौन होती हैं। अरुंधति और उनके जैसे दूसरे लोग आलोचना की बीमारी से ग्रस्त हैं, इन्हें माओवादियों का रक्तपात, हुर्रियत के देश विरोधी नारे तो सुहाते हैं, लेकिन किसी अन्ना जैसे आम आदमी से जुड़े आंदोलन नहीं। अच्छी बात ये है कि जनता ने भी ऐसे लोगों को गंभीरता से लेना बंद कर दिया है। उसे समझ आ गया है कि ये लोग सुर्खियों में आने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। अन्ना ने जो काम किया है, उसके आगे ये अलोचनाएं कहीं नहीं टिकतीं। वैसे भी हर अच्छी पहल को अंजाम तक पहुंचने से पहले विरोध के दरिया से गुजरना ही पड़ता है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-7366016854900150235?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/7366016854900150235/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=7366016854900150235' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/7366016854900150235'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/7366016854900150235'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='कहां तक वाजिब है अन्ना और गांधी की तुलना'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' 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alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5641540365109163250" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीरज नैयर&lt;br /&gt;अभी हाल ही में एक फिल्म देखी, इस फिल्म में हीरो को फंसाने के लिए पुलिस वाले तलाशी के नाम पर उसकी जेब में ड्रगस रख देते हैं और फिर उसी ड्रगस को दिखाकर उसे गिरफ्तार कर लेते हैं। अन्ना हजारे के साथ भी सरकार कुछ ऐसा ही करने की कोशिश कर रही है। छह साल पुराने मामले को उठाकर सरकार ये बताना चाहती है कि भ्रष्टाचार मिटाने की बात करने वाले अन्ना खुद भ्रष्टचार में लिप्त हैं। अन्ना की पीएम को चि_ी के दूसरे दिन जिस तरह से सरकार के तीन-तीन बड़े मंत्री और कांग्रेस ने हजारे पर हमला बोला उससे ये साफ होता है कि सरकार उन्हें फंसाना चाहती है। हालांकि उस स्थिति में नहीं है, जिस स्थिति में फिल्म के पुलिसवाले थे। फिल्म में हीरो अकेला था, लेकिन अन्ना के साथ पूरा देश खड़ा है। सिर्फ देश ही नहीं विदेशों में भी इस गांधीवदी नेता के समर्थन में प्रदर्शन हो रहे हैं। जिस जस्टिस सावंत की रिपोर्ट का हवाले देकर सरकार अन्ना को भ्रष्ट बताने में लगी है, उस रिपोर्ट पर अन्ना के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। अगर अन्ना हजारे भ्रष्ट थे तो कार्रवाई होनी चाहिए थी। दरअसल, अन्ना ने महाराष्ट्र सरकार के चार मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टचार के आरोप लगाए थे। इन आरोपों से तिलमिलाए एक मंत्री ने भी अन्ना पर यही आरोप लगाया। दोनों आरोपों की जांच के लिए जस्टिस सावंत की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। इस समिति ने 2005 में विधानसभा को अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट के आधार पर तीन मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा, मगर अन्ना के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसका सीधा सा मतलब निकलता है कि अन्ना पर लगे आरोपों का कोई आधार नहीं मिला होगा। वरना जो सरकार अपने तीन मंत्रियों को कुर्बान कर सकती है, भला क्या वो आरोप लगाने वाले अन्ना को बेदाग छोड़ सकती थी? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार ने अन्ना के पिछले सारे रिकॉर्ड खंगाले यहां तक कि उनके सेना के दिनों की भी जानकारी जुटाई, लेकिन जब कुछ नहीं मिला तो उसने जस्टिस सावंत की रिपोर्ट को हथियार बनाया। संभव है आने वाले दिनों में सरकार अन्ना पर कुछ और गंभीर आरोप लगाए, इन आरोपों को साबित करने के लिए वो कुछ दलीलें भी पेश करे। सरकार के लिए कुछ भी मुश्किल नहीं है, वो सच को झूठ और झूठ को सच में बदल सकती है। अपने खिलाफ आवाज उठाने वालों का हाल वो बाबा रामदेव की तरह कर देती है। कल तक बाबा पूरे जोश के साथ कालाधन वापस लाने की मांग किया करते, मगर अब ऐसे खामोश हैं जैसे उन्होंने ये मुद्दा कभी उठाया ही नहीं। इस खामोशी के पीछे उनकी भी मजबूरी है। सरकार ने कई एजेंसियों को बाबा के पीछे साय की तरह लगा दिया है, वो सांस भी लेते हैं तो सरकार को पता चल जाता है कि उनकी धड़कनें कितनी तेज चलीं। सरकार कहती है कि अन्ना और उनकी टीम की मांगे नाजायज हैं, उन्हें अनशन करने का हक नहीं। कानून जनप्रतिनिधि बनाते हैं, संसद सर्वोच्च है आदि. आदि। अगर अन्ना की मांगे नाजायज हैं तो सरकार पहले उनपर राजी कैसे हो गई। उसे अन्ना का अनशन तुड़वाने के लिए रजामंदी का दिखावा करना ही नहीं चाहिए था। देश का कोई भी नागरिक सरकार के इस तर्क से सहमत नहीं हो सकता, आखिर अन्ना की मांगों में ऐसा क्या है जो जायज नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिविल सोसाइटी का जनलोकपाल बिल प्रधानमंत्री और न्यायापालिका को दायरे में रखने की मांग करता है, क्या ये नाजायज है। प्रधानमंत्री या जज कोई दूध के धुले नहीं होते, पैसा उनका ईमान भी ढिगा सकता है। ऐसे तमाम उदाहरण हमारे पास मौजूद हैं। राजीव गांधी से लेकर नरसिंहराव तक पर पीएम रखते वक्त आरोप लगे। सब्बरवाल से लेकर केजी बालकृष्णन तक ने चीफ जस्टिस रहते वक्त भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना किया। क्या ये आरोप ऐसे ही लग गए, कहीं न कहीं तो कुछ न कुछ गड़बड़ रहा होगा तभी इतने उच्च पदों पर विराजमान लोगों पर इतने गंभीर आरोप लगे। जहां भ्रष्टाचार है वहां लोकपाल को जांच करने की अनुमति क्यों नहीं दी जा सकती? जहां तक बात अन्ना को अनशन करने के हक की है तो ये देश के हर व्यक्ति का अधिकार है। संविधान में इसकी इजाजत दी गई है तो फिर सरकार इस अधिकार को कैसे छीन सकती है। गांधी जी ने भी अहिंसक तरीके से सत्याग्रह किया, अगर उस सत्याग्रह के लिए गांधी को पिता का दर्जा दिया जा सकता है तो अन्ना को कम से कम सम्मान के साथ अनशन करने का हक तो मिलना ही चाहिए। सरकार कहती है कि कानून बनाने का अधिकार जनप्रतिनिधियों को है और संसद सर्वोच्च है। इस बात में कोई दोराय नहीं कि कानून जनप्रतिनिधि ही बना सकते हैं, लेकिन वो जनप्रतिनिधि जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। जनता ने उन्हें ये अधिकार दिया है। और अगर जनता अधिकार दे सकती है तो उन अधिकारों के गलत इस्तेमाल का विरोध भी कर सकती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोकतंत्र में संसद को सर्वोच्च नहीं कहा जा सकता, ये बात ब्रिटेन जैसे देशों पर लागू हो सकती है जहां राजा-रानी की भी सरकारी फैसलों में दखलंदाजी होती है। लेकिन भारत में नहीं। देश की जनता अपना प्रतिनिधित्व करने वालों को संसद भेजती है, वो प्रतिनिधि मिलकर संसद चलाते हैं तो संसद सर्वोच्च कैसे हो गई। सर्वोच्च संसद नहीं बल्कि जनता है, अगर जनता प्रतिनिधि न चुने तो संसद इस काम की। जनता को और अन्ना हजारे को इस बात का पूरा अधिकार है कि वो सरकार के कामकाज एवं नीतियों के खिलाफ सड़क पर उतरकर अनशन कर सकें। इस अधिकार को सरकार चाहकर भी नहीं छीन सकती। कहने को भारत में लोकतंत्र है, लेकिन जिस तरह से सरकार अपने खिलाफ आवाज उठाने वालों को ठिकाने लगाने में लगी है उससे इस लोकतंत्र के मायने ही बदल गए हैं। हमने सिफ लोकतंत्र का चोला ओढ़ा है, अंदर से हमारी मानसिकता तानाशाही वाली है। चीन, म्यांमार और भारत में फर्क केवल इतना ही कि वहां सरकार की मुखालफत करने वालों को सबके सामने कुचलकर रख दिया जाता है जबकि हमारे यहां पर्दे के पीछे रहकर खेल खेला जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे लोकतंत्र से अच्छा है तानाशाही, कम से कम लोगों को इस बात का भ्रम तो नहीं रहेगा कि उन्हें आवाज उठाने का हक है। अन्ना हजारे जो कुछ भी कर रहे हैं, उससे भले ही भ्रष्टाचार पूरी तरह खत्म न हो, लेकिन इस पहल की जरूरत थी। सरकार को इस बात का आभास होना ही चाहिए कि जनता सर्वोच्च है और उसकी मर्जी भी कुछ मायने रखती है। सरकार हर वक्त जनता को नहीं हांक सकती, बात चाहे भ्रष्टाचार की हो या महंगाई की सरकार अपनी मनमर्जी के हिसाब से काम करती आई है और उसकी मनमर्जी का खामियाजा जनता को भुगतना पड़ रहा है। अन्ना आम जनता की आवाज बनकर उभरे हैं, इस आवाज को बुलंद रखना हमारी भी जिम्मेदारी है और इसे हजारे की मुहिम में शामिल होकर ही बुलंद रखा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-9011212738941365972?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/9011212738941365972/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=9011212738941365972' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/9011212738941365972'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/9011212738941365972'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/08/blog-post_3921.html' title='संसद नहीं जनता सर्वोच्च'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-4JPdwxeqJUw/TkrHEmhb9PI/AAAAAAAAAHE/MIPKFKi7IUI/s72-c/anna.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-1115807953912320540</id><published>2011-08-16T12:35:00.000-07:00</published><updated>2011-08-16T12:41:33.653-07:00</updated><title type='text'>संसद नहीं जनता सर्वोच्च</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-4JPdwxeqJUw/TkrHEmhb9PI/AAAAAAAAAHE/MIPKFKi7IUI/s1600/anna.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 225px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-4JPdwxeqJUw/TkrHEmhb9PI/AAAAAAAAAHE/MIPKFKi7IUI/s320/anna.jpg" border="0" 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हजारे भ्रष्ट थे तो कार्रवाई होनी चाहिए थी। दरअसल, अन्ना ने महाराष्ट्र सरकार के चार मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टचार के आरोप लगाए थे। इन आरोपों से तिलमिलाए एक मंत्री ने भी अन्ना पर यही आरोप लगाया। दोनों आरोपों की जांच के लिए जस्टिस सावंत की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। इस समिति ने 2005 में विधानसभा को अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट के आधार पर तीन मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा, मगर अन्ना के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसका सीधा सा मतलब निकलता है कि अन्ना पर लगे आरोपों का कोई आधार नहीं मिला होगा। वरना जो सरकार अपने तीन मंत्रियों को कुर्बान कर सकती है, भला क्या वो आरोप लगाने वाले अन्ना को बेदाग छोड़ सकती थी? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार ने अन्ना के पिछले सारे रिकॉर्ड खंगाले यहां तक कि उनके सेना के दिनों की भी जानकारी जुटाई, लेकिन जब कुछ नहीं मिला तो उसने जस्टिस सावंत की रिपोर्ट को हथियार बनाया। संभव है आने वाले दिनों में सरकार अन्ना पर कुछ और गंभीर आरोप लगाए, इन आरोपों को साबित करने के लिए वो कुछ दलीलें भी पेश करे। सरकार के लिए कुछ भी मुश्किल नहीं है, वो सच को झूठ और झूठ को सच में बदल सकती है। अपने खिलाफ आवाज उठाने वालों का हाल वो बाबा रामदेव की तरह कर देती है। कल तक बाबा पूरे जोश के साथ कालाधन वापस लाने की मांग किया करते, मगर अब ऐसे खामोश हैं जैसे उन्होंने ये मुद्दा कभी उठाया ही नहीं। इस खामोशी के पीछे उनकी भी मजबूरी है। सरकार ने कई एजेंसियों को बाबा के पीछे साय की तरह लगा दिया है, वो सांस भी लेते हैं तो सरकार को पता चल जाता है कि उनकी धड़कनें कितनी तेज चलीं। सरकार कहती है कि अन्ना और उनकी टीम की मांगे नाजायज हैं, उन्हें अनशन करने का हक नहीं। कानून जनप्रतिनिधि बनाते हैं, संसद सर्वोच्च है आदि. आदि। अगर अन्ना की मांगे नाजायज हैं तो सरकार पहले उनपर राजी कैसे हो गई। उसे अन्ना का अनशन तुड़वाने के लिए रजामंदी का दिखावा करना ही नहीं चाहिए था। देश का कोई भी नागरिक सरकार के इस तर्क से सहमत नहीं हो सकता, आखिर अन्ना की मांगों में ऐसा क्या है जो जायज नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिविल सोसाइटी का जनलोकपाल बिल प्रधानमंत्री और न्यायापालिका को दायरे में रखने की मांग करता है, क्या ये नाजायज है। प्रधानमंत्री या जज कोई दूध के धुले नहीं होते, पैसा उनका ईमान भी ढिगा सकता है। ऐसे 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अधिकारों के गलत इस्तेमाल का विरोध भी कर सकती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोकतंत्र में संसद को सर्वोच्च नहीं कहा जा सकता, ये बात ब्रिटेन जैसे देशों पर लागू हो सकती है जहां राजा-रानी की भी सरकारी फैसलों में दखलंदाजी होती है। लेकिन भारत में नहीं। देश की जनता अपना प्रतिनिधित्व करने वालों को संसद भेजती है, वो प्रतिनिधि मिलकर संसद चलाते हैं तो संसद सर्वोच्च कैसे हो गई। सर्वोच्च संसद नहीं बल्कि जनता है, अगर जनता प्रतिनिधि न चुने तो संसद इस काम की। जनता को और अन्ना हजारे को इस बात का पूरा अधिकार है कि वो सरकार के कामकाज एवं नीतियों के खिलाफ सड़क पर उतरकर अनशन कर सकें। इस अधिकार को सरकार चाहकर भी नहीं छीन सकती। कहने को भारत में लोकतंत्र है, लेकिन जिस तरह से सरकार अपने खिलाफ आवाज उठाने वालों को ठिकाने लगाने में लगी है उससे इस लोकतंत्र के मायने ही बदल गए हैं। हमने सिफ लोकतंत्र का चोला ओढ़ा है, अंदर से हमारी मानसिकता तानाशाही वाली है। चीन, म्यांमार और भारत में फर्क केवल इतना ही कि वहां सरकार की मुखालफत करने वालों को सबके सामने कुचलकर रख दिया जाता है जबकि हमारे यहां पर्दे के पीछे रहकर खेल खेला जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे लोकतंत्र से अच्छा है तानाशाही, कम से कम लोगों को इस बात का भ्रम तो नहीं रहेगा कि उन्हें आवाज उठाने का हक है। अन्ना हजारे जो कुछ भी कर रहे हैं, उससे भले ही भ्रष्टाचार पूरी तरह खत्म न हो, लेकिन इस पहल की जरूरत थी। सरकार को इस बात का आभास होना ही चाहिए कि जनता सर्वोच्च है और उसकी मर्जी भी कुछ मायने रखती है। सरकार हर वक्त जनता को नहीं हांक सकती, बात चाहे भ्रष्टाचार की हो या महंगाई की सरकार अपनी मनमर्जी के हिसाब से काम करती आई है और उसकी मनमर्जी का खामियाजा जनता को भुगतना पड़ रहा है। अन्ना आम जनता की आवाज बनकर उभरे हैं, इस आवाज को बुलंद रखना हमारी भी जिम्मेदारी है और इसे हजारे की मुहिम में शामिल होकर ही बुलंद रखा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-1115807953912320540?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/1115807953912320540/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=1115807953912320540' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/1115807953912320540'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/1115807953912320540'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/08/blog-post_16.html' title='संसद नहीं जनता सर्वोच्च'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-4JPdwxeqJUw/TkrHEmhb9PI/AAAAAAAAAHE/MIPKFKi7IUI/s72-c/anna.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-595861421889176660</id><published>2011-08-07T12:04:00.000-07:00</published><updated>2011-08-07T12:06:21.659-07:00</updated><title type='text'>शेयर बाजार में गिरावट: डरने नहीं, मुनाफ कमाने का वक्त</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-a13Xt2WMHNA/Tj7iJi7FF7I/AAAAAAAAAG8/W-r4vklpkVY/s1600/share.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-a13Xt2WMHNA/Tj7iJi7FF7I/AAAAAAAAAG8/W-r4vklpkVY/s320/share.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5638192437135742898" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीरज नैयर&lt;br /&gt;शेयर बाजार के हालात इस वक्त गमगीन हैं, गमगीन इसलिए कि एक दिन में निवेशकों को 1.33 लाख करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा है। इस एक लाख 33 हजार करोड़ में हजारों छोटे-बड़े निवेशकों का पैसा डूबा होगा। जो बड़े हैं, वो किसी तरह इस मार को सह जाएंगे लेकिन जिन्होंने अभी चलना सीखा था या जो छोटे-छोटे कदम बढ़ाने की हैसीयत रखते हैं उनके लिए इससे उबरना बहुत मुश्किल होगा। बाजार में इस तरह का माहौल अचानक ही बनता है, लेकिन उसके पीछे की वजह अचानक जन्म नहीं लेती। मौजूदा गिरावट अमेरिका में आर्थिक मंदी की आशंका से आई है, अमेरिका पर कर्ज बढ़ता जा रहा है। हालांकि कर्ज माफी बिल पर सहमति तो बन गई है, लेकिन बोझ इतना ज्यादा है कि मंदी का खतरा जल्द टलने वाला नहीं। बस, इसी खतरे के चलते निवेशक घबराए हुए हैं और बाजार गिर रहे हैं। भारत ही नहीं, अमेरिका सहित कई देशों के बाजार में नरमी का रुख है। यहां, सोचने वाली बात ये है कि अगर आशंका बाजार को दो साल पीछे ले जा सकती है तो आशंका के सच होने की दशा में क्या हाल होंगे। ऐसी स्थिति में अमूमन निवेशक भारी नुकसान से बचने के लिए धड़ाधड़ बिकवाली करते हैं, उन्हें लगता है कि आज बेच लो कल मौका मिले न मिले। ये मानसिकता सामान्य बाजार में तो कारगर हो सकती है, लेकिन शेयर बाजार बिल्कुल अलग है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धड़ाधड़ बिकवाली, एक मामूली से बीमार इंसान को आईसीयू में पहुंचाने जैसी है। निवेशकों की घबराहट पूरे के पूरे बाजार को जार-जार कर देती है, और जाहिर है ऐसी स्थिति से निकलने में वक्त लगता है। शेयर बाजार में पूंजी निवेशकर मुनाफा कमाना हमेशा लॉंग टर्म इनवेस्टमेंट रहा है, लेकिन बीते कुछ सालों में शॉट टर्म इनवेटरों की भरमार हो गई है। ऐसे लोगों की तादाद काफी ज्यादा है, जिनकी नजर में शेयर कम वक्त में प्रॉफिट गेन का बहुत बढिय़ा विकल्प है। इस बढिय़ा विकल्प की सोच ने ही ऐसे निवेशकों की लंबी-चौड़ी फौज खड़ी कर दी है जो बाजार में पैसा लगाते हैं और हल्की सी आशंका मात्र पर ही अपने हाथ खींच लेते हैं। नतीजतन, एक्सप्रेस की रफ्तार से दौड़े जा रहे बाजार की स्पीड पैसेंजर की माफिक हो जाती है। शेयर बाजार में निवेश धैर्य का खेल है, जिस किसी को ये खेल समझ आ गया उसके लिए मुनाफा कमाना कोई बड़ी बात नहीं। लेकिन अफसोस कि इसे समझने में लोग अक्सर चूक कर जाते हैं। गिरावट के वक्त हमेशा समझदारी से काम लेना चाहिए। धड़ाधड़ बिकवाली के बजाए जिन शेयरों में आपको मुनाफे की संभावना बेहद कम नजर आ रही हो केवल उन्हें ही निकालना चाहिए। अन्यथा थोड़े समय के लिए खामोश बैठने में ही भलाई है। शेयर बाजार में कभी एक जैसा रुख नहीं रहता, आज नरमी है तो कल अच्छे दिन भी आएंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछली बार जब विश्व ने आर्थिक मंदी का सामना किया था तब भी शेयर बाजार एक ही झटके में कई साल पीछे पहुंच गया था। लेकिन फिर भी उसने वापसी की, धीरे-धीरे ही सही मगर वो पुराने मुकाम तक पहुंच गया। इसलिए ये सोच लेना कि बाजार गर्त में चला गया नादानी और बेवकूफी के सिवा कुछ नहीं। बाजार में मंदी के बादल ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकते। हमारे यहां एक और धारणा है कि जब कभी भी बाजार गोते लगाता है, अच्छे से अच्छे निवेशक भी हाथ बांधे खड़े हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि अगर अब निवेश किया तो ताउम्र पछताना पड़ेगा। जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। सही मायनों में देखा जाए तो खरीददारी का ये सबसे सुनहरा मौका है, ऐसे मौके बार-बार नहीं मिला करते। ये एक तरह से कभी-कभी लगने वाली बंपर सेल की तरह है, अगर आप सेल का लाभ लेने से नहीं चूकते तो फिर यहां घबराहट किस बात की? उदाहरण के तौर पर यदि आपके घर के बाहर कोई सब्जी वाला दो रुपए किलो टमाटर की आवाज लगाए तो क्या आप सिर्फ ये सोचकर कि कल तक तो 20 रुपए किलो थे आज दो रुपए कैसे हो गए, उसे जाने देंगे। शायद नहीं। तो फिर जब बड़ी-बड़ी कपंनियों के शेयर आलू-टमाटर के भाव मिल रहे हैं तो उनमें निवेश करने में बुराई क्या है? गिरावट के वक्त किया गया निवेश ज्यादा मुनाफे कमाने का नायाब तरीका है, वैसे जोखिम की संभावना तो हर पल बनी रहती है। लेकिन इस वक्त जोखिम का प्रतिशत काफी कम हो जाता है। हां, इसके लिए आपको धैर्य से काम लेना होगा। ऐसा बिल्कुल नहीं होगा कि आपने आज निवेश किया और कल आपको उसके दोगुने मिल जाएं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि ऐसी सोच लेकर शेयर बाजार में किस्मत आजमाना चाहते हैं तो बेहतर होगा सोने-चांदी में निवेश करें। दीवाली आने वाली है, लिहाजा सोने-चांदी के रुख में नरमी के संकेत दूर-दूर तलक नजर नहीं आते। ऐसा संभवत: पहली बार हुआ है कि शेयर बाजार में गिरावट के बावजूद सोने के दामों में तेजी आई हो। सेंसेक्स के साथ अगर चलना है तो आपको धैर्य से काम लेना सीखना होगा। सस्ते दामों में आज खरीदे गए शेयर आने वाले कुछ वक्त में बेहतर प्रॉफिट दे सकते हैं। फिर भी निवेश करने से पहले अध्ययन जरूरी है। कुछ दिनों तक मार्केट को वॉच करें, जिन कंपनयिों के शेयर आप खरीदना चाहते हैं उनपर नजर रखें। जिन शेयरों में उतार-चढ़ाव ज्यादा हो रहा हो, उन्हें खरीदने में समझदारी है। उतार-चढ़ाव का मतलब दोनों बातों से है, मसलन, आज भाव बढ़ गए, कल गिरे तो परसों फिर चढ़ गए। ऐसे शेयर उन कंपनियों के शेयरों से ज्यादा मुनाफा दिला सकते हैं जो एक जगह काफी वक्त तक स्थिर हैैं। जिस तरह के हालात हैं, उसमें स्टॉक मार्केट अभी एक गोता और लगा सकता है। लिहाजा बाजार में निवेश की बेहतर संभावनाएं कुछ और वक्त तक बरकरार रहने वाली हैं।  शेयर बाजार में उतरने से पहले लॉंग टर्म इनवेस्टमेंट की मानसिकता बनाएं, शॉट टर्म में कभी-कभी तत्कालिक फायदा तो हो सकता है, मगर नुकसान की संभावना भी हमेशा बनी रहती हैं। एक और बात जो सीखना बहुत जरूरी है, वो ये कि जब बाजार गिरावट की दिशा में जा रहा हो, निवेश करने से नहीं चूकें। जाने-माने इनवेस्टर वॉरेन बफेट ने कहा है, जब लोग डर रहे हों, तब आप लालची बन जाओ और जब लोग लालची हों तब आप थम जाओ। इसी लाइन पर आगे चलते हुए बफेट ने शेयर बाजार से बहुत कमाया, वो दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति का खिताब भी हासिल कर चुके हैं। अगर बफेट जैसा विशेषज्ञ कुछ कह रहा है तो निश्चित तौर पर उसके पीछे कुछ तर्क होंगे। इसलिए टीवी चैनलों पर छाय मातम से माहौल से बाहर निकलकर आगे की सोचें। इस वक्त शेयर बाजार से जुड़े लोग डरे हुए हैं, यानी निवेश का बेहतर माहौल है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-595861421889176660?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/595861421889176660/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=595861421889176660' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/595861421889176660'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/595861421889176660'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/08/blog-post_07.html' title='शेयर बाजार में गिरावट: डरने नहीं, मुनाफ कमाने का वक्त'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-a13Xt2WMHNA/Tj7iJi7FF7I/AAAAAAAAAG8/W-r4vklpkVY/s72-c/share.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-988642360127191183</id><published>2011-08-03T11:35:00.000-07:00</published><updated>2011-08-03T11:39:32.695-07:00</updated><title type='text'>धुरंधरों की पराजय और मीडिया का मिजाज</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-sefuShcTaDA/TjmV2b93E7I/AAAAAAAAAG0/eZfzX2no8-Y/s1600/images.jpeg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 261px; height: 193px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-sefuShcTaDA/TjmV2b93E7I/AAAAAAAAAG0/eZfzX2no8-Y/s320/images.jpeg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5636701171083580338" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;नीरज नैयर&lt;br /&gt;मीडिया के भी क्या कहने, पल में किसी को राजा बना दे और पल में उसी राजा की हालत रंक से भी बदतर कर दे। यही वजह है कि राजनेताओं से लेकर फिल्म कलाकारों तक हर कोई इस बिरादरी को साधकर चलना चाहता है। और जो ऐसा करने में असफल रहता है उसका हाल मायावती की माफिक हो जाता है। भले ही उत्तर प्रदेश को सर्वोत्तम प्रदेश बताने वाले लाखों रुपए के विज्ञापन चैनलों या अखबारों में आय दिन नजर आ जाते हों, लेकिन माया फिर भी मीडिया के निशाने पर रहती हैं। आमतौर पर यही धारणा है कि खबरिया बाजार में विज्ञापन फेंकने से मीडिया वाले राजा बनाने की प्रक्रिया शुरू कर देते हैं, मगर असलीयत शायद इससे थोड़ी अलग है। अगर ऐसा न होता तो मायावती को भी किसी रानी की तरह पेश किया जा रहा होता। फिलहाल तो मीडिया ने उनकी छवि खलनायिका जैसी बना दी है। भट्टर परसौल को लेकर राहुल गांधी के दावों की हवा निकलने के बाद भी मायाराज को हिटलरशाही करार दिया गया। भूमि अधिग्रहण को लेकर यूपी सरकार की नीतियों पर प्रहार किया गया, खबरिया चैनलों ने तो घंटों इस मुद्दे के सहारे निकाल दिए। अभी हाल ही में बलात्कार के मामलों को लेकर भी ऐसा दर्शाया गया, जैसे इस तरह के कृत्य कहीं और होते ही न हों। खैर, ये मीडिया है जो चाहे कर सकता है। जो मीडिया जिंदा को मुर्दा बता दे और माफी भी न मांगे, उसकी तारीफ के लिए शब्द खोजे से भी न मिलेंगे। फिलहाल तो खबरिया बाजार में धोनी एंड कंपनी छायी हुई है, लेकिन नाकारात्मक कारणों से। इंगलैंड की फर्राटा पिचों पर भारतीय खिलाडिय़ों के समर्पण की दास्तान हर चैनल की बड़ी खबर है, चैनल के साथ-साथ अखबार वाले भी आलोचनाओं के शब्दों से खिलाडिय़ों की आरती उतार रहे हैं। वैसे कुछ हद तक इसमें कोई बुराई भी नहीं है। हमारे विश्वविजेता ऐसे खेल रहे हैं, जैसे गल्ली-मोहल्ले में बच्चे खेला करते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चे भी एक बार के लिए इस बड़े-बड़े  नाम वाली टीम से अच्छा खेल लेते हों। क्योंकि उनका पूरा ध्यान सिर्फ खेल पर होता है, जबकि हमारे क्रिकेटरों के पास विज्ञापनों की शूटिंग से लेकर रैंप पर चलने जैसे सैंकड़ों काम होते हैं। लाड्र्स पर खेले गए ऐतिहासिक मैच में हमारे धुरंधर ताश के पत्तों की तरह बिखर गए, इस बिखरने को वार्मअप माना गया। अक्सर टीम इंडिया की तुलना अमिताभ बच्चन से की जाती है, जिस तरह बिग-बी गुजरे जमाने में पहले मार खाते थे फिर मार खिलाते थे उसी तरह टीम इंडिया पहला मैच हारने के बाद वापसी करती है। ऐसी आम धारणा बन गई है। किसी भी हिंदुस्तानी से पूछो, वो यही कहेगा कि अगले मैच में हमारे खिलाड़ी जान लगा देंगे। कई मौकों पर ऐसा हुआ भी है, लेकिन इंगलैंड के सामने ये धारणा गलत साबित हुई। जिन गलतियों के चलते पहले मैंच में मुंह की खानी पड़ी, दूसरे मैच में उन गलतियों का प्रतिशत पहले से भी ज्यादा रहा। थोड़ी-बहुत जो इज्जत बची वो सिर्फ राहुल द्रविड़ की वजह से, वही राहुल द्रविड़ जिन्हें मौजूदा टीम के कुछ खिलाड़ी विदा होते देखना चाहते हैं। क्रिकेट के तमाम प्रशंसक भी इस दीवार को नगर निगम द्वारा खड़ी की गई जर्जर दीवार की तरह देखने लगे थे, लेकिन राहुल ने साबित किया कि दीवार में सीमेंट और बालू का बेजोड़ मिश्रण है। दोनों मैचों में उन्होंने शतक जमाए, टेंटब्रिज में तो वो मात्र ऐसे खिलाड़ी थे जो आखिरी तक संघर्ष करते नजर आए। हांलाकि सचिन तेंदुलकर ने भी अद़र्धशतक जमाया, लेकिन उसकी तुलना राहुल की पारी से नहीं की जा सकती। अ्रगर दूसरे छोर से विकेट गिरने का सिलसिला जारी न होता तो निश्चित तौर पर टीम एक सम्मानजनक बढ़त ले सकती थी। इन दो मैचों में सबसे ज्यादा खराब प्रदर्शन किसी का रहा तो वो कप्तान धोनी का। उन्हें देखकर ऐसा महसूस ही नहीं हुआ कि वो विकेट पर टिकने के इरादे से आए हैं। सही मायनों में कहा जाए तो उन्होंने बल्ला थामकर क्रीज तक आने की महज रस्मअदायगी की। टेंटब्रिज में जब भारत को उनसे बड़ी और लंबी पारी खेलने की उम्मीद थी, तब कप्तान साहब बिना खाता खोले ही पवैलियन लौट गए। सबसे ज्यादा हैरानी की बात तो ये है कि हार के लिए अपने प्रदर्शन को जिम्मेदार ठहराने के बजाए उन्होंने थकान का तर्क दिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धोनी का कहना है कि अत्याधिक दौरों के चलते थकान खिलाडिय़ों की क्षमताओं पर हावी हो रही है। इसमें कोई दोराय नहीं कि विश्वकप के बाद से हमारे खिलाड़ी लगातार खेले जा रहे हैं, ऐसे में थकावट होना स्वाभिक है। लेकिन इस थकावट का असल स्त्रोत दौरे नहीं बल्कि आईपीएल है। वल्र्ड कप जीतने के बाद खिलाड़ी चाहते तो आराम कर सकते थे, किसी ने उनके सिर पर बंदूक नहीं तानी थी कि उन्हें खेलना ही पड़ा। तकरीबन दो महीने तक चले आईपीएल में टीम इंडिया के धुरंधरों ने धना-धना रन बरसाए। तब उन्हें थकावट महसूस नहीं हुई, मगर जब बात वेस्टइंडीज जाने की हुई तो सचिन सहित कई खिलाडिय़ों को काम आराम याद आ गया। इसलिए धोनी महाश्य अपनी नाकामी का ढीकरा थकान पर नहीं फोड़ सकते। लचर प्रदर्शन के लिए उन्हें स्वयं जिम्मेदारी लेनी होगी। बतौर कप्तान धोनी के इस तरह के बयान दूसरे खिलाडिय़ों को भी अपनी नाकामी छिपाने का मौका देने वाले साबित होंगे। आज कप्तान ये बोल रहा है, कल बाकी खिलाड़ी भी यही राग गाएंगे। बेतहर तो ये होता कि धोनी सहजता से खामियों को स्वीकारते। खैर, अब वापस मीडिया के रुख पर चलते हैं। धोनी एंड कंपनी की हार का सबसे गहरा सदमा शायद मीडिया को लगा है और इस सदमे से निकलने के लिए वो टीम इंडिया के कथित धुरंधरों को खलनायक बताने में लगी है। यहां सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि जो खिलाड़ी कल तक मीडिया के लिए हीरो की तरह थे, जिनके नाम पर घंटों तक दर्शकों-पाठकों को झिलाया जाता रहा, क्या एक-दो हार से वो इतने बुरे हो गए कि उन्हें खलनायक साबित किया जा रहा है। अव्वल तो मीडिया को किसी का गुणगान करने से पहले थोड़ा-बहुत सोच विचार करना चाहिए, और अगर सोचने के लिए उसके पास भी दिमाग की कमी है तो कम से कम एकदम से किसी को इतना नीचे नहीं गिराना चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल तक मीडिया की नजरों में धोनी दुनिया के सबसे सफलतम कप्तान थे, खबरिया बाजार उनकी मैनेजेंट पावर की तारीफों के पुल बांधा जा रहा है। विश्वविजेता बनने के बाद मीडिया वालों ने लेडी लक यानी साक्षी की धोनी की लाइफ में इंट्री से पड़े प्रभावों तक को सबके सामने सुना-दिखा डाला। टॉक शो आयोजित कर धोनी की काबलियत के बारे में चर्चाएं की गईं, उन्हें भारतीय किक्रेट का सबसे अनमोल सितारा बनाया गया। लेकिन जैसे ही उनकी नाकामयाबी का दौर शुरू हुआ, मीडिया का मिजाज ही बदल गया। हकीकत ये है कि मीडिया ने ही खिलाडिय़ों को खिलाड़ी नहीं रहने दिया। उसने खिलाडिय़ों का गुणगान कर उन्हें इतनी ऊंचाई पर बैठा दिया जहां से क्रिकेट पर ध्यान केंद्रीय करना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है। मीडिया अगर रंक को राजा और राजा को रंक बनाने की मानसिकता से बाहर निकल जाए तो शायद बाकी चीजों के साथ क्रिकेट का भी कुछ भला हो सके। फिलहाल तो धोनी एंड कंपनी की असफलताओं की कहानी कुछ और वक्त तक हमसबको बोर करती रहेंगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-988642360127191183?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/988642360127191183/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=988642360127191183' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/988642360127191183'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/988642360127191183'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='धुरंधरों की पराजय और मीडिया का मिजाज'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-sefuShcTaDA/TjmV2b93E7I/AAAAAAAAAG0/eZfzX2no8-Y/s72-c/images.jpeg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-7414375540322321549</id><published>2011-07-28T11:54:00.000-07:00</published><updated>2011-07-28T11:56:18.275-07:00</updated><title type='text'>महंगाई के नाम पर फिर ब्याज का बोझ</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-hd8paQVswgo/TjGwxOSs7uI/AAAAAAAAAGs/rQiI3q2T3q0/s1600/emi.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 243px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-hd8paQVswgo/TjGwxOSs7uI/AAAAAAAAAGs/rQiI3q2T3q0/s320/emi.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5634478968513818338" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीरज नैयर&lt;br /&gt;महंगाई अब ऐसा विषय हो गई है जिसपर बहस का कोई मतलब नहीं निकलता। जिस तरह एक मूक-बाघिर इंसान के सामने लाख चीखो-चिल्लाओ उस पर कोई असर नहीं होता ठीक वैसे ही सरकार के सिर पर भी जूं रेंगना बंद हो गया है। शायद यही वजह है कि विपक्षी दल भी थोड़े-बहुत हल्ले के बाद खामोश हो जाते हैं। उन्हें भी लगने लगा है कि गले पर जोर डालने का कोई फायदा नहीं। महंगाई के मोर्चे पर किसी भी सरकार की इतनी बुरी स्थिति पहले कभी देखने को नहीं मिली। पूर्ववर्ती राजग सरकार के कार्यकाल में भी कई दफा आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान पर पहुंचे, लेकिन थोड़े वक्त में नीचे आने की प्रक्रिया भी शुरू हुई। लेकिन मौजूदा वक्त में तो दाम आसमान से अंतरिक्ष में जा पहुंचे हैं। ऐसा लगता है, जैसे सरकार के पास चढ़ते दामों पर काबू पाने के लिए कोई नीति ही नहीं है, सिवाए रिजर्व बैंक के। पिछले 11 महीनों में रिजर्व बैंक 16 बार ब्याज दरों में इजाफा कर चुका है। अभी हाल ही में उसने सीधे आधा प्रतिशत की बढ़ोतरी की है, ये बढ़ोतरी कुछ हद तक पेट्रोल के दामों में एकमुश्त की गई पांच रुपए की वृद्धि के समान है। ये तो सब जानते थे कि रिजर्व बैंक एक बार फिर महंगाई के नाम पर आम जनता की जेब ढीली करेगा, मगर एक साथ आधा फीसदी बढ़ोतरी के बारे में किसी ने नहीं सोचा था। इस आधे प्रतिशत का बोझ क्या होता है, ये सिर्फ उसे वहन करने वाला ही बता सकता है। सरकार और केंद्रीय बैंक के लिए तो ये महज एक छोटा सा आंकड़ा है। तमाम अर्थशास्त्री रिजर्व बैंक के रास्ते महंगाई पर नियंत्रण की रणनीति पर विश्वास रखते हैं, खासकर सरकार में शामिल आंकड़ेबाजों के लिए तो यह रणनीति घर में लगे पेड़ की तरह हो गई जिसके फल तोडऩे से पहले तनिक भी सोचना नहीं पड़ता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्याज दर में वृद्धि से बैंकों को रिजर्व बैंक से मिलने वाला कर्ज महंगा हो जाता है और वो इसका बोझ अपने ग्राहकों पर डालने में जरा सी भी देर नहीं करते। रेपो या रिवर्स रेपा दर बढ़ाने के पीछे गणित ये लगाया जाता है कि कर्ज महंगा होने से लोगों की परचेजिंग पावर घटेगी, जिससे बाजार में मांग कम होगी और मांग और उपलब्धता के बीच की खाई को पाटा जा सकेगा। नतीजतन चढ़ते दामों पर ब्रेक लगेगा। किसी भी वस्तु की कीमतों में इजाफा उसकी उपलब्धता या उत्पादकता पर निर्भर होता है, यदि बाजार में मांग ज्यादा है और स्टाक कम तो निश्चित तौर पर उसके दाम बढ़ेंगे। वैसे भी आजकल लोन सुविधा ने आम आदमी को भी बड़े-बड़े सपने देखना सिखा दिया है। लोन धीमे जहर की तरह है जो किश्तों में अपन असर दिखाता है, इससे हर कोई वाखिफ है मगर फिर भी लोग इसे चखना चाहते हैं क्योंकि उनके पास एकमुश्त रकम नहीं होती। मौजूदा वक्त में टीवी से लेकर घर तक सबकुछ किश्तों पर उपलब्ध है, इन किश्तों की बदौलत आम आदमी भी काफी हद तक संपन्न नजर आने लगा है। अर्थशास्त्रियों को आम आदमी की बस यही संपन्नता चुभ रही है, उन्हें लगता है कि कर्ज महंगा करने से आम इंसान बड़े-बड़े सपने साकार करने की कोशिश नहीं करेगा और संपन्नता को अमीरों के लिए ही छोड़ देगा। कागजी तौर पर मांग और उपलब्धता की खाई पाटकर महंगाई की लगाम कसने की यह रणनीति बहुत असरकारक  प्रतीत होती है, लेकिन हकीकत शायद इससे कोसों दूर है। अगर ऐसा न होता तो रिजर्व बैंक को हर थोड़े अंतराल में जनता की जेब काटने की जरूरत ही न पड़ती। ये बात सही है कि इस तरह की नीतियों के परिणाम तात्कालिक तौर पर सामने नहीं आते, लेकिन ब्याज दरों में वृद्धि की ये प्रक्रिया भी काफी लंबे वक्त से चल रही है। रिजर्व बैंक पिछले 11 महीनों से कर्ज महंगा किए जा रहा है, और 11 महीने कोई छोटी अवधि नहीं होती। इस फैसले का वास्तव में यदि महंगाई पर कोई असर दिखाई देता तो कम से कम आम आदमी को एक मोर्चे पर तो कुछ राहत मिलती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बार-बार ब्याज बढ़ोतरी से तो उसके लिए जिंदगी और भी ज्यादा मुश्किल हो गई है। एक तरफ वो पेट भरने की जुगत करे तो दूसरी ओर किश्त चुकाने की। इन दोनों के बीच में तालमेल बिठाते-बिठाते ही बेचारे का दम निकला जा रहा है। महंगाई थामने के दूसरे भी उपाए हैं, लेकिन सरकार उनको अपनाने के बजाए रिजर्व बैंक के रास्ते आर्थिक मजबूती के अपने एजेंडे को पूरा करने में लगी है। लोगों ने अगर किश्तों के सहारे बड़े-बड़े सपने देखना सीखा है तो उसके गुनाहगार वो खुद नहीं सरकार और स्वयं रिजर्व बैंक हैं। पहले तो लोन को इतना सरल बनाया गया कि आम इंसान को यह बोझ भी हलका लगने लगा और जब इस हल्के बोझ के सहारे उसने सपनों को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाया तो ब्याज दरें बढ़ाकर उसके पैरों में जंजीरें लगा दी गईं। ब्याज दरों में इजाफा करके रिजर्व बैंक सस्ते लोन का रास्ता संकरा करना चाहता है, लेकिन उसकी इस चाहत में वो लोग भी मारे जाते हैं जो पहले से ही इस रास्ते पर निकल चुके हैं। मसलन, 20 हजार मासिक की तनख्वाह वाले व्यक्ति ने हिसाब-किताब लगाकर घर का सपना पूरा करने के लिए जिस वक्त होम लोन लिया। उस वक्त उसे 5000 प्रति माह की किश्त भरनी पड़ी। इस पांच हजार के लिए उसने अपनी जरूरतों में कटौती करना शुरू कर दिया, लेकिन बार-बार बढ़ती ब्याज दरों से पांच हजार का आंकड़ा धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता गया। नतीजतन उसकी जरूरतों का दायरा और सिमट गया। लेकिन इस दायरे को इंसान एक हद तक ही सिमटा सकता है, इसके बाद उसके लिए लोन बंद करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं होगा। मगर लोन बीच में बंद करने का मतलब है, अब तक अपना पेट काट-काटकर जितना भी उसने बैंक को दिया वो सब पानी में चला गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार ब्याज बढ़ाकर लोन को काफी हद तक साहूकारों से मिलने वाला कर्ज बना रही है, जिसका ब्याज हर दिन बढ़ता रहता है और अंत में उसे चुका पाने में असमर्थ व्यक्ति को मौत की छुटकारा नजर आती है। लोन प्रक्रिया अगर कड़ी करनी ही है तो ऐसे प्रावधान किए जाएं कि पुराने ग्राहकों पर इसका बोझ न पड़े और अगर पड़ता भी है तो उसका प्रतिशत काफी कम हो। नए ग्राहकों को अगर लोन की किश्तें ज्यादा लगेंगी तो वो खुद इससे पूरी बना लेगा, लेकिन जो पहले ही लोन ले चुका है उसके पास ऐसा कोई विकल्पनहीं है। रिजर्व बैंक को धड़ाधड़ ब्याज दरें बढ़ाने से पहले इस दिशा में भी सोचने की जरूरत है। साहूकार की जिस प्रथा से देश ने बाहर निकलना सीखा है, सरकार और रिजर्व बैंक की नीतियां उसे वहीं वापस लिए जा रही हैं। बेहतर होगा कि सरकार महंगाई के नाम पर आम आदमी की परेशानियों में इजाफा करने के बजाए कोई दूसरा रास्ता निकाले।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-7414375540322321549?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/7414375540322321549/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=7414375540322321549' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/7414375540322321549'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/7414375540322321549'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/07/blog-post_28.html' title='महंगाई के नाम पर फिर ब्याज का बोझ'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-hd8paQVswgo/TjGwxOSs7uI/AAAAAAAAAGs/rQiI3q2T3q0/s72-c/emi.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-8746756409566012984</id><published>2011-07-24T11:59:00.000-07:00</published><updated>2011-07-24T12:01:27.516-07:00</updated><title type='text'>सलवा जुडूम बंद होने के मायने</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-xCrV2KIVggw/Tixr_LYQkDI/AAAAAAAAAGU/FvWnjd9z7ks/s1600/Salwa-Judum.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 250px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-xCrV2KIVggw/Tixr_LYQkDI/AAAAAAAAAGU/FvWnjd9z7ks/s320/Salwa-Judum.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5632995967064117298" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीरज नैयर&lt;br /&gt;सलवा जुडूम पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उन आदिवासियों के भविष्य पर सवाल खड़ा हो गया है जो सालों तक बंदूक उठाए नक्सलियों का सामना करते रहे। अब न तो उनके पास बंदूकें रहेंगी और न ही राज्य सरकार की तरफ से मिलने वाली मदद। मदद के नाम पर वैसे तो उन्हें कुछ खास नहीं मिलता था, लेकिन जो थोड़ा बहुत मिल रहा था अब उसका रास्ता भी बंद हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सलवा जुडूम को असंवैधानिक करार देते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा है कि आप आदिवासियों को भर्ती कर सकते हैं, लेकिन उन्हें हथियार नहीं दे सकते। सर्वाच्च न्यायालय और कुछ गैर सरकारी संगठनों को लगता है कि सलवा जुडूम की आड़ में मासूम आदिवासियों का शोषण हो रहा है। उन्हें जबरन बंदूक थमाकर नक्सलियों के आगे फेंका जाता है। सलवा जुडूम के कार्यकर्ताओं पर बलात्कार जैसे कई संगीन आरोप भी लगे हैं। यह आंदोलन मूलत: आम आदिवासियों द्वारा माओवादियों के जुल्मो-सितम से आजिज आने के बाद शुरू किया गया। लेकिन बाद में राज्य सरकार की तरफ से इसे मदद मिलने लगी। सलवा जुडूम में शामिल लड़ाके स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर अपने दुश्मनों से मोर्चा लेने लगे। इन लड़ाकों ने कई मोर्चों पर नक्सलियों को मात भी दी। मगर लगातार लग रहे आरोपों ने इस अभियान की धार को कुंद कर दिया। सलवा जुडूम और इस पर हुए बवाल को विस्तार से समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे चलना होगा। सलवा जुडूम बस्तर की गोंडी बोली से उपजा शब्द है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें सलवा का अर्थ शांति और जुडूम का अर्थ एकत्र होना है। यानी इसका शाब्दिक अर्थ हुआ शांति अभियान। इस आंदोलन की असल शुरूआत छत्तीसगढ़ के बीजापुर से 2005 में हुई। महज थोड़े से वक्त में यह आंदोलन जंगल में आग की तरह फैल गया, नक्सलियों के सताए आम आदिवासी बड़ी तादाद में इससे जुड़ते चले गए। पेशे से शिक्षक मधुकर राव को इस आंदोलन का जनक माना जाता है। मधुकर इस बात को अच्छे से जानते थे कि नक्सली आदिवासियों के हितैषी नहीं। इसलिए उन्होंने लोगों को संगठित करके नक्सलियों से मुकाबले के लिए आदिवासियों की फौज खड़ी की। शुरूआत के दौर में सलवा जुडूम को मिली सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि खुलकर इसकी मुखालफत करने वाले भी बाद में आंदोलन से जुड़ते गए। न केवल आदिवासी बल्कि राजनीतिज्ञों ने भी इस में भागीदारी निभाई। कांग्रेस नेता और तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा सहित दोनों प्रमुख पार्टियों के कई नेताओं ने माओवादियों से मुकाबला करने वालों का समर्थन किया। सलवा जुडूम को इतने व्यापक जनसमर्थन के चलते स्थानीय पुलिस-प्रशासन ने इसमें शामिल लोगों की सुरक्षा का जिम्मा खुद उठाना शुरू कर दिया। आदिवासियों के लिए कैंप तैयार किए गए, ताकि नक्सलियों के प्रतिशोध से उन्हें बचाया जा सके। इन कैंपों में एक रुपय की दर से प्रत्येक व्यक्ति को अनाज उपलब्ध कराया जाने लगा। नक्सलियों से सीधे मोर्चा लेने वालों को एसपीओ नाम दिया गया, मतलब स्पेशल पुलिस ऑफिसर। इन्हें 2100 रुपए की आर्थिक सहायता भी दी जाने लगी, जिसे बाद में बढ़ाकर 3000 कर दिया। इस आंदोलन पर भले ही कितनी भी उंगलियां उठी हों लेकिन इसके अमल में आने के बाद नक्सलियों का संघर्ष ज्यादा बढ़ा और पुलिस के हाथ भी मजबूत हुए। इस आंदोलन की बदौलत ही छत्तीसगढ़ में पुलिस की पहुंच बढ़ी है। पहले 157 ग्राम पंचायतों में से केवल 70 में ही पुलिस का वजूद था, मगर आज यह संख्या बढ़कर 100 हो गई है। बासगुड़ा और लिंगागिरि आदि कई ऐसे गांव हैं जहां नक्सलियों की मजबूत पकड़ ढीली हुई है। एसपीओ ने माओवादियों को हर कदम पर चुनौती पेश की, यही कारण रहा कि उन्हें बड़े हमलों का भी शिकर होना पड़ा। सलवा जुडूम शुरू होने के तकरीबन एक साल बाद नक्सलियों ने 2006 में कोंटा से लौट रहे लगभग 33 सलवा जुडूम कार्यकर्ताओं को मौत के घाट उतार दिया। इसके एक महीने बाद फिर नक्सलियों ने हमला किया जिसमें 13 कार्यकर्ता मारे गए। इसके बाद तो जैसे हमलों की झड़ी लग गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर नक्सली सलवा जुडूम को अपने लिए खतरे के तौर पर नहीं देखते तो क्या ऐसे हमले संभव थे? जाहिर तौर पर नहीं। भले ही इस आंदोलन में शामिल कुछ लोगों ने नक्सलियों के पद-चिन्हों पर चलने का प्रयास किया। लेकिन इसके लिए पूरे के पूरे आंदोलन पर उंगली नहीं उठाई जानी चाहिए थी। सलवा जुडूम को बदनाम करने के पीछे माओवादियों का भी बहुत बड़ा हाथ हो सकता है, माओवादी अच्छे से जानते हैं कि अपने विरोधियों को रास्ते से कैसे हटाया जाता है। अब वो जमाना नहीं रहा, जब नक्सली आम आदिवासियों के संरक्षक की भूमिका निभाते थे। नक्सल आंदोलन अब महज अपने स्वार्थों की पूर्ति तक सिमट कर रह गया है, इस बात की संभावना बेहद ज्यादा है कि नक्सलियों ने खुद आदिवासियों पर जुल्म ढाय हों और बाद में इल्जाम एसपीओ पर मढ़ दिया गया। ये बात सही है कि इस आंदोलन में बिना प्रशिक्षण के आदिवासियों को नक्सलियों से मुकाबले को तैयार किया जा रहा था, इस तरह उनकी जान हरपल जोखिम में थी। लेकिन बिना हथियार उठाए भी क्या वो सुरक्षित महसूस कर सकते हैं, इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए था। जलवा जुडूम से जुडऩे के बाद आदिवासियों को केवल नक्सलियों के प्रतिशोध का सामना करना पड़ता था, मगर इससे दूर रहने की स्थिति उनके लिए ज्यादा खतरनाक थी। पुलिस नक्सलियों के शक में उनका उत्पीडऩ करती थी और नक्सली मुखबिर के शक में । सलवा जुडुम को बंद करने के बजाए उसके अंदर की खामियों को दूर करने के बारे में सोचा जाने की जरूरत थी। आम आदिवासी जो अपनों पर हुए अत्याचारों का बदला लेने के लिए हथियार उठाना चाहते, उन्हें बकायदा प्रशिक्षण के साथ पुलिस के सहयोग के लिए शामिल किया जा सकता था। सलवा जुडूम अगर वास्तव में शोषण का एक जरिया होता तो दूसरे राज्य इसका अनुसरण नहीं करते। पश्चिम बंगाल और उडीसा में आदिवासी सलवा जुडूम की तर्ज पर आंदोलन कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पश्चिम बंगाल में तो उन्हें कुछ राजनीतिक व्यक्तियों का भी समर्थन प्राप्त है। सलवा जुडूम के बंद होने से नक्सलियों के हौसले और बुलंद होंगे, जो आदिवासी सुरक्षाबलों के सहयोग की भावना रखते थे वो भी इस भावना को जाहिर करने में कतराएंगे। सबसे बड़ी समस्या तो उन लोगों के सामने खड़ी है जो कल तक बंदूक और सरकारी सहयोग के बल पर नक्सलियों को ललकारते रहे। उनकी सुरक्षा अब कौन करेगा? हथियार छिनने के बाद अब वो स्वयं की सुरक्षा की स्थिति में बिल्कुल नहीं हैं। कुल मिलाकर सलवा जुडूम के अंत से उन आम आदिवासियों को ही परेशानियों का सामना करना पड़ेगा जिनके नाम पर इसे बंद किया गया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-8746756409566012984?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/8746756409566012984/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=8746756409566012984' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/8746756409566012984'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/8746756409566012984'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/07/blog-post_24.html' title='सलवा जुडूम बंद होने के मायने'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-xCrV2KIVggw/Tixr_LYQkDI/AAAAAAAAAGU/FvWnjd9z7ks/s72-c/Salwa-Judum.jpg' height='72' 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स्थिति भी पहले चोर की माफिक हो गई है, और इसकी वजह है मीडिया।  मीडिया में आजकल उत्तर प्रदेश छाया हुआ है, कानून व्यवस्था पर सवाल उठाती खबरें तकरीबन हर रोज देखने-सुनने में आ जाती हैं। पिछले कुछ दिनों से बलात्कार के मामलों पर मीडिया वाले ज्यादा नजर गड़ाए हुए हैं। ऐसा लगता है जैसे उनकी मंशा यूपी को रेप कैपिटल करार देने की है। वैसे जिस तरह से एक के बाद एक बलात्कार के मामले सामने आ रहे हैं वो वाकई चिंताजनक है और पुलिस प्रशासन को कटघरे में खड़ा करते हैं। महज चंद घंटों में चार-पांच घटनाएं छोटी बात नहीं है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इस तरह की घटनाएं केवल यूपी तक ही सीमित हैँ। दूसरे राज्यों में नाबालिगों को हवस का शिकार बनाया जा रहा है, अभी हाल ही में मुंबई में एक दिन में दो रेप के मामले सामने आए। दो अलग-अलग जगह एक नाबालिग और एक विधवा को शिकार बनाया गया। लेकिन इस पर मीडिया में कोई हो-हल्ला नहीं मचा। न तो खबरिया चैनलों ने इन घटनाओं को तवज्जो दी और न ही अखबारों ने इन्हें प्रकाशित करने की जहमत उठाई। अपराध तो अपराध है फिर चाहे वो यूपी में हो या महाराष्ट्र में। अगर मीडिया यूपी के जंगलराज को जंगल में आग की तरह फैलते दिखा सकती है तो उसे दूसरे राज्यों में बढ़ते अपराध को भी उसी तरह से देखना चाहिए। इस बात में कोई दो राय नहीं कि उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था के हाल अच्छे नहीं हैं। सत्ता में बैठी पार्टी के सदस्य और विधायकों की जुर्म में हिस्सेदारी भी सामने आ रही है। चंद रोज पहले एक बीएसपी विधायक की गाड़ी में सवार लोगों ने युवतियों से बलात्कार का प्रयास किया। हालांकि पुलिस ने इसमें कार्रवाई की लेकिन कार्रवाई सजा तक पहुंचेगी इसमें अभी भी संशय बना हुआ है। बांदा रेप कांड, इंजीनयिर हत्या कांड की असलियत हर कोई जानता था। लेकिन फिर भी इसका ये मतलब नहीं कि अपराध अकेले उत्तर प्रदेेश में ही होते हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने जनवरी में जो आंकड़े जारी किए थे उनके मुताबिक मध्यप्रदेश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाला इंदौर इस मामले में देश में सबसे अव्वल रहा। इंदौर के बाद भोपाल और फिर जयपुर अपराध के पायदान पर रहे। जहां तक दिल्ली की बात है तो पूरे देश में हुए बलात्कार की घटनाओं में उसके कोटे में एक चौथाई आए। इसी तरह अपहरण के एक तिहाई मामले दिल्ली के खाते में गए। दहेज हत्या और छेड़छाड़ में भी देश की राजधानी का दबदबा रहा। उत्तर प्रदेश इस सूची में इन सब शहरों से नीचे रहा, महिलाओं के साथ अपराध के मामले में यूपी को 26वां स्थान मिला। फिर भी मीडिया यूपी को अपराधियों का गढ़ साबित करने से नहीं चूकता। 2011 के शुरूआती चार महीनों में ही केरला में 357 रेप के मामले सामने आ चुके हैं, यानी एक दिन में तीन से ज्यादा बलात्कार। बावजूद इसके खबरचियों का ध्यान इस ओर नहीं गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूपी के साथ अक्सर ऐसा होता है कि उससे जुड़ी छोटी से छोटी खबर को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है लेकिन दूसरे राज्यों की बड़ी से बड़ी घटना को भी मामूली करार दिया जाता है। उत्तर प्रदेश को लेकर जिस तरह का रुख मीडिया ने अपना रखा है उससे तो यही लगता है कि वो एंटी यूपी मिशन पर है। दरअसल, अगले साल यूपी में विधानसभा चुनाव होने हैं, इसलिए विपक्षी दल खासतौर पर कांग्रेस राज्य में माया विरोधी हवा को और तेज करना चाहते हैं इसलिए मीडिया के राजनीतिक करण से इंकार नहीं किया जा सकता। वैसे भी आज के वक्त में मीडिया की विश्वासनीयता बची ही कहां है। सब जानते हैं कि खबर के लिए कैसे पूरी की पूरी कहानी खुद ही रच दी जाती है। राहुल गांधी ने जब भट्टा परसौल में बलात्कार और हत्याओं के आरोप लगाए तो मीडिया वालों के लिए यही सच हो गया। चैनल से लेकर अखबार तक मायाराज को जंगलराज से भी बदतर बताया गया, लेकिन ये जानने की कोशिश नहीं की गई कि आखिर आरोपों में कितनी सच्चाई है। अब जब ये साफ हो गया है कि भटट परसौल पर राहुल गांधी के आरोप निराधार थे तो खबर गढऩे वाले खामोश बैठे हैं। अब न उन गांवों में कैमरे दिखाई देते हैं और न कलम थामे पत्रकार। जो मीडिया पूर्व राष्ट्रपति की मौत की झूठी खबर फैला दे और माफी भी न मांगे उसकी विश्वसनीयता क्या होगी ये बताने की शायद जरूरत नहीं। हाल ही में एक टीवी चैनल के पत्रकार के साथ पुलिस की बदसलूकी के बाद तो खबर्ची जमात माया सरकार के खिलाफ खुलकर सड़क पर उतर आई है। प्रदर्शन हो रहे हैं, नारे लगाए जा रहे हैं। इस बहती गंगा में कांग्रेस और सपा भी हाथ धोने में लगे हैं। इस बात की पूरी संभावना है कि आने वाले दिनों में मिशन एंटी यूपी में कुछ और नई कडिय़ा देखने-सुनने में आएं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि मीडिया के निशाने पर यूपी केवल मायावती के शासनकाल में ही आया है, मुलायम सिंह जब मुख्यमंत्री थे तब भी उत्तर प्रदेश की गिनती सबसे बुरे राज्यों में होती थी। तब नेता-अपराधी गठजोड़ और अब की तरह अपराध खबरनवीसों के सबसे प्रिय मुद्दे थे। मायावती के आने के बाद उत्तर प्रदेश में कुछ खास बदलाव नहीं हुआ है, खासकर जनता की मूलभूत जरूरतें वैसे की वैसी हैं। न मुलायम ने उन पर ध्यान दिया और न मायावती दे रही हैं, लेकिन मीडिया में कभी भी यूपी की मूल समस्या को जगह नहीं मिली। जब खबर आती है, अपराध से जुड़ी हुई आती है, अगर मीडिया आम आदमी से जुड़े दूसरे जरूरी मुद्दों को भी इसी प्रमुखता से उठाता तो शायद बिजली-पानी के लिए तरस रही यूपी की जनता को थोड़ी बहुत राहत मिल गई होती। लेकिन मीडिया तो मीडिया ठहरी, उसके लिए केवल वो ही खबरें मतलब रखती हैं जो उसके फायदा का अहसास करा सकें। अपराध के ग्राफ को खुलकर प्रचारित-प्रसारित करने से उन्हें चुप रहने के ऐवज में कुछ न कुछ जरूर मिल जाएगा। अगर यहां से नहीं मिला तो दूसरे दल भी हैं जो मायावती के सिंहासन को हिलाकर अपनी दाल गलते देखना चाहते हैं। ऐसे में खबरगढऩे वालों की तो चांदी ही चांदी है। उत्तर प्रदेश की जनता शायद खुद भी महसूस कर रही होगी कि मायावती की विदाई का वक्त आ गया है, उसने बसपा से जो अपेक्षाएं की थीं वो उस पर खरी नहीं उतर पाई, मगर सिर्फ और सिर्फ यूपी पर ही मीडिया वाले कीचड़ उछालें ये उन्हें भी मंजूर नहीं होगा। बेहतर होगा यदि एक चोर को चोर कहा जाए तो दूसरे को भी इसी नजर से देखा जाए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-2218660627624117919?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/2218660627624117919/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=2218660627624117919' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/2218660627624117919'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/2218660627624117919'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='एक चोर तो दूसरा शरीफ कैसे'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-p2K6gOoUq8E/Tg4di3HbWhI/AAAAAAAAAGM/0abvadEDGK0/s72-c/rape%2Bvictim.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-36921534182326208</id><published>2011-06-26T11:42:00.001-07:00</published><updated>2011-06-26T11:43:20.979-07:00</updated><title type='text'>कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-DEghcsJArf8/Tgd9uEH_IkI/AAAAAAAAAGE/8-Yt1DR14wA/s1600/petrol-price-hike.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 245px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-DEghcsJArf8/Tgd9uEH_IkI/AAAAAAAAAGE/8-Yt1DR14wA/s320/petrol-price-hike.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5622600890130047554" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;सरकार चाहती तो टाल सकती थी मूल्यवृद्धि&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीरज नैयर&lt;br /&gt;कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास, कई दिनों तक कानी कुतिया, सोई उनके पास। मौजूदा वक्त में आम जनता पर बाबा नागार्जुन का ये कटाक्ष बिल्कुल सटीक बैठता है। दिन ब दिन बढ़ती महंगाई ने चूल्हे की आंच को तो हल्का किया ही है साथ ही आटा-दाल पीसने वाली चक्की की रफ्तार भी मंद पड़़ गई है। आलम ये है कि जब तक लोग चढ़ती कीमतों के साथ खुद को ढाल पाते हैं तब तक महंगाई एक और पायदान ऊपर चढ़ जाती है। अभी कुछ वक्त पहले ही पेट्रोल के दाम में एकमुश्त पांच रुपए की बढ़ोतरी की गई थी, इस इजाफे से गडबड़ाए बजट को आम आदमी संभाल पाता इससे पहले सरकार ने उसके मुंह से निवाला छीनने का बंदोबस्त कर डाला। डीजल में 3, रसोई गैस में 50 और केरोसिन में 2 रुपए की बढ़ोतरी की गई है। पेट्रोल के दाम बढऩे का असर कहीं न कहीं सीमित होता है, लेकिन ये बढ़ोतरी आम जनता के लिए कोढ़ में खाज साबित होगी। रसोई गैस के दाम में सीधे 50 रुपए बढऩे का मतलब है मासिक बजट में 100 से 200 रुपए का इजाफा, बात अगर यहां तक ही रहती तो भी एक बार काम चल सकता था मगर डीजल की कीमत में वृद्धि से पूरे के पूरे बजट का खाका ही दोबारा तैयार करना होगा। सरकार के इस कदम के तुरंत बाद ट्रक ऑपरेटरों ने मालभाड़े में 8 से 9 फीसदी इजाफे का ऐलान कर दिया है, यानी आने वाले चंद दिनों में ही खाने-पीने की हर वस्तुओं के दाम अंतरिक्ष में होंगे, आसमान पर तो पहले से ही हैं। डीजल के दाम में बढ़ोतरी से महंगाई में पांच गुना तक इजाफा होता है, हमारे देश में ईंधन की जितनी खपत होती है उसमें 40 फीसदी हिस्सा डीजल का है। पेट्रोल की हिस्सेदारी तो महज 10 प्रतिशत है। सरकार ने इससे पहले 25 जून 2010 को डीजल के दाम 2, गैस  के 35 और केरोसिन कीमत में 3 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी की थी, इस लिहाज से देखा जाए तो सरकार ने पूरे एक साल बाद जनता का बोझ बढ़ाने वाला कदम उठाया। लेकिन इस एक साल में उसकी गलत नीतियां हर रोज जनता के गले पर आरी चलाती रहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;10-12 रुपए किलो में बिकने वाली सब्जियां 80-90 रुपए किलो के भाव तक पहुंच गईं, दाल ने तो ऐसा रंग दिखाया कि आम आदमी उसका असल रंग तक भूल गया। इसलिए मूल्यवृद्धि पर वक्त के अंतराल के सरकारी तर्कों को स्वीकार नहीं किया जा सकता। सामान्य तौर पर यदि आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं चल रही हो तो इंसान अपनी सुख-सुविधाओं में कटौती करता है ताकि उसकी जरूरतों की गाड़ी चलती रही, लेकिन सरकार इससे बिल्कुल उलट ट्रैक पर चल रही है। अपनी सुख-सुविधाओं और ठाठ-बाट में कमी करने के बजाए वो जनता की मूलभूत जरूरतों में भी कटौती करने पर उतारू है। अगर मूल्यवृद्धि इतनी ही जरूरी थी तो सरकार को पेट्रोलियम उत्पादों पर लगने वाले करों को बिल्कुल खत्म कर देना चाहिए था। ये अच्छी बात है कि उसने एक्साइज और कस्टम ड्यूटी कम की है, लेकिन ये कमी मूल्यवृद्धि से पैदा हुई खाई को पाटने में कारगर नहीं है। हमारे देश में पेट्रोलियम उत्पादों पर पहले केंद्र सरकार तरह-तरह के टैक्स लगाती है और इसके बाद राज्य सरकारें करों के फेर में आम जनता का तेल निकाल देती हैं। अनुमान के तौर पर एक लीटर पेट्रोल पर सरकार 14.35 रु पए एक्साइट ड्यूटी, 2.65 रुपए कस्टम (कमी से पहले तक), 7.05 रुपए वैट, 1 रुपए एजुकेशन सेस और करीब 3.08 रुपए अन्य कर लगाती है, इस तरह एक लीटर पेट्रोल पर तकरीबन 28.13 रुपए टैक्स के होते हैं। इसमें राज्यों के करों का आंकड़ा शामिल नहीं है। आमतौर पर सरकार हर बार दाम बढ़ाने के बाद राज्यों से अपने खजाने में कमी की उम्मीद करती है, इस बार भी उसने राज्यों से करों में कमी करने को कहा है। कायदे में तो महंगाई पर हो-हल्ला करने वाले राज्यों को भी जनता के प्रति संवेदनशील बनते हुए उसका बोझ कम करने के लिए आगे आना चाहिए, लेकिन वो इसे पूरी तरह केंद्र की जिम्मेदारी समझते हैं। वैसे काफी हद तक ये गलत भी नहीं है, क्योकि हमेशा बड़ों से ही बलिदान की अपेक्षा की जाती है। पर फिर भी कहीं न कहीं उन्हें ममता बनर्जी से सीख लेने की जरूरत है, ममता ने पश्चिम बंगाल की जनता का बोझ हल्का करने के लिए रसोई गैस पर लगने वाले सैस को कम किया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे राज्य की जनता को मौजूदा मूल्यवृद्धि में 16 रुपए की राहत मिली है।  पेट्रोल पर सबसे ज्यादा कर आंध्र प्रदेश में लगता है, इसकी दर यहां 33 प्रतिशत है। इसके बाद दूसरा नंबर तमिलनाडु का है, यहां सरकार नागरिकों पर 30 फीसदी अतिरिक्त बोझ डालती है। ऐसे ही केरल में 29.1 और पश्चिम बंगाल में 25 फीसदी टैक्स पेट्रोल पर वसूला जाता है। मध्यप्रदेश सरकार पेट्रोल पर 28.75 और डीजल पर 23 फीसदी टैक्स लगाती है। इस मामले में पांडेचरी सबसे नीचे है, यहां पट्रोल पर केवल 15 प्रतिशत कर है, जबकि हरियाण और पंजाब डीजल पर कर लगाने के मामले में सबसे पीछे हैं। हरियाणा सरकार ने अब टैक्स का बोझ थोड़ा और कम कर दिया है। वैसे सरकार अगर चाहती तो डीजल की कीमत में इजाफे को टाल सकती थी, क्योंकि जिस कच्चे तेल की कीमत को आधार बनाकर दाम बढ़ाए गए उसमें नरमी का रुख था और नरमी का प्रतिशत और बढऩे की पूरी संभावना थी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम मूल्यवृद्धि से 48 घंटे पहले नीचे आए थे। सरकार ने वैसे भी टैक्सों में कमी करके तेल कंपनियों के फायदे का रास्ता साफ किया ही था, ऐसे में वो कपंनियों को साफ तौर पर कह सकती थी कि महंगाई के दौर में दाम बढ़ाने के लिए उन्हें थोड़ा इंतजार करना होगा। मगर, उसने जनता से ज्यादा तेल कंपनियों के कथित नुकसान को तरजीह दी,कथित इसलिए क्योंकि बैलेंसशीट में हर साल बढ़-चढ़कर मुनाफा दर्शाया जा रहा है। वित्तीय वर्ष 2008-09 में एचपीसीएल का मुनाफा 574.5 करोड़ पहुंचा था। कुछ इसी तरह इंडियन ऑयल ने 2009-10 में 5556.77 करोड़ और भारत पेट्रोलियम ने 5015.5 मुनाफा कमाया। इसके बाद भी कंपनियों की तरफ से घाटे का रोना रोया जाता रहता है। दरअसल इसे नुकसान नहीं बल्कि अंडररिकवरी कहा जा सकता है। यानी मुनाफे के एक अनुमानित आंकड़े से कम की प्राप्ति। तेल कंपनियां जितने मुनाफे का गणित लगा रही हैं, उन्हें उससे कम मिल रहा है। जिसे नुकसान के तौर पर प्रचारित-प्रसारित किया जा रहा है। सरकार भी खुद आगे बढ़कर कह रही है कि कंपनियों के नुकसान की भरपाई के लिए दाम बढ़ाना मजबूरी थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजबूरी जैसा शब्द आम आदमी के मुंह से तो अच्छा लगता है, लेकिन सरकार जब मजबूरी की बात करने लगे तो उसकी क्षमताओं पर उंगली उठना लाजमी है। बात केवल दाम बढ़ाने की नहीं है, सरकार की नीतियों की भी है। सरकार ने ऐसी नीतियां बना रखी हैं, जिसमें आम जनता के हित के लिए कुछ नहीं। कच्चे तेल के बढ़ते दामों का हवाला देकर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में इजाफा तो किया जाता है, लेकिन उसमें नरमी आने का फायदा जनता को नहीं मिलता। जबकि चीन जैसे दूसरे देशों में दोनों बातों का ख्याल रखा जाता है। कम से कम मौजूदा वक्त में तो सरकार को इस वृद्धि से बचना चाहिए था, अगर दाम बढ़ाने ही थे तो पहले महंगाई को कुछ कम करने के बारे में सोचना चाहिए था। एक तरफ सरकार महंगाई पर चिंता के आंसू बहाती है और दूसरी तरफ उसे भड़काने का इंतजाम करती है, इससे तो यही लगता है कि वो आम जनता के प्रति पूरी तरह से संवेदनशून्य हो चुकी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-36921534182326208?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/36921534182326208/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=36921534182326208' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/36921534182326208'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/36921534182326208'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/06/blog-post_26.html' title='कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' 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border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5617772249274774722" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलिए बाबा का अनशन आखिरकार खत्म हो गया। पिछले नौ दिनों से बाबा के हठ ने बेफिजूल में सरकार को टेंशन दे रखी थी। बेफिजूल इसलिए क्योंकि सरकार बखूबी जानती थी कि इस हठ से होना-हवाना कुछ नहीं है, फिर भी जनता कहीं भावुक न हो जाए ये सोच-सोच कर उसे टेंशन हो रही थी। वैसे खबरनवीसों को छोड़कर बाकी लोगाबाग भी टेंशन में थे, क्योंकि बाबा के अलावा कुछ देखने-सुनने को मिलता ही नहीं था। चाहे अखबार के पन्ने पलटना हो या टीवी के चैनल बदलना हर तरफ बाबा ही बाबा थे। बाबा लंबे समय तक खबरों में लीड करते रहे, और उम्मीद है कि  आगे में सुर्खियों में छाय रहेंगे। वो इसलिए कि सरकार अब टेंशन का बदला लेने पर उतारू हो चुकी है। सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग बाबा की कुंडली खंगालने में लगे हैं, यानी टेंशन लेने की बारी अब बाबा की है। वैसे बाबा के टेंशन का स्तर सरकार के टेंशन से ज्यादा होगा, योगगुरु के पास योग संपदा के अलावा भी बहुत कुछ है। बाबा का अरबों को साम्राज्य है, विदेशों में आइलैंड हैं, ऐसे में पाई-पाई का हिसाब देते-देते मासपेशियां खिंच जाएंगी। तमाम टेंशनों के बावजूद, एक तरह से ये अच्छा हुआ कि बाबा को आंदोलन का चस्का लगा। इस चस्के में उनके योग की जांच पड़ताल भी हो गई। देश से लेकर विदेशों तक योग का डंका बजाने वाले बाबा 200 साल तक जीने का दावा करते रहे, महीनों तक अनशन की रट लगाते रहे। लेकिन नौ दिन चला अढाई कोस की तरह महज नौ दिनों में ही ये योगी पस्त हो गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना पस्त हो गया कि शक्ल मुरझाए हुए छुआरे माफिक हो गई। नौदुर्गे के व्रत में कई आम लोग लॉंग के जोड़े पर ही नौ दिन गुजार देते हैं, मगर असाध्य बीमारियों का रामबाण इलाज बताने वाले रामदेव अपने योग से अपना भला भी नहीं कर सके। फिलहाल तो बाबा नौ दिनों की कमी पूरी करने में जुटे हैं, एक-दो दिन में चेहरे पर पुरानी रंगत लौट ही आएगी। लेकिन पुराने भक्त लौटेंगे या नहीं ये सबसे बड़ा सवाल है और ये सवाल बाबा को भी खाए जा रहा होगा। कहतें हैं ज्यादा चतुराई भी कभी-कभी भारी पड़ जाती है, बेचारे बाबा भी चतुराई में मारे गए। अच्छी-भलि सरकार शीर्षासन करने लगी थी, मगर बाबा मेक इट लार्ज का ख्वाब पाले हुए थे। और अब खुद झुकासन की मुद्रा में हैं। बाबा को अनशन की प्रेरणा जरूर अन्ना से मिली मगर उसका क्लाइमैक्स बिल्कुल बॉलीवुड की मसाला फिल्मों की तरह रहा। रात के अंधेरे में डाकुओं की एंट्री, राबिन हुड टाइप हीरो का अपने समर्थकों की आड़ में भागना लेकिन पकड़े जाना। कुछ अलग था तो बस इतना कि यहां डाकुओं की जगह पुलिस थी। वैसे हमारी पुलिस डाकुओं से कम भी नहीं है, वो कानून तोड़कर लोगों की तुड़ाई किया करते थे ये कानून के साथ लोगों को तोडऩे में विश्वास रखती है। बाबा की अनशन रूपी नौटंकी में सबसे दिलचस्प सीन रहा, योगगुरु का स्त्री के वेष में आना। ऐसा अक्सर गोविंदा की फिल्मों में देखने को मिलता था। गोविंदा को ये महारथ हासिल थी कि लड़की बनकर वो लड़की के अंकल को पटाता और लड़का बनकर लड़की को। लेकिन बाबा एक पुलिस को नहीं पटा पाए। हालांकि पटाना आसान भी नहीं था, एकाध पुलिसवाला होता तो ले-देकर पटा भी लिया जाता, पर रामलीला में लीला करने के लिए 10 हजार खाकीवर्दी वाले मौजूद थे। बाबा के साथ बालाकृष्ण भी भागे, शायद बलाकृष्ण को भागने की अच्छी आदत है इसीलिए बाबा रूप बदलकर भी धरे गए, लेकिन बाबा का बाला पुलिस को चकमा देने में कामयाब रहा। कुछ दिनों तक ढुंढाई मची, पर जैसे ही बात नेपाल तक गई बाला प्रकट हो गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खबरचियोंं को देखते ही आंखों से आंसू टपकाए और एक स्क्रिप्ट पढ़ डाली। बाला का रोना अनशन का सीक्वल था, पहले बाबा के आंसू गिरे और फिर उनके सहयोगी के। वैसे रोने-धोने के सीन की अपेक्षा जनता ने भी नहीं की होगी। योगी से सबको धमेंद्र या सनी देओल के हैंडपंप उखाडऩे जैसे आचरण की उम्मीद थी, मगर बाबा श्वेत-श्याम जमाने की अदाकारा निरुपमा रॉय साबित हुए जिन्हें ज्यादातर लोगों ने कभी हंसते हुए नहीं देखा होगा। मां का किरदार एक तरह से निरुपमा रॉय का पेटेंट था, उनके अलावा मां बनने वाली दूसरी अभिनेत्रियां मां लगती ही नहीं थीं। इस पर्दे की मां को तो चंद पलों के लिए सिनेमाघरों में बैठे दर्शकों की सहानभति मिल जाती थी, मगर हमारे योगी महाराज को वो भी नसीब नहीं हुई। बाबा के आंसूओं को देख केवल उन्हीं के आंसू निकले या जबरदस्ती निकाले जो बस बाबा में ही रम गए हैं। 196 घंटों के इस एपीसोड के अंत के पीछे मान-मनौव्वल को प्रमुख वजह माना जा रहा है, आर्ट ऑफ लिविंग श्रीश्री रविशंकर सहित संतों, नेताओं और बाबा के सैंकड़ों समर्थकों के हठ से बाबा अपना हठ छोडऩे को मजबूर हुए। अगर ऐसे ही मजबूर वो थोड़ा सा पहले हो गए होते तो न रामलीला मैदान में पुलिस की लीला होती और न यूं अस्पताल में पड़े रहना पड़ता। वैसे बाबा की मजबूरी के पीछे मान-मनौव्वल के अलावा भी एक कारण है, वो है सरकार से मिलने वाली टेंशन का टेंशन। योगी को आभास हो चला था कि हठी सरकार पिघलने वाली नहीं है, जो मीडिया कल तक उनके सत्याग्रह को नए भारत के उदय के रूप में प्रचारित कर रहा था उसने भी पलटी मार ली है। इसलिए हठी के आगे हठ करने से कोई फायदा नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जितना ज्यादा हठ होगा उतना ही ज्यादा सरकार और मीडिया वार करते जाएंगे। सरकार तो सरकार ठहरी जिससे दुश्मनी ठान ली उसे सड़क पर लाकर ही मानती है। फिल्म सरकार में जब सरकार यानी अमिताभ बच्चन पूरी गुंडा बिरादरी में भारी पड़ता है तो फिर यहां तो पूरी की पूरी फौज है। प्रणब, चिदंबरम, सिब्बल, सहाय और खुद मनमोहन सिंह। मनमोहन जितने मनमोहनी लगते हैं असल में उतने हैं नहीं। ऊपर से सॉफ्ट और अंदर से हार्ड (कड़क) तभी तो पिटाई जैसे कड़े फैसले चंद घंटों में कर लेते हैं और बाद में अफसोस जताकर अपने सॉफ्ट होने का परिचय देते हैं। महंगाई को ही लें, मनमोहन सिंह कई बार चढ़ते दामों पर चिंता जता चुके हैं, लेकिन फिर भी तेल कंपनियों को पेट्रोल के दाम बढ़ाने की छूट दिए जा रहे हैं। ऐसे में बाबा को छोडऩे का तो सवाल ही नहीं बनता। खैर ये तो सरकार की सरकारियत ठहरी, जहां तक बात मीडिया के बाबा का बैंड बजाने की कवायद की है तो वो इस कला में माहिर है। वो भी पुलिस की तरह लेन-देन में विश्वास रखती है। कुछ मिला तो नायक नहीं तो खलनायक। बाबा को महिमामंडित करके सरकार से बैर लेने के खतरे के आकलन के बाद खबरनवीसों पर से पलभर में ही बाबा प्रेम उतर गया। फिलहाल तो बाबा अपने भविष्य को लेकर चिंता में हैं, और ये चिंता कहीं उनकी चंचलता न हर ले इस बात की टेंशन उन्हें हमेशा रहेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-1126896419561144967?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/1126896419561144967/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=1126896419561144967' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/1126896419561144967'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/1126896419561144967'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/06/blog-post_13.html' title='नौ दिन में क्या से क्या हो गया योगी'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-02mCrhI_W6g/TfZWGLMR9MI/AAAAAAAAAF8/tvKFXZyijFM/s72-c/baba.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-3593997709536791434</id><published>2011-06-11T12:03:00.001-07:00</published><updated>2011-06-11T12:04:07.008-07:00</updated><title type='text'>हुसैन के समर्थन से पहले जरा सोचें</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-Uem4QSVPYlk/TfO8HAzDEtI/AAAAAAAAAF0/wWuqgX6xUVc/s1600/hussain.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 219px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-Uem4QSVPYlk/TfO8HAzDEtI/AAAAAAAAAF0/wWuqgX6xUVc/s320/hussain.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5617039988920357586" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीरज नैयर&lt;br /&gt;मशहूर चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन 9 जून को दुनिया से विदा हो गए। उनकी मौत की खबर ने संपूर्ण कला जगत को स्तब्ध कर दिया। मकबूल साहब बेशक 2006 में भारत से नाता तोड़कर कतर के हो गए थे, लेकिन उनके कद्रदानों की सूची यहां दिन ब दिन लंबी होती गई। कला और संगीत ऐसे हैं जिन्हें सीमाओं के बंधन में नहीं बांधा जा सकता। मकबूल जब कतर में बैठे-बैठे कूचीं चलाते तो रंगों की सुगंध भारत तक महसूस होती। बहुत थोड़े से वक्त में हुसैन साहब एक बहुत बड़ी शख्सियत बन गए। भारत में रहते वक्त भी उनकी कला की विदेशों तक चर्चा होती। एक चित्रकार के तौर पर उनका कोई सानी नहीं था, इसीलिए उन्हें हिंदुस्तान का पिकासो कहा जाता है। कहने वाले कहते हैं कि हुसैन साहब की खींची हुईं रेखाएं बेजान कलाकृति में भी जान डाल देती थीं। उनके जाने के बाद अब उनकी चित्रकारी और उनसे जुड़े विवादों को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। अक्सर किसी के जाने के बाद ही उसके जीवन को फिर से रेखांकित करने की कवायद शुरू होती है। अगर गुजरने वाला कोई बड़ी शख्सियत हो तो तमाम लेखक-पत्रकार उनसे जुड़ी बातों को शब्दों में पिरोने में जुट जाते हैं। जो नहीं जानते थे, वो भी अच्छाइयां-बुराईयां गिनाने लगते हैं। ऐसे ही एक प्रतिष्ठित अखबार में किसी लेखक का लेख पढऩे को मिला। लेख में हुसैन साहब की कला की जितनी तारीफ की गई, उससे ज्यादा उन लोगों को कोसा गया जो उनकी चित्रकारी को अश£ीलता की नजरों से देखा करते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मकबूल फिदा हुसैन के माधुरी प्रेम के साथ-साथ उनकी चर्चा हिंदू अराध्यों की नगन तस्वीरें बनाने के लिए भी होती रही। लेकिन इन लेखक साहिब को इसमें कुछ भी अश£ील और असभ्य नहीं लगा। इस नहीं लगने के पीछे उन्होंने कई तर्क भी दिए। मसलन, जब मां काली की प्रतिमा को अश£ील नहीं माना जाता, शिवलिंग की पूजा-अर्चना करने वालों के मन में उसे लेकर कोई गलत विचार नहीं पनपता तो हुसैन की रेखाओं को नगनता कैसे कहा जा सकता है। इसका मैं एक बहुत सीधा सा जवाब देना चाहूंगा, श्रीकृष्ण का चरित्र और उनकी चंचलता से सब वाकिफ हैं। श्रीकृष्ण जिस राधा से प्रेम करते थे उसके अलावा उनकी कई अन्य गोपियां भी थीं। जिनके साथ उनकी अल्पविकसित या कह सकते हैं संक्षिप्त प्रेम लीलाएं चलीं, जिसे आज के जमाने में फल्र्ट कहा जाता है। वो साक्षात भगवान थे, इसलिए उन्होंने जो कुछ किया वो स्वीकार्य हो गया, लेकिन मौजूदा वक्त में यदि कोई उनका अनुसरण करे तो क्या अच्छी निगाहों से देखा जाएगा? क्या समाज में उसकी वही प्रतिष्ठा होगी जो राम की होती है? शायद नहीं, क्योंकि लोग भगवान को उस रूप में स्वीकार सकते हैं लेकिन आम इंसान को नहीं। इसी तरह से शिवलिंग या काली की मूर्तिके पीछे जो कहानी है उसे चित्रों में उतारना भी स्वीकार योगय नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे भी जिस काली की प्रतिमा का जिक्र लेखक महोदय ने किया है, शायद वो उससे इतने ज्यादा परिचित नहीं, या लिखने से उन्होंने पहले प्रतिमा पर गौर करने की जरूरत ही नहीं समझी। मंदिरों में लगी मां काली की प्रतिमा में ऐसा कुछ है ही नहीं जिसे अश£ीलता की श्रेणी में रखा जा सके, जबकि हुसैन की तस्वीरें रेखाओं में ही नगनता का चित्रण करती हैं। देवी-देवताओं के साथ-साथ हुसैन साहब ने भारत माता का भी बेहद अश£ील चित्रण किया। अगर यह महज कला थी तो उनके मन मेेंं कभी इस्लाम या दूसरे धर्मों की भावानाओं से खेलने का ख्याल क्यों नहीं आया। एक कलाकार धर्म-जात के बंधन से मुक्त होता है, और उसकी सोच भी मुक्त होनी चाहिए। लेकिन हुसैन के साथ ऐसा नहीं था, इसलिए उनकी कूंची सिर्फ हिंदू आस्था के साथ खिलवाड़ करती रही। इस प्रसिद्ध चित्रकार ने सीता और बजरंग बली को जिस रूप में प्रदर्शित किया, वैसा शायद हम-आप सोच भी नहीं सकते। मशाल थामे बजरंग बली पहाड़ लांघे जा रहे हैं और सीता नगन अवस्था में उनकी पूंछ से लिपटी हुई हैं। हिंदुओं के प्रति हुसैन की अश£ीलता महज भगवानों के चित्रण तक ही सीमित नहीं रही, उन्होंने आम इंसानों की छवि को भी उसी रूप में उकेरा। मकबूल साहब की एक पेंटिंग में चोटी धारी पंडित को पूरी तरह निवस्त्र दिखाया गया जबकि पास खड़ा पठान या मौलवी पूरे कपड़ों में हैं। क्या एक समुदाय से जुड़े लोगों और अराध्यों को बिन कपड़ों के कैनवस पर उकेरना ही चित्रकारी है? लेखक महोदय कहते हैं कि हुसैन की तस्वीरों पर बवाल की सबसे बड़ी वजह उनका मुस्लिम होना रहा, दूसरे कलाकारों ने भी ऐसा ही चित्रण किया मगर उनके खिलाफ कभी गुस्सा नहीं पनपा। वैसे लेखक की इस बात में नया कुछ भी नहीं है, हमारे देश में हर बात पर धर्म-समाज की दुहाई देने की परंपरा बन गई है। बॉलिवुड के नामी सितारेां को अगर मकान नहीं मिलता तो उसके लिए मुस्लिम होने का रोना रोते हैं, आजमगढ़ से जब कोई पकड़ा जाता है तो अल्पसंख्कों के प्रति अत्याचार की बाते कहीं जाती है। मैं यहां बस कहना चाहूंगा कि गलत, गलत होता है फिर चाहे वो हिदू करे या मुस्लिम। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां तक बात अश£ली चित्रण करने वाले कलाकारों के खिलाफ आक्रोश की है तो शायद लेखक महोदय कुछ वक्त पहले पणजी में हुए हंगामे को भूल चुके हैं। जेवियर रिसर्च इंस्ट्टीयूट में एक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया था, जिसमें हिंदू देवताओं की कुछ आपत्तिजनक पेंटिंगस भी प्रदर्शन के लिए रखी गई। हिंदूवादी संगठनों ने इस बात पर इतना बवाल मचाया कि उन कलाकृतियों को प्रदर्शनी से हटाना पड़ा। अपनी बात को सही साबित करने के लिए लेखक महोदय एक और तर्क देते हैं, उनका कहना है कि मकबूल फिदा हुसैन ने पैगंबर साहब या किसी दूसरे मुस्लिम धर्मावलंबी का चित्रण इसलिए नहीं किया क्योंकि इस्लाम में चित्र या मूर्ति बनाने की मनाही है, लेकिन हिंदू धर्म में ऐसी कोई मनाही नहीं। इस तर्क का तो यही मतलब निकलता है कि अगर हिंदू मूर्ति उपासक हैं तो उनके खिलाफ किसी भी हद तक जाने की इजाजत है। पैगंबर साहब या अल्लाह की बात तो छोडि़ए हुसैन ने जब कभी मुस्लिम महिलाओं का चित्रण किया, इस बात का ख्याल रखा कि वो बुर्के में हों। हुसैन की चित्रकारी का अगर विरोध होता है तो उसके वाजिब कारण भी हैं, यदि उनकी कूंची सभी के लिए बराबर भाव रखती तो शायद उन्हें देश छोड़कर जाने की जरूरत नहीं पड़ती। इसमें कोई दो राय नहीं कि वो एक बेहतरीन कलाकार थे, लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने लोगों की धार्मिक भावनाओं को बार-बार आहत किया। 1990 में पहली बार धार्मिक भवनााओं को भड़काने वाले उनके चित्र आम जनता के सामने आए, इसके बाद 6 जनवरी 2006 को एक पत्रिका में भारत माता को लेकर उनकी  अभद्र पेंटिंग प्रकाशित हुई। हुसैन ने बवाल के बाद माफी मांगी और चित्र वापस लेने का वादा भी किया, मगर वादा निभाया नहीं। थोड़े वक्त बाद ही उनकी आधिकारिक वेबसाइट पर यह तस्वीर चस्पा कर दी गई। क्या इससे ये पता नहीं चलता कि उनका इरादा जानबूझकर समुदाय विशेष को आहत करने का था।  लेखक महोदय मेरा आपसे बस यही निवेदन है कि हुसैन की नगनता के समर्थन में तर्क देने से पहले जरा तथ्यों पर भी गौर फरमा लेना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-3593997709536791434?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/3593997709536791434/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=3593997709536791434' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/3593997709536791434'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/3593997709536791434'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/06/blog-post_11.html' title='हुसैन के समर्थन से पहले जरा सोचें'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' 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दिल्ली के रामलीला मैदान पर शनिवार की रात जो कुछ भी हुआ, वैसा अक्सर चीन या म्यांमार जैसे मुल्कों में देखने को मिलता है, जहां लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं। इस कार्रवाई के बाद अब तमाम तर्क दिए जा रहे हैं, पुलिस बाबा की जान को खतरा बताते हुए अपनी बर्बरता को जायज ठहरा रही है और कल तक बाबा के सामने शीर्षासन करने वाले मंत्री ये बताने में लगे हैं कि अनुमति योग शिविर की ली गई थी अनशन की नहीं। इन तर्कों को स्वीकार भी लिया जाए तो भी जो किया गया क्या वो जायज है? सरकार के इस दमनकारी कदम ने उसकी दोहरी मानसिकता को भी उजागर किया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ वक्त पहले हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता सैयद अली शाह गिलानी ने दिल्ली में खड़े होकर देश के खिलाफ आग उगली, उनके साथ अरुंधति राय भी मौजूद थी। लेकिन सरकार ने उन पर कोई कार्रवाई नहीं की। अगर बाबा को बगैर अनुमति के अनशन करने पर लाठियां मिल सकती हैं तो गिलानी-अरुंधति पर विषवैमन करने के लिए देशद्रोह का मुकदमा क्यों नहीं चल सकता। जिस कानून का हवाला देकर बाबा के आंदोलन का दमन किया गया, उसी में भड़काऊ भाषणों की सजा का भी उल्लेख है। यदि कानून सबके लिए बराबर है तो ऐसा होते दिखना भी चाहिए। सरकार अब बाबा में खामियां ढू्रढने में लगी है, उनसे आय के स्रोत पूछे जा रहे हैं, आयकर का हिसाब मांगा जा रहा है। ये साबित किया जा रहा है कि बाबा जैसे दिखते हैं, वैसे हैं नहीं। संभव है कि आने वाले दिनों में रामदेव पर कई मामलों में जांच कराई जाए, उन्हें अदालतों के चक्कर लगाने पड़े। लेकिन फिर भी सरकार ये सिद्द नहीं कर पाएगी कि उसने रात के अंधेरे में जो किया सही किया। बाबा की मांगे जायज-नाजायज हो सकती हैं, मगर उनके अनशन पर बैठने को नाजायज कैसे ठहराया जा सकता है। बाबा ने कालेधन के अलावा जो मांगे सरकार के सामने रखीं, उनमें से यादातर शायद आम जनता के भी गले नहीं उतर रही हों पर फिर भी वो ऐसी किसी कार्रवाई का समर्थन हरगिज नहीं करेगी। सबसे पहले तो लोग यही नहीं समझ पा रहे हैं कि सरकार पहले बाबा के कदमों में क्यों बिछ गई, और बिछ गई तो फिर एकाएक ऐसा क्या हुआ की बाबा उसे दुश्मन लगने लगे। सरकार का कहना है कि बाबा रामदेव ने समझौते के तहत अनशन समाप्ति की घोषणा नहीं की, इसलिए उसे कार्रवाई करनी पड़ी। अगर ऐसा था तब भी सरकार को लोगों को भरोसे में लेकर कार्रवाई को अंजाम देना चाहिए था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार के इस कदम का सीधा सा यही मतलब निकलता है कि वो अपने खिलाफ आवाज उठने वाली हर आवाज को कुचलना जानती है। कुछ ऐसा ही 1976 में संपूर्ण क्रांति के वक्त हुआ था, जब जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से घबराई इंदिरा गांधी सरकार ने आंदोलन कुचलने के लिए बर्बर तरीका अपनाया था। उस वक्त शायद इंदिरा गांधी ने नहीं सोचा होगा कि इसकी कीमत उन्हें सत्ता खोकर चुकानी होगी, लेकिन ऐसा हुआ। आपातकाल की मार ने इंदिरा गांधी को घर बैठने को मजबूर कर दिया।  ये बात बिल्कुल सही है कि बाबा के आंदोलन की तुलना जेपी आंदोलन से नहीं की जा सकती, मगर बर्बरता की सजा देना जनता के हाथ में है और वो कब इतिहास दोहरा दे नहीं कहा जा सकता। अनशन से पहले केंद्र सरकार और बाबा के रिश्तों में मधुरता का दौर भी था। बाबा को आश्रम के लिए जमीन उपलब्ध कराने में सरकार की अहम भूमिका रही, लेकिन जब बाबा कालेधन जैसे मुद्दों पर प्रखर हुए तो वो सरकार की आंखों में चुभने लगे। सरकार को अब याद आ रहा है कि स्वामी रामदेव कितनी कंपनियों के मालिक हैं, उनकी अथाह संपत्ति का राज क्या है। उनकी दवाओं पर लगे आरोपों में कितनी सच्चाई आदि.. आदि..। राजनीतिज्ञों को जनता जितनी भोली लगती है, वो उतनी है नहीं। लोगों अच्छे से जानते हैं कि सरकार जो कुछ भी कर रही है वो बदले की भावना से कर रही है। ऐसे में अगर बाबा पर लगे आरोपों में रत्ती भर भी हकीकत सामने आती है तो भी सहानभूति की लहर बाबा के पक्ष में ही होगी। ये बात वास्तव में सोचने वाली है कि आखिर छोटी सी अवधि में रामदेव ने इतना बडा साम्राय कैसे खड़ा कर लिया। मौजूदा वक्त में बाबा 34 कंपनियों के मालिक हैं, वो चाटर्ड प्लेन से नीचे कदम नहीं रखते। अपनी स्वाभिमान यात्रा के बाद मध्यप्रदेश से दिल्ली की यात्रा उन्होंने अपने विशेष विमान से ही की थी। विदेशों में बाबा की संपत्ति है, उनका कारोबार अरबों में हैं। जिस मुकाम पर पहुंचने में लोगों की पूरी जिंदगी निकल जाती है, बाबा वहां तक पलक-झपकते ही पहुंच गए। लेकिन ये सबकुछ जितना चौंकाने वाला लगता है, उससे काफी यादा चौंकाने वाला है सरकार का रवैया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीबीआई, आयकर विभाग या प्रवर्तन निदेशालय जैसी एजेंसियां ऐसे मामलों पर बारीकि से नजर रखती हैं तो फिर उन्हें बाबा की शौहरत-दौलत के बढ़ते ग्राफ पर कभी संशय क्यों नहीं हुआ। इसका सीधा सा जवाब है कि सरकार को उस वक्त बाबा खतरे के रूप में नहीं दिखते होंगे। मगर अब अन्ना हजारे द्वारा जलाई गई भ्रष्टाचार की अलख से बाबा भी प्रभावित हो चुके हैं। लिहाजा उनके विरोधी तेवर सत्ता की चूलें हिलाने का आभास दिलाने लगे हैं। इसलिए अब सरकार को वो दुश्मन नजर आते हैं। मुमकिन है थोड़े वक्त के बाद देश को हिलाने वाला ये मुद्दा ठंडा पड़ जाए, ये भी मुमकिन है कानूनी कार्रवाई के भय से बाबा समझौते की राह पर लौट आएं, लेकिन सरकार के इस दोहरे चरित्र का खामियाजा उसे नहीं उठाना पड़ेगा इसे विश्वास के साथ मुमकिन है नहीं कहा जा सकता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर सरकार बाबा की चिट्टी सार्वजनिक करने के बाद चुपचाप बैठकर तमाशा देखती तो बिना कुछ किए ही उसका काम हो जाता। चिट्ठी सामने आने के बाद लोगों को लगने लगा था कि अनशन महज दिखावा है, ये खुद बाबा की छवि के लिए ही नुकसानदायक होता, लेकिन पुलिसिया अत्याचार का हुक्म देकर सरकार ने एक तरह से अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम किया है। और इस बर्बर कृत्य के लिए उसे कभी माफ नहीं किया जा सकता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-3176215212939929458?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/3176215212939929458/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=3176215212939929458' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/3176215212939929458'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/3176215212939929458'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='बाबा पर लाठी और गिलानी पर प्यार?'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-7652445180645530230</id><published>2011-05-28T02:14:00.001-07:00</published><updated>2011-05-28T02:14:43.946-07:00</updated><title type='text'>सरकारी तंत्र की लापरवाही का खामियाजा जनता क्यों भुगते</title><content type='html'>बीते दिनों मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में अब तक की सबसे बड़ी अतिक्रमण हटाओ मुहिम चलाई गई। इसे सबसे बड़ी इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि ये कार्रवाई रसूखदार लोगों के खिलाफ की गई। सीएम हाउस से इस अभियान की रूपरेखा तैयार की गई और सीएम के शहर से जाते ही उसे अंजाम दे दिया गया। यह पूरी कवायद इतनी गुपचुप रही कि सुबह जब लोगों ने पुलिस फोर्स और बुल्डोजर देखे तो उन्हें माजरा समझ ही नहीं आया, लेकिन सूरज चढ़ते-चढ़ते स्थिति पूरी तरह साफ हो गई। एक रिहाइशी कालोनी में करोड़ों की लागत से बने मॉल को डायनामाइट के सहारे जमींदोज किया गया। दुकानदारों को सामान बटोरने के लिए महज आधे धंटे का वक्त मिला, सालों की मेहनत से तिनका-तिनका जोड़कर उन्होंने जो सपने संजोए थे वो पलक झपकते ही धूल में मिल गए। ये खबर राष्ट्रीय स्तर पर छाई रही, हर खबरीया चैनल ने इसे प्रमुखता से दिखाया। मॉल तोड़ने के अलावा कुछ मकानों को भी अवैध करार दिया गया, हालांकि उन्हें तोड़ने के बजाए प्रशासन ने बीच का रास्ता अपनाया। लेकिन इस बीच के रास्ते से भी लोगों के दिलों की धड़कनें और आशियाना बिखरने का खौफ खत्म नहीं हुआ है। कार्रवाई के पीछे प्रशासन का तर्क है कि मॉल और उसके आसपास का कुछ हिस्सा सरकारी जमीन पर है, इसलिए इसे ध्वस्त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं। निश्चित तौर पर प्रशासन का तर्क दस्तावेजों पर आधारित होगा, इतनी बड़ी कार्रवाई बिना पर्याप्त आधार के नहीं हो सकती, लेकिन इन पर्याप्त आधारों का अहसास उसे 10 साल बाद क्यों हुआ ये अपने आप में सोचने वाली बात है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; जिस जगह कार्रवाई की गई, वो कोई नई बसावट नहीं है, सालों से लोग वहां रह रहे हैं। इस कॉलोनी को आईएसओ प्रमाण पत्र भी मिला है, तमाम बैंकों के एटीएम भी मौजूद हैं। मॉल के जिस हिस्से को तोड़ा गया वहां भी कुछ एटीएम लगे थे। इसके अलावा सबसे बड़ी बात जिन लोगों के घरों को अवैध करार दिया गया उनमें से कई ने लोन लेकर इसे खरीदा था। आमतौर पर बैंक लोन देने से पहले गहरी जांच पड़ताल करती हैं, तो फिर उसने ऐसे मकानों के लिए कर्ज कैसे दे दिया जो सरकारी जमीन कब्जा कर बने थे। बैंक की बातों को नजरअंदाज कर भी दिया जाए तो सबसे बड़ा सवाल सरकारी उदासीनता और लापरवाही का है। आखिर कैसे प्रशासन सालों तक अवैध निर्माण होते देखता रहा। थोड़े-मोटे अतिक्रमण का मामला होता तो फिर भी समझा जा सकता था, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यह 140 एकड़ भूमि का मामला है।  अगर सरकारी दावे सही हैं तो इस मामले में जितना बिल्डर दोषी है उससे कहीं यादा प्रशासन। अमूमन ऐसे मामलों में गलती चाहे किसी की भी हो उसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है। जिन लोगों के रोजी-रोटी का साधन मॉल के अवैध हिस्से के साथ जमींदोज हो गया, उनका इसमें क्या कसूर था। कहने को ये बात जरूर कही जा सकती है कि संपत्ति क्रय-विक्रय से पहले पूरी पड़ताल कर लेनी चाहिए, लेकिन जहां बैंक कर्ज देने को तैयार हों वहां शंकी की गुंजाइश ही क्या रह जाती है। हैरानी की बात है कि अदालतें भी ऐसे मामलों में तोड़फोड़ की कार्रवाई पर यकीन रखती हैं। जबकि तोड़फोड़ से सबसे यादा नुकसान उसी आम आदमी का होना है जो इस पूरे मामले से अंजान था। अदालतों को सबसे पहले संबंधित सरकारी तंत्र से सवाल करना चाहिए कि इतने सालों तक वो क्यों सोता रहा। तोड़फोड़ की कार्रवाई तो काफी हद तक वैसी है जैसे पहले खून होते देखा जाए और जब खून हो जाए तो आरोपी को जाकर पकड़ लिया जाए। वैस ये व्यथा अकेले भोपाल की नहीं है, देशभर में ऐसा ही होता है। आदर्श का उदाहरण हमारे सामने है। दोनों ही मामलों में पहले आंखें मूंद ली गईं और जब विवाद बढ़ा तो कार्रवाई की याद आई। आदर्श को ढहाने तक का फरमान सुनाया गया है, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस फरामन का आधार कई कारणों को बनाया गया, मसलन, आदर्श सोसाइटी ने महाराष्ट्र सरकार से सीजारजेड अधिसूचना के तहत जरूरी मंजूरी हासिल नहीं की। इमारत के लिए मूल रूप से छह मंजिलों का निर्माण होना था, लेकिन बगैर मंजूरी 31 मंजिलें बना दी गईं। अगर सरकार कह रही है तो हो सकता है इस इमारत को खड़ा करने में कानून को ताक पर रखा गया हो, लेकिन बात फिर वही आ जाती है कि  आखिर पर्यावरण मंत्रालय की नींद इतनी देर बाद क्यों खुली। मुंबई कोई गांव तो है नहीं कि इतनी बड़ी इमारत के बनने की खबर शहर से बाहर तक नहीं निकल पाई।  31 मंजिलों का पर्यावरण क्लीयरेंस के बगैर खड़ा होना पर्यावरण मंत्रालय की भूमिका पर भी सवालात खड़े करता है। पर्यावरण मंत्रालय के साथ-साथ रक्षा मंत्रालय की भूमिका भी शक के घेरे में होनी चाहिए। इमारत के तैयार होने के बाद अब उसे अहसास हो रहा है कि यह महत्वपूर्ण रक्षा ठिकाने की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है। इस अवैध इमारत के निर्माण में उन लोगों को सजा क्यों दी जाए जिन्होंने वैध तरीके से अपना आशियाना बनाने का ख्वाब पाला। यदि इमारत ढहाई जाती है तो क्या यह ऐसे लोगों के साथ नाइंसाफी नहीं कहलाएगी। यह वेदांता मामले का उल्लेख करना भी जरूरी है, हालांकि वो तोड़फोड़ से संबंधित नहीं है लेकिन देर से जागने की आदत को बखूबी बयां करता है। वेदांता मामले में भी तब कदम उठाया गया जब काम काफी आगे बढ़ गया था। पूर्व में वेदांता को नियामगिरी से बॉक्साइट निकालने की इजाजत देने के बाद अचानक पर्यावरण मंत्रालय को पर्यावरण को नुकसान का आभास हुआ। 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने भी परियोजना की गहरी छानबीन के बाद वेदांता को आगे बढ़ने की अनुमति दी थी। इसके बाद कंपनी ने अरबों रुपए का निवेश कर डाला। वेदांता की भारतीय सहायक वेदांता एल्युमीनियम लिमिटेड ने तो लांजीगंज में करीब एक अरब डॉलर की पूंजी लगाकर एक बड़ा एल्युमीनियम शोधन संयंत्र तक खड़ा कर डाला, यह स्थान नियामगिरी की तराई में करीब छह वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में स्थित है। यदि वेदांता का प्रोजेक्ट पर्यावरण के लिए वास्तव में घातक था तो शुरूआत में ही उसपर रोक क्यों नहीं लगा दी गई। ऐसा तो हो नहीं सकता कि वेदांता ने क्लीयरेंस मिलने के बाद प्रोजेक्ट में ऐसे बड़े बदलाव कर दिए जिससे पर्यावरण को सौ गुना खतरा बढ़ गया। ऐसे मामले जहां सरकारी तंत्र के नाकारेपन का खामियाजा दूसराें को उठाना पड़ता हैं, वहां अदालतों को यादा सक्रीय होने की जरूरत है। खासकर सालों पुरानी बसावटों पर बुल्डोजर चलाने जैसी कार्रवाई की इजाजत तो मिलनी ही नही चाहिए। अगर अदालत एक-दो मामलों में ऐसी नजीर पेश कर दे तो शायद कुंभकरणी नींद में सोने वाले सरकारी तंत्र को अपनी जिम्मेदारी का अहसास हो सके।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-7652445180645530230?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/7652445180645530230/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=7652445180645530230' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/7652445180645530230'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/7652445180645530230'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/05/blog-post_28.html' title='सरकारी तंत्र की लापरवाही का खामियाजा जनता क्यों भुगते'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-538146411368815944</id><published>2011-05-20T02:09:00.000-07:00</published><updated>2011-05-20T02:10:24.559-07:00</updated><title type='text'>सच, कमजोर ही है जनता की याददाश्त</title><content type='html'>नीरज नैयर&lt;br /&gt;राजनीतिज्ञ अगर ये सोचते हैं कि जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है तो इसमें कुछ गलत नहीं है। कुछ एक ही ऐसे मौके आए होंगे जब जनता ने इस सोच को गलत साबित किया हो, वरना अक्सर वो अपनी कमजोर याददाश्त का परिचय देती रहती है। हालिया संपन्न हुए पांच रायों के विधानसभा में भी उसने वही किया। कुछ दिन पहले तक बढ़ती महंगाई को लेकर यूपीए सरकार को कोसने वाली जनता उसे ही दिल खोलकर वोट दे आई। जबकि माना जा रहा था कि जिस तरह से थोड़े से वक्त में महंगाई ने आसमान छुआ उससे कांग्रेस के वोट प्रतिशत का ग्राफ जरूर नीचे आएगा। वोट देते वक्त जनता ये भी भूल गई कि इसी सरकार के मंत्री उसकी भावनाओं से खिलवाड़ करते रहे, अपनी जिम्मेदारियों से मुंह चुराते रहे और महंगाई के लिए उसी को दोषी ठहराते रहे। क्या शरद पवार और क्या मनमोहन सिंह सबने महंगाई पर जनता के दर्द का उपहास उड़ाया। ऐसा हरगिज नहीं है कि महंगाई ने किसी दूसरी पार्टी के कार्यकाल में सिर नहीं उठाया, जरूर उठाया लेकिन यहां उसके सिर को कुचलने के नाम पर जनता को बार-बार छला गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी सरकार मानूसन का रोना रोते रही तो कभी कम उत्पादन का बहाना बनाया, जबकि सैकड़ों टन अन्न खुले में यूं ही सड़ता रहा। जनता की कमजोर याददश्त ही सरकार को बेरहम और अपने फायदे के हिसाब से नीतियां मोड़ने पर उत्साहित करती है। इधर जनता ने सबकुछ भुलाकर उसे चार रायों में जीत का तोहफा दिया तो उधर इसके बदले में सरकार ने पेट्रोल के दामों में आग लगा दी। चुनावी नतीजों के महज 24 घंटों के भीतर सरकार ने जनता को ये रिटर्न गिफ्ट दिया। दाम तो जनवरी में ही बढ़ने वाले थे, लेकिन संभावित खतरे की आशंका के चलते सरकार ने उस लगाम लगाए रखी। और जैसे ही खतरे का संकट टला जनता को उसकी कमजोर याददाश्त का ईनाम मिल गया। अगर इन चुनावों में कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ता तो निश्चित तौर पर ये मूल्यवृध्दि नहीं होती। सरकार ने बड़ी चतुराई से माहौल को भांपा और जनविरोधी चाल चल दी। कहने वाले यहां कह सकते हैं कि जनता के पास विकल्प नहीं था, वो मजबूर थी। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है, उसके पास विकल्प था मगर वो अपनी बीमारी से उबर नहीं पाई। भाजपा को अगर बहुत अच्छा विकल्प नहीं माना जा सकता तो वो कोई इतना बुरा विकल्प भी नहीं है कि जिसे मौका दिया ही न जाए। जब कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार एक के बाद एक जनविरोधी फैसले ले रही है तो फिर सत्ता में रखना कहां तक जायज है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि एक राजा अपनी प्रजा के साथ निरंकुशता पर उतर आए तो फिर उसके रहने न रहने से क्या फर्क पड़ता है। जितने बुरे हालात अभी हैं इससे बुरे और क्या हो सकते हैं, सरकार अपनी विलासता में कमी नहीं करना चाहती वो सारा का सारा बोझ जनता से  उठवाने वाले अड़िग है।  इन पांच रायों के बाद अगला चुनाव अब सीधे अगले साल है। 2012 में उत्तर प्रदेश में चुनाव होने हैं, इस बीच के वक्त में सरकार दिल खोलकर आर्थिक सुधाराें के नाम पर जनता का बैंड बजाएगी। इस बार पेट्रोल के दाम सीधे पांच रुपए बढाए गए, अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि एक बार में इतनी बड़ी वृध्दि की गई हो। यूं तो पेट्रोल के दाम निधार्रित करने का जिम्मा तेल कंपनियों के पास है, सरकार ने पिछले साल ही पेट्रोल को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया था। लेकिन सरकारी तेल कंपनियां सरकार की अनुमति के बगैर एक कदम भी नहीं उठा सकतीं। यदि ऐसा न होता तो जनवरी में ही कंपनियों ने दाम बढ़ा दिए होते। दाम बढ़ाने के हर दो-तीन हफ्ते बाद कंपनियों के घाटे का रोना शुरू हो जाता है, अभी भी कहा जा रहा है कि कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल के चलते तेल कंपनियों को तकरीन साढ़े पांच रुपए का नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसका सीधा सा मतलब है कि जल्द ही जनता पर कमर पर एक और प्रहार किया जा सकता है। मौजूदा दौर में महंगाई की मार ने आम आदमी का जीना पहले से ही मुहाल किया हुआ है, ऐसे में ये बढ़ोतरी उसके लिए दोहरी मार की तरह है। जिस देश में लोगों की तनख्वाह सालों तक नहीं बढ़ती, वहां हर छोटे अंतराल में तेल के दाम बढ़ाना क्या जायज है? सरकार का जनता के प्रति भी कुछ दायित्व बनता है, मनमोहन सिंह ने कुछ वक्त पहले कहा था कि वो भार मुक्त होना चाहते हैं। उनका इशारा  सब्सिडी के रूप में जनता को मिलने वाली राहत की ओर था। उनका कहना था कि सब्सिडी से बचने वाले धन का उपयोग शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए किया जाएगा। मगर उन्होंने ये नहीं सोचा कि जिन पेटों के दाना नहीं जाएगा क्या वो शिक्षा पर ध्यान केंद्रित कर पाएंगे? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश के विकास की असल पहचान आर्थिक मुद्दों पर आत्मनिर्भरता से यादा वहां रहने वाले लोगों के चेहरे की मुस्कान से होती है।  सरकार ने महंगाई बढ़ाने के तमाम रास्ते खोले लेकिन उसे कम करने के बारे में एक बार भी नहीं सोचा। पेट्रोल के दाम नियंत्रण मुक्त करते समय कहा गया था कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के रुख के आधार पर देश में तेल की कीमतों में बदलाव होगा। यानी अगर कच्चा तेल ऊपर जाता है तो पेट्रोल महंगा होगा और यदि कच्चे तेल में नरमी का रुख हुआ तो सस्ते पेट्रोल के रूप में जनता इसका लाभ उठा सकेगी। आज भले ही लीबिया संकट के चलते कच्चे तेल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊंचाई पर हैं, मगर कुछ वक्त पहले जब ये ढलान पर थे तब भी इसका फायदा जनता को नहीं दिया गया। जबकि वो उसका वाजिब हक था। अगर तेल कंपनिया कच्चे तेल में तेजी का हवाला देकर दाम बढ़ाना जानती हैं तो उन्हें इसके उलट करने का आदी भी बनाया जाना चाहिए था। लेकिन सरकार ऐसा कुछ भी करने की जरूरत नहीं समझी। इसका सीधा सा मतलब है कि उसे जनता से कोई सरोकार नहीं, सरोकार का भाव मन में तभी जागता है जब चुनाव की दस्तक सुनाई देती है। दुनिया का हर देश समय के हिसाब से मूल्यवृध्दि करता है, मगर वहां जनता के हितों को ध्यान रखने वाली नीतियां भी बनाई जाती हैं। पिछले साल चीन में भी क्रूड आयॅल की कीमतों में तेजी के चलते तेल के दाम बढ़ाए गए, पर जैसे ही कच्चा तेल नीचे आया सरकार ने रोल बैक करने में जरा भी देर नहीं लगाई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहां की सरकार यदि जनता पर बोझ बढ़ाना जानती है तो उसे कम करना भी उसकी प्राथमिकता में शुमार है। सरकार तेल कंपनियाें के कथित घाटे की भरपाई का थोड़ा बोझ खुद वहन लेती तो उसका खजाना खत्म नहीं हो जाता। एक लीटर पेट्रोल पर 14.35 रुपए एक्साइट डयूटी, 2.65 रुपए कस्टम, 7.05 रुपए वैट, 1 रुपए एजुकेशन सेस और करीब 3.08 रुपए अन्य कर लगाती है, इस तरह एक लीटर पेट्रोल पर तकरीबन 28.13 रुपए टैक्स के होते हैं। क्या करों का फंदा ढीला करके आम जनता को राहत पहुंचाने के बारे में नहीं सोचा जा सकता था? होने को तो बहुत कुछ हो सकता था, लेकिन सरकार कुछ करना ही नहीं चाहती। मगर इसमें गलती सरकार की नहीं, जनता की है जो अपने ऊपर जुल्म करने वालों को बार-बार ऐसा करने की ताकत देती है। मौजूदा मूल्यवृध्दि पर जितना गुस्सा और आक्रोश है वो थोड़े वक्त बाद काफुर हो जाएगा। कुछ देर बाद जनता बढ़ी कीमतों में खुद को ढाल लेगी और सरकार को एक बार फिर मार करने का अवसर मिल जाएगा। अब बस दुआ ही की जा सकती है कि जनता की याददाश्ता इस बार दुरुस्त रहे, अगर ऐसा हुआ तो जनता के साथ छल करने वालों को उनकी असल जगह पहुंचने में देर नहीं लगेगी। अन्यथा जैसा चल रहा है, वैसा ही चलता रहेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-538146411368815944?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/538146411368815944/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=538146411368815944' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/538146411368815944'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/538146411368815944'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='सच, कमजोर ही है जनता की याददाश्त'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-2693006203087639726</id><published>2011-04-08T02:04:00.000-07:00</published><updated>2011-04-08T02:05:15.025-07:00</updated><title type='text'>बाघ गणना महज अंकों का खेल</title><content type='html'>नीरज नैयर&lt;br /&gt;बाघों को लेकर काफी दिनों बाद एक अच्छी खबर सुनने को मिली। ताजा गणना के मुताबिक देश में बाघों का कुनबा बढ़ा है। ऐसे वक्त में जब शिकारियों के हौसले बुलंद है, ये खबर बाघ सरंक्षण से जुड़े लोगों और वन्यप्रेमियों के लिए किसी सौगात से कम नहीं। इस खबर ने बाघ बचाने को लेकर अपनाए जा रहे तौर-तरीकों पर उठ रहे सवालों को भी काफी हद तक गलत करार दिया है। हालांकि टाइगर स्टेट के नाम से मशहूर मध्यप्रदेश के लिए यह गणना निराशाजनक साबित हुई है। यहां होशंगाबाद, बैतूल, नर्मदा नदी के उत्तरी घाट और कान्हा किसली में बाघ घटे हैं। वैसे ये तब ही साफ हो गया था जब पन्ना के बाघ विहीन होने की खबर सामने आई थी। विशेषज्ञ इस बात का अंदेशा पहले ही जत चुके थे, लेकिन राय सरकार गौर करने के बजाए इसे लगातार झुठलाती रही और बाद में जब हकीकत सामने आई तो उसने होंठ सिल लिए। बाघों की ताजा गणना में पारंपरिक तरीकों के बजाए आधुनिक तकनीक को अपनाया गया। इसे विश्व की सबसे आधुनिक बाघ गणना भी कहा जा रहा है। इसके तहत अहम स्थानों पर कैमरे लगाए गए, रेडियो कॉलर, पैरों के निशान, डीएनए और मैपिंग प्रणाली का इस्तेमाल किया गया। गणना के लिए 45 हजार वर्ग किमी वन क्षेत्र में चार लाख 70 हजार अधिकारियों को करीब 6,25,000 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछली गणना में बाघों की संख्या 1411 थी, जो इस बार बढ़कर 1700 तक पहुंच गई है। लेकिन ये आंकड़े खुशी के साथ-साथ थोड़े चौंकाने वाले भी हैं। ये बात हजम करना मुश्किल है कि बाघ सरंक्षण को लेकर जो काम कई सालों तक नहीं हुआ, उनमें महज चार साल में इतना सुधार आ गया कि बाघों की संख्या 289 बढ़ गई। 2006 से लेकर 2010 तक जिन चार सालों में बाघ बढ़ने की बातें कही गई हैं, उन चार सालों में ही उनका अंधाधुन शिकार हुआ। वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया के मुताबिक 2006 में 37, 2007 में 27, 2008 में 29, 2009 में 32 और 2010 में 30 बाघ मारे गए। इसमें उन मौतों को शामिल नहीं किया है जिनके शिकार के संबंध में पुख्ता सुबूत नहीं मिल सके। इसके अलावा एक और बात जो बाघों की ताजा संख्या पर संदेह पैदा करती है वो ये कि पिछली गणना में 16 टाइगर स्टेट को शामिल किया गया, जबकि इसबार 19 रायों में गणना को अंजाम दिया गया है। 2006 की गणना में पश्चिम बंगाल के सुंदरवन और झारखंड में गिनती नहीं हुई थी, पर 2010 में सुंदरवन में 70 बाघ होने की बात कही गई है। इस लिहाज से देखा जाए तो ताजा गणना महज आंकड़ों का उलटफेर यादा नजर आती है। एक बारगी मान भी लिया जाए कि बाघ बढ़े हैं तो भी आंकड़ा इतना बडा कतई नहीं होगा जितना दर्शाया जा रहा है। 1700 में से यदि सुंरदवन के 70 बाघ ही घटा दिए जाएं तो संख्या 1630 रह जाती है और अगर मारे गए बाघों को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो यह आंकड़ा 1400 के आसपास रह जाएगा। वैसे भी मौजूदा वक्त में जिस तरह से आए दिन शिकार की खबरें आ रही हैं, उनमें ये सहज ही स्वीकार करना मुश्किल है कि इस खूबरसूरत प्राणी की संख्या में इजाफा हुआ होगा। खैर आंकड़ों का सच-झूठ अलग बात है, सबसे अहम है बाघों की सुरक्षा और इस दिशा में अब तक जो कदम उठाए गए हैं उससे शायद संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता। बाघ संरक्षण के प्रति सरकार की गंभीरता का पता इस बात से लगाया जा सकता है कि आज भी फॉरेस्ट गार्ड के हजारों पद खाली पड़े हैं। सच तो यह है कि वन एंव पर्यावरण मंत्रालय इस चुनौती से निपटने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कर्मचारियों को न तो पर्याप्त ट्रेनिंग दी जाती है और न ही पर्याप्त सुविधाएं। हालात ये हो चले हैं कि अधिकतर अधिकारी महज अपनी नौकरी बचाने के लिए काम कर रहे हैं। उनमें न तो वन्यजीवों के प्रति कोई संवेदना है और न ही काम के प्रति कोई लगाव। यही कारण है कि रोक के बावजूद बाघों का शिकार बदस्तूर जारी है। संगठित आपराधिक गिरोह वन्यजीवों की खालों की तस्करी में लगे हुए हैं। इसके लिए वह जंगलों में रहने वाले चरवाहों और कहीं-कहीं वन विभाग के लोगों से मदद लेते हैं, क्योंकि इन्हें जानवरों के बारे में काफी जानकारी होती है। बाघों को जाल बिछाकर फंसाया जाता है, सिर्फ आधे घंटे में ही खाल निकालकर अपराधी फरार हो जाते हैं। 1994 से लेकर 2010 के बीच तकरीबन 1000 बाघों का शिकार किया जा चुका है। 2005 में राजस्थान के सरिस्का के बाघ विहीन होने के बाद बाघों के सरंक्षण को लेकर बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाई गईं, रणनीति तैयार की गईं मगर हालात सुधरने के बजाए बद से बदतर होते चले गए। 2005 से 2010 के मध्य ही 201 बाघों को शिकारियों ने अपना निशाना बनाया। वैसे बाघों की घटती संख्या के लिए राय सरकारें भी कम कसूरवार नहीं हैं, कुछ साल पहले रायों से बाघों की सुरक्षा के लिए निगरानी समिति बनाने का कहा गया था मगर अब तक अधिकतर रायों ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है। 2006 में संशोधित वन्यजीव सुरक्षा कानून 1972 के तहत निगरानी समिति का गठन जरूरी है, रायों को इस बाबत कई बार स्मरण पत्र भी भेजे जा चुके हैं मगर कोई भी अपनी जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं। बाघ सरंक्षण के लिए आज से करीब चार दशक पहले प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया गया था, उस दौर में बाघ सरंक्षण के इसे लिए दुनिया भर में सबसे महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट माना गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके तहत कई सराहनीय काम भी किए गए, शायद इसी वजह से जंगली बाघ आज भी हमारे जंगलों में मौजूद हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश पिछले कुछ दशकों में तेजी से बदलते परिदृश्य ने इस महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट महज नाम तक ही सीमित करके रख दिया है। वन्यप्रणियों के खिलाफ बढ़ते अपराध और शिकारियों के बुलंद हौसलों को पस्त करने के लिए कुछ खास नहीं किया गया। सरकार सिर्फ कागजों पर लकीरें खींचती रही और जंगल से बाघों का सफाया होता रहा। वैसे अभी भी इतनी देर नहीं हुई है कि आंकड़ेबाजी को हकीकत में न बदला जाए, अगर सही दिशा में दिल से आगे बढ़ा जाए तो आने वाले सालों में बाघों की संख्या हमारी उम्मीद से भी यादा हो सकती है। बहरहाल, खुद को खुश रखने के लिए 2010 की गणना के आंकड़े अच्छे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-2693006203087639726?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/2693006203087639726/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=2693006203087639726' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/2693006203087639726'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/2693006203087639726'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='बाघ गणना महज अंकों का खेल'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-5382016109793162095</id><published>2011-03-20T12:28:00.000-07:00</published><updated>2011-03-20T12:29:54.365-07:00</updated><title type='text'>कहां गई वो पहले वाली होली</title><content type='html'>मुझसे अगर कोई पूछे कि सबसे अच्छा त्यौहार कौनसा सा है तो मैं कहूंगा होली। इस त्यौहार की सबसे अच्छी बात ये है कि इसमें अमीर-गरीब का कोई भेद नजर नहीं आता। गरीब भी रंग में रंगा होता है और अमीर भी, न अमीर का रंग यादा चमक मारता है और न गरीब को इसे खरीदने के लिए किसी का मुंह तकना पड़ता है। निसंदेह दिपावली की जगमग हर त्यौहार पर भारी पड़ती है, मगर वो जगमग कहीं न कहीं अमीर-गरीब के बीच की खाई को उजागर करती है। गरीब के बच्चे दूसरों की आतिशबाजी को निहार-निहार कर मन ही मन में अपनी गरीबी पर अफसोस जताते हैं। आतिशबाजी की दुकानों के आसपास खरीददारी करते लोगों को कौतूहल भरी निगाहों से देखना और दूसरी सुबह इस उम्मीद में कि  कोई बम जलने से रह गया होगा सड़कों की खाक छानना गरीब बच्चों की दिवाली का हिस्सा है। इसलिए मुझे होली यादा पसंद आती है। खासकर बचपन के दिनों में, वो महीनों पहले से तैयारी में मशगूल हो जाना, हर आने-जाने वाले पर रंगों के गुब्बारे फेंकना मैं कभी नहीं भूल सकता। हमारी होली होली आने से पहले ही शुरू हो जाया करती थी, दोस्त-यार बैठकर बाकायदा योजना बनाया करते थे कि इस बार क्या खास करना है। गुलाल हमें बड़े-बुजुर्गों के खेलने की चीज लगता था इसलिए हमारे हाथ होली के कई दिनों बाद तक रंग-बिरंगे दिखाई देते। वैसे भी होली का क्या मतलब अगर एक ही दिन में रंग निकल जाए। होली पर बच्चों के लिए सबसे अच्छा अगर कुछ होता है तो वो है गुब्बारे। रंग भरों, निशाना लगाओ और छुप जाओ। गुब्बारे से मुझे एक किस्सा याद आ रहा है, बात शायद होली से दो-तीन दिन पहले की रही होगी। हम सब दोस्त हथगोलों (गुब्बारे)को लेकर अपनी-अपनी पोजीशन (छतों) पर तैनात थे। हर आने-जाने वाला हमारे टारगेट पर होता। कुछ लोग हंस के निकल जाते तो कुछ होली के उल्लास में दो-चार गालियों के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करा जाते। यूं ही निशाना लगाते-लगाते एक गुब्बारा घर के नीचे से गुजरते मुल्ला जी के लग गया। हमारे लिए गनीमत ये रही कि वो गुब्बारा रंग का नहीं बल्कि पानी का था। बावजूद इसके मुल्ला जी ने अपनी साईकिल स्टैंड पर टिकाकर आसमान सर पे उठा लिया।  तकरीबन 30 मिनट तक वो उस एक गुब्बारे का बदला हमसे लेते रहे। बाद में लोगों के समझाने-बुझाने के बाद किसी तरह जब उन्होंने अपनी साईकिल स्टैंड से उतारी तब जाकर जान में जान आई। कुछ देर तक हम लोग खामोश रहे मगर खामोशी यादा देर तक टिक नहीं सकी, फिर वो ही निशाने लगाने का खेल शुरू हो गया। ऐन होली वाले दिन गुब्बारे भरने के लिए हम अलसुबल उठ जाते थे, दो बाल्टी भर के गुब्बारे तो मेरे अकेले के ही होते। उस वक्त जल्दी उठने की वजह होली के उत्साह के साथ-साथ मजबूरी भी थी। मजबूरी इसलिए क्योंकि आठ-नौ बजे तक नल सो जाया करते थे। वैसे ये केवल उस दौर की समस्या नहीं थी, आज भी है। अक्सर होली पर वॉटर सप्लाई बाधित हो जाती है, जिसकी की सबसे यादा जरूरत होती है। इसी तरह दिपावली पर बिजली की आंख मिचोली होती रहती है। लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े हर त्यौहार पर ये दोनों ही विभाग दरियादिल बन जाते हैं, फिर भी भेदभाव का रोना रोया जाता है। खैर ये एक अलग मुद्दा है। एक-दो बजे के आसपास जब लोग रंग छुटाने के लिए घरो में कैद हो जाया करते तो हम बचे हुए गुब्बारों का इस्तेमाल उन घर की दीवारों को रंगीन करने में करते  जिन्हें हमारे क्रिकेट प्रेम से सबसे यादा चिढ़ था। बचपन में क्रिेकेट खेलने के लिए क्या कुछ नहीं सुनना पढ़ता इस पीढ़ा को यादातर भारतीय समझते होंगे। कभी-कभी जब पकड़े जाते तो इसके लिए हमारे गालों पर थप्पड़ भी रसीद हो जाया करते। पर आज के दौर में होली पूरी तरह से बदल गई है। अब न तो उल्लास का वो मदमस्त करने वाला शोर सुनाई देता है और न लोग घर से बाहर आने में दिलचस्पी दिखाते हैं। मुझे इसबार की होली पर ऐसा लगा जैसे त्यौहार न हो कोई मातम हो। 10-11 बजे तक हो-हल्ले की एक अवाज तक कानो में नहीं पड़ी, उसके बाद होली मिलन की महज एक रस्मअदायगी के साथ होली खत्म हो गई। तेजी से भागती दुनिया में जहां 50-50 से यादा 20-20 ओवर का मैच पसंद किया जाता है वहां होली भी बहुत शॉर्ट होकर रह गई है। ये बदलाव सिर्फ शहर तक ही सीमित नहीं है, गांवों में भी बरबक्स ऐसा ही हाल है। गांवों में होली की शुरूआत सवा महीने पहले बसंत पंचमी के दिन से हो जाया करती थी। इस दिन गांव के लोग होलिका दहन वाले स्थान पर एक डंडा गाड़ दिया करते। फिर पूजा के बाद यहां लकड़ियां इकट्ठी की जाती और धमाल शुरू हो जाता। गांव के हुरियारे चौपाल पर मिलजुलकर होली के गीत गाते। पर अब गांवों में होली वाले दिन तक शहर जैसी खामोशी छाई रहती है। दरअसल, इस बदलाव के पीछे लोगों का बदलता रूप भी जिम्मेदार है। होली का पवित्र त्यौहार अब दुश्मनी निकालने के काम आता है। मनचलों के लिए तो ये दिन पूरी आजादी का दिन बन गया है। रंगे-पुते चेहरों के बीच कौन क्या करके निकल जाए पता ही नहीं चल सकता।और तो और कपड़े फाडने का आजकल एक नया ही ट्रेंड चल गया है, जब तक एक-दूसरे के कपड़े नहीं फाड़े जाते तबतक लोगों को लगता ही नहीं कि उन्होंने होली खेली है। मथुरा-वृंदावन जहां की होली भारत ही नहीं दुनिया भर में मशहूर है, वहां भी होली के हुड़दंग में क्या कुछ नहीं किया जाता।  जिस रफ्तार से होली खेलने वालों की तादाद और उसके प्रति लोगों का उत्साह घट रहा है उससे आने वाले कुछ सालों में होली महज नाम की होली बनकर रह जाएगी। एक ऐसा त्यौहार जो कुछ देर के लिए ही सही मगर सारे भेदभाव मिटाकर सबको एक जैसा बना देता है, होली के अलावा कोई दूसरा नहीं हो सकता। होली रंगाें का त्यौहार है और रंगों के बगैर हम अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते तो फिर कैसे हम होली को दम तोड़ने दे सकते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-5382016109793162095?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/5382016109793162095/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=5382016109793162095' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/5382016109793162095'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/5382016109793162095'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/03/blog-post_20.html' title='कहां गई वो पहले वाली होली'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-8791974562431519745</id><published>2011-03-18T01:55:00.000-07:00</published><updated>2011-03-18T01:57:39.207-07:00</updated><title type='text'>...तो क्या रन बनाना छोड़ दें सचिन</title><content type='html'>नीरज नैयर&lt;br /&gt;आलोचना करने वाले भी कुत्ते की पूंछ की तरह होते हैं, कितना भी समझाओ, हकीकत से रूबरू कराओ मगर समझने को तैयार ही नहीं होते। क्रिकेट खासकर सचिन तेंदुलकर के मामले में तो इन अलोचकों के मुंह इतने चौड़े हैं कि पूरी की पूरी फुटबॉल भी अंदर चली जाए। सचिन ने विश्वकप के दौ मैंचों में शानदार सैंकड़ा जड़ा, मगर आलोचकों ने उसमें भी आलोचना की वजह ढूंढ ली। 27 फरवरी को इंग्लैंड के खिलाफ मास्टर ब्लास्टर ने 104.34 की औसत से 115 गेंदों में 120 रन बनाए, जिसमें 10 चौके और पांच छक्के शामिल थे। इसके बाद 12 मार्च को दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ तेंदुलकर ने 109.90 की औसत से 101 गेंदों में 111 रन ठोंके, जिसमें 8 चौके और 3 छक्के शामिल हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश इन दोनों ही मैचों में खेल खत्म होते-होते भारत बहुत दयनीय स्थिति में पहुंच गया। इंग्लैंड के साथ तो किसी तरह टाई करवाकर उसने लाज बचा ली, मगर दक्षिण अफ्रीका ने ये मौका भी नहीं दिया। नागपुर में अफ्रीकी खिलाड़ियों ने टीम इंडिया की नाक काटके ही दम लिया। भारत ये मैच 3 विकेट से हारा। इन दोनों हार का ठीकरा वैसे तो फूटना चाहिए था कप्तान बने बैठे महेंद्र सिंह धोनी पर मगर आलोचकों ने सचिन को शिकस्त का सेहरा पहना दिया। इसके पीछे तर्क दिए गए कि  सचिन ने जब-जब शतक ठोंके टीम मैच हार गई। अब भला कोई इन आलोचकों से पूछे कि  क्या सचिन रन बनाना छोड़ दें, चलिए छोड़ भी दें तो क्या गधे सरीखी बेसुरी तान छेड़ने वाले ये आलोचक खामोशी अख्तियार कर सकेंगे? निश्चित तौर पर नहीं, तेंदुलकर का बल्ला थमते ही ये चीखने लगेगे कि सचिन टीम पर बोझ हैं, उन्हें निकाल देना चाहिए आदि, आदि। सचिन की आलोचना करने वाले कहते हैं कि मास्टर महज अपने लिए खेलते हैं, अर्धशतक या शतक तक पहुंचते-पहुंचते वो संभलकर खेलना शुरू कर देते हैं ताकि रिकॉर्ड बन सके। अव्वल तो इसमें कोई सच्चाई नहीं है और अगर वो ऐसा करते भी हैं तो इसमें बुराई क्या है। नए-नए रिकॉर्ड गढ़ने की महत्वकांक्षा ही इंसान को ऊंचाईयों तक पहुंचाती है, और वैसे भी ये तो इंसानी फितरत है कि सफलता के शिखर तक पहुंचते-पहुंचते वो कदम थोड़ा संभलक रखना शुरू कर देता है। आलोचना करने वाले अगर सचिन की जगह होते तो क्या वो खुद ऐसा नहीं करते। ऐसा कौनसा खिलाड़ी है जो 49 को 50 और 99 को 100 बनते नहीं देखना चाहेगा। चलिए एक बागरी मान भी लिया जाए कि सचिन अपने रिकॉर्ड की लिए खेलते हैं, पर फिर भी खेलते तो हैं। टीम इंडिया का हर खिलाड़ी यदि अपने लिए ही खेलना सीख जाए तो हार-जीत का प्रतिशत आधे से भी कम रह जाएगा। इंसान अपने लिए सबसे अच्छा करने की कोशिश करता है, अगर खिलाड़ियों में एक दूसरे से यादा अच्छी परफॉर्म करने की होड़  हो जाए तो टीम का भला तो अपने आप ही हो जाएगा। सचिन अगर बुरा खेलें तो बुरा कहने में कोई बुराई नहीं, लेकिन अच्छा खेलने के बाद भी उनपर उंगलियां उठाना बीमार मानसिकता का ही उदाहरण है। जिन दोनों मैचों में सचिन ने सेंचुरी लगाई उसमें टीम के बाकी खिलाड़ियों का प्रदर्शन क्या रहा, ये भी गौर करने वाली बात है। इंग्लैंड के साथ मैच में प्रमुख 6 बल्लेबाजों के रनों का कुल योग रहा 197 और दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ यह घटकर रह गया 167। अब जरा इस योग में खिलाड़ियों के योगदान पर नजर डाल लेते हैं, इंग्लैंड के खिलाफ सहवाग ने 35, गंभीर ने 51, युवराज ने 58 पठान ने 14, कोहली ने 8 और धोनी ने 31 रन मारे। जबकि अफ्रीका के खिलाफ सहवाग 73, गंभीर 69, पठान 0, युवराज 12, कोहली 1 और खुद धोनी महज 12 रन बना पाए। यानी दोनों मैचों में सचिन ने मैच विनिंग पारियां खेली, बावजूद इसके टीम अगर नहीं जीत पाई तो इसके गुनाहगार बाकी के खिलाड़ी हैं न कि  सचिन। ऐसा सिर्फ हमारे यहां ही हो सकता है कि रन बनाने वाले को अलोचना मिले और वो जो बस अपनी किस्मत का खा रहे हैं, उनको सर-आंखों पर बैठाया जाए। मेरा इशारा यहां महेंद्र सिंह धोनी की तरफ है, कप्तान के तौर पर धोनी ने आखिरी बार यादगार पारी कब खेली, शायद ही किसी को याद होगा। विश्वकप के अब तक के मैचों में उनका प्रदर्शन एक दोयम दर्जे के बल्लेबाज जैसा ही रहा है। दक्षिण अफ्रीका के विरुध्द उनके गलत फैसलों ने सचिन और सहवाग की मेहनत को मटियामेट कर दिया। टीम इंडिया का पहला विकेट 142 पर सहवाग के रूप में गिरा, उसके बाद जब सचिन पवेलियन लौटे तो स्कोर था 267। यानी बाकी के बल्लेबाज सिर्फ 29 रन ही जोड़ पाए। कागजों पर धुरंधर कहे जाने वाले बल्लेबाज इतनी अच्छी स्थिति में भी यदि घुटने टेक दें तो इसमें भी सचिन का दोष है। जैसे सचिन ने सबको कहा हो कि यादा मत खेलना। सचिन की आलोचना नहीं बल्कि उनकाउदाहरण पेश करने चाहिए, 35 की उम्र में भी यह बल्लेबाज टीम के युवाओं पर भारी पड़ रहा है। सचिन तेंदुलकर महज क्रिकेट खेलते नहीं बल्कि उसे जीते हैं। खेल के प्रति उनका कमिटमेंट उनके हर शॉट में नजर आता है। मास्टर ब्लास्टर ने वनड़े में 48 और टेस्ट मैचों में 51 शतक जमाए हैं। अब तक कुल 13 बार ऐसा हुआ है जब सचिन ने शतक बनाया और टीम मैच हार गई। ये भी एक तरह से रिकॉर्ड है, सचिन  के अलावा वेस्टइंडीज के क्रिस गेल भी ऐसे दूसरे नंबर के बल्लेबाज हैं जिनके 9 शतक टीम के काम नहीं आए। 48 में से अगर 13 घटा भी दिए जाएं तो भी 35 बचते हैं, क्या ये आंकड़ा सचिन की तारीफ करने के लिए काफी नहीं। तेंदुलकर की आलोचना करने वालों को इस बात पर भी ऐतराज है कि उन्हें क्रिकेट का भगवान क्यों कहा जाता है, और यदि कहा जाता है तो वो हर मैच क्यों नहीं जिता पाते। विरोध करने का ये बहुत ही बेतुका सा तर्क है, सचिन को भगवान की उपाध्दि उनके खेल के प्रति समपर्ण और अतुल्य प्रदर्शन की बदौलत मिली है। लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि पौराणिक कथाओं की तरह वो कोई दैव्य रूप हैं जो हाथ घुमाएंगे और हर बॉल बाउंड्री पार कर जाएगी। वो भी हाड़-मांस का इंसान है, दर्द और थकान उसे भी होती है। सचिन मैदान पर अपना सौ प्रतिशत देने में विश्वास रखते हैं, लेकिन कभी-कभी उनका बल्ला भी साथ नहीं देता और ऐसा हर इंसान के साथ होता है। खैर आलोचना करने वालों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, उनका काम तो हर अच्छी चीज में बुराई ढूंढना है। सचिन चाहे कितना भी अच्छा क्यों न खेल लें उनकी आलोचना करने वाले अपना मुंह खोलते रहेंगे। जिस तरह कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं हो सकती, उसी तरह सचिन की आलोचना करने वाले भी नहीं सुधर सकते।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-8791974562431519745?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/8791974562431519745/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=8791974562431519745' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/8791974562431519745'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/8791974562431519745'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='...तो क्या रन बनाना छोड़ दें सचिन'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-527066850699583483</id><published>2011-02-28T23:55:00.000-08:00</published><updated>2011-02-28T23:56:37.072-08:00</updated><title type='text'>बाबा रामदेव की संपत्ति पर संशय लाजमी है</title><content type='html'>घपले-घोटालों की चर्चां के बीच आजकल एक और खबर सुर्खियों में है, वो है बाबा रामदेव और कांग्रेस की जुबानी जंग। इस जंग की सही मायनों में शुरूआत हुई कांग्रेस सांसद निनोंग एरिंग णके बयान से। अरुणाचल के सांसद साहब बाबा की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम से इस कदर आहत हुए कि उन्होंने अपशब्द तक कह डाले। बाबा की मानें तो एरिंग ने एंग्री यंगमैन की भूमिका उन्हें ब्लडी इंडियन और न जाने क्या-क्या कहा। सांसद महोदय ने बाबा को धमकी भी दी कि अगर उन्होंने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान बंद नहीं किया तो गंभीर नतीजे भुगतने होंगे। गंभीर नतीजों से उनका इशारा किस तरफ था ये तो वही बता सकते हैं, लेकिन इस तरह की भाषा एक सांसद के मुंह से अच्छी नहीं लगती। जिम्मेदार पद पर काबिज होने के बाद अपनी जिम्मेदारी समझना हमारे नेता पता नहीं कब सीखेंगे। वैसे देखा जाए तो राजनीति में सफलता के लिए बदजुबानी और दबंगई आजकल मूलमंत्र बन गए हैं। जो जितना बड़ा दबंग, वो उतना ही बड़ा नेता। यही वजह है कि संसद तक पहुंचने वाले माननीयों में आपराधिक छवि वालों की भी अच्छी-खासी तादाद होती है। खैर ये एक अगल मामला है, हम अपने मूल मुद्दे पर लौटते हैं। एरिंग द्वारा शुरू की गई जुबानी जंग को और तीखा बनाया शब्दबाणों के लिए मशहूर हो चुके दिग्विजय सिंह ने। दिग्गी राजा ने रामदेव को संपत्ति के खुलासे की चुनौती दी, इसके जवाब में बाबा ने भी गांधी-नेहरू परिवार को निशाना बनाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की दूसरों पर कटाक्ष करना आदत सी बन चुकी है। कुछ दिनों पहले तक वो भगवा आतंकवाद के नाम पर भाजपा और संघ को घेरे हुए थे, और अब योगगुरु को उनका नया टारगेट हैं। ऐसा लगता है जैसे कांग्रेस ने उन्हें इसी काम के लिए रखा हुआ है कि जब भी कोई सरकार की तरफ ढ़ेढी निगाह करे बस बरस पड़ो। रामदेव कुछ समय से कालेधन और भ्रष्टाचार को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। उन्होंने तो संकेत दिए हैं कि उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव से वो अपनी राजनीतिक पारी शुरू कर सकते हैं। संभव है कि इसी के चलते वो दिग्गी की आंखों की किरकिरी बने हुए हों। दिग्गी राजा का सवाल है कि आखिर बाबा के पास इतने दौलत आई कहां से? भले ही कांग्रेस महासचिव की ये सवाल विशुध्द राजनीति से प्रेरित हों, पर सवाल तो हैं। बाबा के बारे में कहा जाता है कि वो एक जमाने में साइकिल से चलते थे और ये जमाना यादा पुराना भी नहीं है। अखाड़ा परिषद के बाबा हठ योगी ने हाल ही में कहा था कि रामदेव के पास साइकिल का पंचर बनवाने के पैसे नहीं थे। पर योगगुरु आज हेलीकॉप्टर से सफर करते हैं। उनका खुद का आइलैंड भी है, जिसकी कीमत 20 लाख स्टर्लिंग पाउंड है। बाबा के आश्रमों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। हरिद्वार से लेकर अरावली की पहाड़ियों और स्कॉटलैंड तक में बाबा के आश्रम हैं। उनका ट्रस्ट दुनिया भर में अपने उत्पाद बेचता है। णखबरों की अगर मानें तो करीब तीन साल पहले रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव ने खुद स्वीकारा था कि उनका सालाना करोबार एक लाख करोड़ का होने वाला है। कहा तो ये भी जाता है कि  पंताजलि योग की शाखाएं ब्रिटेन, अमेरिका, थाइलैंड, नेपाल, दक्षिण अफ्रीका और दुबई तक में खुल गई हैं। आठ सौ बीघा में बने पंतजलि योग ग्राम में फाइव स्टार संस्कृति वाला पंचकर्म सेंटर है। इसके साथ ही पंतजलि में गोशाला की स्थापना की गई है, बाबा के पास करीब 500 गाये हैं, जिनमें विदेशी नस्लों की तादाद सबसे यादा है। बाबा ने 2009 में  हरिद्वार में 125 एकड़ खेती की जमीन पर एक कंपनी की शुरूआत की थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रामदेव के इस मेगा फूड पार्क की कुल लागत 500 करोड़ रुपए आने का अनुमान है। पहले चरण में 250 करोड़ रुपए की लागत आई जबकि दूसरे चरण ढाई सौ करोड़ की लागत का अनुमान है।  बाबा आज के वक्त में किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं, देश से लेकर विदेशों तक में उनके सैकड़ों भक्त हैं।  इस बात में कोई दोराय नहीं कि उन्होंने फिर से योग को जीवित किया है, लेकिन सिर्फ योग के सहारे इतनी तेजी से संपत्ति अर्जित करना संदेह तो पैदा करता ही है। बाबा की संपत्ति को लेकर सवाल सिर्फ दिग्विजय सिंह ने ही नहीं किया है कुछ दूसरे संगठन भी इसका खुलासा चाहते हैं। दरअसल बाबा राजनीतिज्ञों के साथ-साथ कई संगठनों के निशाने पर हैं, इसकी मूल वजह है उनका योग के अलावा दूसरे क्षेत्रों में हस्तक्षेप। एक जमाने में लालू प्रसाद यादव रामदेव के मुरीद थे, मगर आज वो उनकी मुखालफत करने से पीछे नहीं हटते। कुछ वक्त पहले लालू ने कहा था, रामदेव खुद को अच्छा साबित करने के लिए देश के हर नेता की आलोचना करते हैं, वो बौरा गए हैं। राजद प्रमुख तो यहां तक कह गए थे कि  अगर हमने बाबा को नहीं बचाया होता तो वो बहुत पिटे होते। लालू जैसी खीज दूसरे नेताओं की भी है। पूर्व स्वास्थ्यमंत्री अंबूमणि रामदेव से लेकर सीपीएम नेता वृंदा करात तक बाबा से खार खाए बैठे हैं। वृंदा करात ने आरोप लगाया था कि रामदेव आयुर्वेद दवाओं में हड्डियों का प्रयोग करते हैं। योग से कैंसर मिटाने के दावे को लेकर बाबा का अंबूमणि से विवाद खूब चर्चा में रहा था। हाल ही में समलैंगिकता के मुद्दे पर उनका बॉलिवुड अभिनेत्री सेलीना जेटली से टकराव हुआ, ये बात सही है कि दूसरे नागरिकों की तरह बाबा को भी अपना मत रखने का हक है। लेकिन उन्हें संवेदनशील मुद्दों को छेड़ते वक्त थोड़ा सावधानी से काम लेना चाहिए। वैसे ये सोचने वाली बात है कि एक जमाने में कांग्रेस के करीबी कहे जाने वाले बाबा अचानक से कांग्रेस विरोधी कैसे हो गए। 2009 में जब बाबा ने अपना फूड पार्क बनाया था तो उसके लिए सरकार से ही सहायता मिली थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय ने बाबा को 50 करोड़ रुपए का अनुदान दिया था। और तो और केंद्रीय रायमंत्री सुबोधकांत सहाय के गृहक्षेत्र रांची में भी एक फूड पार्क की आधारशिला रखी गई थी, जिसमें बाबा सरकार के सहयोगी थे। उस दौरान बाबा की संघ और विहिप से दूरी भी साफ तौर पर देखी जा सकती थी। रामदेव ने संघ समर्थित बैठकों तक में जाना बंद कर दिया था। बहरहाल अब दोनों एक दूसरे पर तीर ताने खड़े हैं, बाबा की संपत्ति को लेकर जो संशय है उसका समाधान होना चाहिए। लेकिन इसके पीछे राजनीति उचित नहीं। जिस तरह से कांग्रेस सांसद बाबा के खिलाफ लामबंद हैं, उसमें साफ तौर पर सियासत नजर आ रही है। रामदेव यदि कालेधन का मुद्दा उठा रहे हैं तो उससे कांग्रेसियों को मिर्ची नहीं लगनी चाहिए। जिस तरह का रवैया दिग्विजय सिंह और निनोंग एरिंग ने अपनाया है उससे उनका खुद का और कांग्रेस का ही नुकसान है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-527066850699583483?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/527066850699583483/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=527066850699583483' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/527066850699583483'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/527066850699583483'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/02/blog-post_28.html' title='बाबा रामदेव की संपत्ति पर संशय लाजमी है'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-7843038990368491065</id><published>2011-02-02T22:21:00.000-08:00</published><updated>2011-02-02T22:22:11.059-08:00</updated><title type='text'>इच्छामृत्यु क्यों न हो कानूनी</title><content type='html'>नीरज नैयर&lt;br /&gt;कुछ वक्त पहले गुजारिश नाम की एक फिल्म आई थी। रितिक रोशन और ऐश्वर्या राय अभीनीत यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर तो कुछ खास नहीं कर पाई, लेकिन इसके लंबे वक्त से चला आ रही इच्छामृत्यु या यूथनेशिया की चर्चा को एक बार फिर से गर्म कर दिया। फिल्म में रितिक ने एक जादूगर का किरदार निभाया है जो बाद में लकवे का शिकार हो जाता है। चलने-फिरने में पूरी तरह असमर्थ यह जादूगर अदालत से इच्छामृत्यु की गुहार लगाता है, जिसे बार-बार ठुकरा दिया जाता है। परिवार के अलावा कोई भी इस फैसले में उसका साथ नहीं देता। हालांकि दर्द के सैलाब के बीच ऐश्वर्या के रूप में उसे जिंदगी जीने का एक बहाना मिल जाता है, बाकी हिंदी फिल्मों की तरह काफी हद तक इस फिल्म का अंत भी खुशनुमा ही रहा। लेकिन, हकीकत में जिंदगी के सताए हुए लोगों की जिंदगी का अंत शायद इतना अच्छा नहीं होता। हाल ही में बलात्कार की शिकार एक महिला ने सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु की गुहार लगाई है। यह महिला पिछले 36 सालों से दिमागी तौर पर मृत है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो एक जिंदा लाश। अरुणा नाम की इस महिला के साथ 1973 में बलात्कार किया गया। पेशे से नर्स अरुणा को अस्पताल में सफाई कर्मचारी ने क्रूरता और दरिंदगी की सारी हदें पार करते हुए हवस का शिकार बनाया, अरुणा के गले में जंजीर डालकर उसे पलंग से बांधा गया, उसके शरीर को भूखे भेड़िए की तरह नोचा गया। इस घटना के बाद से अरुणा की जिंदगी बिस्तर पर पड़ी पत्थर की मूर्ति की माफिक बनकर रह गई है, फर्क बस इतना है कि इस मूर्ति में जान है। अब सवाल ये उठता है कि  क्या इस याचिका को भी गुजारिश के जादूगर की याचिका की तरह खारिज कर दिया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका 2009 में आई थी, कोर्ट ने अब इस मुद्दे पर अटॉर्नी जनरल से राय मांगी है। साथ ही अदालत ने तीन डॉक्टरों की एक टीम भी गठित की है, जो अरुणा की दशा पर रिपोर्ट सौपेंगी। भारत में इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता नहीं है, इस लिहाज से इस बात की संभावना बेहद कम है कि सुप्रीम कोर्ट कोई नजीर पेश करेगा। एक ऐसा व्यक्ति जिसने अपनी जिंदगी के तीन दशक बिस्तर पर पड़े-पड़े गुजार दिए हों, उसे जिंदा रखना क्या उसके साथ अन्याय नहीं होगा। जो पहले से ही मर चुका हो, उसे फिर से मौत देना मौत की रस्म अदायगी से यादा और क्या हो सकता है। वैसे ये कोई पहला मामला नहीं है, जिदंगी से मात खाने वाले बहुत से लोग अपनी मर्जी से दुनिया छोड़ने की मांग कर चुके हैं। दो साल पहले उत्तर प्रदेश के एक व्यक्ति ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर अपने बच्चों के लिए इच्छामृत्यु मांगी थी। 10 से 16 साल की उम्र के यह बच्चे अपने पैरों पर खड़े होने तक में असमर्थ थे, उनके शरीर के अधिकतर अंगों (खासकर गर्दन के नीचे के) ने काम करना बंद कर दिया था। 2008 में हिमाचल प्रदेश की एक इंजीनियर ने दुनिया छोड़ने की इच्छा जाहिर की थी। सीमा नाम की इस इंजीनियर ने अपनी जिंदगी के 13 अनमोल साल एक कमरे में ही गुजार दिए। उसके शरीर के अधिकतर अंग अर्थराइटिस से ग्रस्त थे, कंधे, कोहनी और कमर के नीचे का हिस्सा पूरी तरह निष्क्रीय बन गया था। सीमा ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट से लेकर मुख्यमंत्री तक गुहार लगाई। ऐसे ही 2004 में एक मां ने अपने 24 साल के बेटे के लिए मौत मांगी थी, ताकि उसके अंगों को दान किया जा सके। शतरंज खिलाड़ी वेंकटेश की जिंदगी लाइफ सपोर्ट सिस्टम के सहारे चल रही थी, डॉक्टर तक उसके ठीक होने की उम्मीद छोड़ चुके थे। इन सारे मामलों में जिंदगी मौत से भी यादा बदतर है , ये लोग यादा जीए तो ताउम्र सिर्फ जिंदगी को कोसते रहेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौत का इंतजार करना दुनिया में शायद सबसे कठिन काम है, और ये लोग इसी इंतजार से गुजर रहे हैं। ऐसे में इन्हें जिंदगी से मुक्ति क्यों नहीं मिलनी चाहिए। निश्चित तौर पर कोर्ट के साथ-साथ ऐसे बहुत से लोग होंगे जो कभी भी यूथनेशिया के लिए तैयार नहीं होंगे। इसके पीछे कई कारण हैं, सबसे पहला तो यही कि अगर इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता मिल गई तो इसके दुरुपयोग की आशंका हमेशा बनी रहेगी। इसके अलावा हर वो व्यक्ति जो नाकामयाबी और नकरात्मकता के दौर से गुजर रहा है, इच्छामृत्यु उसके लिए छुटकारे का आसान साधन बन जाएगी। दुनिया के कुछ मुल्कों में यूथनेशिया को कानूनी मान्यता प्रदान की गई है, जिनमें नीदरलैंड, नोर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, बेल्जियम, लैक्समबर्ग, अल्बानिया, हॉलैंड, स्वीट्जलैंड, थाईलैंड और अमेरिका के उत्तरप्रश्चिम में स्थित ओरेजन शामिल हैं। इनमें हॉलैंड का रिकॉर्ड सबसे यादा खराब है। आंकड़ों पर यदि विश्वास किया जाए तो 1990 में यहां इच्छामृत्यु के नाम पर करीब 1030 मरीजों को बिना उनकी सहमति के मौत की नींद सुला दिया गया। वहीं, तकरीबन 22,500 मरीजों की मौत लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाए जाने से हुईं। ये आंकड़े इच्छामृत्यु की वकालत करने वाले कदमों को पीछे खींचने की ताकत रखते हैं, मगर इसके बावजूद यह एक ऐसा गंभीर विषय है जिसके बारे में विचार किए जाने की जरूरत है। सिर्फ इसलिए कि यूथनेशिया को कानूनी जामा पहनाने पर उसके दुरुपयोग की आशंका बढ़ जाएगी, उन लोगों को जिंदा रखकर तड़पने नहीं दिया जा सकता जिनकी पूरी जिंदगी दूसरों पर बोझ बन जाए। इच्छामृत्यु को लेकर हमारे देश में लंबे समय से बहस चली आ रही है, लेकिन इस बहस का अब तक कोई नतीजा नहीं निकला है। समय के साथ बदलाव जरूरी हो जाते हैं, इसलिए इस मुद्दे पर बदलाव की दिशा में भी कदम आगे बढ़ाए जाने चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके साथ-साथ हमारे कानूनी ढंाचे में बहुत कुछ ऐसा है जिसमें बदलाव की जरूरत है, हमारे यहां खुदकुशी की कोशिश करने वाले पर मुकदमा चलाया जाता है। यानी जो बेचारा जिंदगी से आजिज आकर मौत को आलिंगन करने में असफल रहा हो उसे कानून पचड़ों में उलझाकर जीते-जी मारने का पूरा बंदोबस्त किया गया है। क्या वास्तव में इसकी कोई जरूरत है। कानून के जानकर इसके समर्थन में बहुत से कारण गिना सकते हैं, पर मुझे व्यक्तिगत तौर पर ऐसा लगता है कि जब हमें जिंदगी की दूसरे फैसले लेने का अधिकार है तो फिर हम कब दुनिया को अलविदा कहेंगें यह भी हमें ही तय करने दिया जाए। वैसे भी खुदकुशी जैसा कदम उठाना या मौत की मांग कोई ऐसा ही व्यक्ति कर सकता है जिसके लिए जिंदगी के कोई मायने नहीं बचे हों, तो फिर उसे जबरदस्ती जिंदा रहने को मजबूर करना कहां तक जायज है। इस बारे में न केवल गौर करने की बल्कि इससे आगे बढ़ने की भी जरूरत है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-7843038990368491065?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/7843038990368491065/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=7843038990368491065' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/7843038990368491065'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/7843038990368491065'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='इच्छामृत्यु क्यों न हो कानूनी'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-8861911101000362327</id><published>2011-01-13T22:26:00.001-08:00</published><updated>2011-01-13T22:26:53.751-08:00</updated><title type='text'>एक तेंदुए का एनकाउंटर</title><content type='html'>नीरज नैयर&lt;br /&gt;आमतौर पर पुलिस अपराधियों का एनकांउटर करती है, लेकिन महाराष्ट्र में एक तेंदुए का एनकाउंटर किया गया। पुलिस के बहादुर जवानों ने तेंदुए पर इतनी पास से गोलियां बरसाईं कि उसे बचने का कोई मौका नहीं मिला। इस लाइव एनकाउंटर को देखने के लिए भारी तादाद में भीड़ मौजूद थी, और शायद यादातर लोग तेंदुए की मौत चाहते थे। तेंदुए का कसूर बस इतना था कि वो भूलवश रिहायशी इलाके में घुसकर घबराहट में इंसान को घायल कर बैठा। अपनी जान को खतरा देख जब इंसान दूसरे की जान लेने से नहीं चूकता तो फिर ये तो जानवर था। उससे इतनी समझ की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है कि वो हमला करने के बजाए चुपचाप निकल जाता। और अगर वो ऐसा करने की सोचता भी तो क्या करने दिया जाता। क्या इंसान उसे रिहाइशी इलाके में आने का दंड दिए बिना जाने देता? जंगली जानवरों को इंसानों की बस्ती में आने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है, कुछ एक ही किस्मत वाले होते हैं जो सुरक्षित जंगल तक पहुंच पाते हैं। हाल ही में गुवाहाटी में एक बीमार हाथी के बच्चे को इंसानों की क्रूर भीड़ ने महज इसलिए मार डाला कि वो गलती से खेत का रुख कर बैठा था। बेजुबान की इस छोटी सी गलती पर इंसान इतना हैवान बन बैठा कि लाठी-डंडों से मासूम को तब तक पीटा गया जब तक उसने दम नहीं तोड़ दिया। दरिंदगी के इस खेल को वन विभाग और पुलिस के अधिकारी तमाशबीन बने देखते रहे, किसी ने भी हाथी की चिंघाड़ के दर्द को समझने का प्रयास नहीं किया। अगर वन अमला और पुलिसवाले चाहते तो हाथी के बच्चे को बचाया जा सकता था, लेकिन शायद उन्हें भी वो मासूम बच्चा कुसूरवार नजर आ रहा था। ऐसे ही गत 13 जनवरी को भुवनेश्वर मेें ग्रामीणों ने एक तेंदुए को न सिर्फ मौत के घाट उतारा बल्कि शव के साथ जुलूस निकालकर अपनी वीरता का परिचय भी दिया। दरअसल मैदान में खेलने पहुंचे बच्चों ने वहां तेंदुए को देखा और इसकी जानकारी उन्होंने गांव वालों को दी, इसपर हैवानियत का चोला ओढ़े गांववालों ने तेंदुए को बेदर्दी से तड़पा तड़पाकर मार डाला। गांववाले वनविभाग को भी सूचना दे सकते थे, मगर उन्होंने बेजुबान की जान लेना यादा बेहतर समझा। मनुष्य को संवेदनशील कहा जाता है, लेकिन यह कैसी संवेदनशीलता है जिसमें बेजुबानों को बेदर्दी से मारा जा रहा है। कभी मुनाफे के लिए तो कभी अपना वर्चस्व कायम करने के लिए। तेंदुए या बाघ हम तक नहीं पहुंचें, हमने ही उनके घर उजाड़कर वहां रहना शुरू कर दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विकास के नाम पर कट रहे जंगल&lt;br /&gt;विकास के नाम पर घने जंगल छितरे किए जा रहे हैं, जानवरों का आशियाना हर रोज सिकुड़ता जा रहा है। भोजन-पानी की उपलब्धता लगातार सीमित होती जा रही है, बावजूद इसके अगर मूक जानवर भूले-भटके कभी रहवासीइलाकों में पहुंच जाए तो उसे मार डाला जाता है। संवेदनशीलता की ऐसी परिभाषा केवल मनुष्य ही गढ़ सकता है। ये कहां का इंसाफ है कि हम अत्याचार करते रहें और अत्याचार सहने वाला जब अपने बचाव में वार करे तो एकजुट होकर उसे मार डाला जाए। कुछ वक्त पहले यूपी में एक बाघ को आदमखोर बताकर मार गिराया गया, और चंद रोज पहले गुजरात के सूरत में एक तेंदुए की मौत का फरमान सुनाया गया है। तेंदुए को मारने के लिए हथियारों से लैस वनविभाग के कर्मचारी जंगलों को छान रहे हैं। हो सकता है कि यूपी के बाघ की तरह इस तेंदुए को भी मौत नसीब हो। ये भी हो सकता है कि इस तेंदुए की जगह किसी दूसरे को मार डाला जाए, सारे तेेंदुए लगभग एक जैसे दिखते हैं, उनके नाम-पते तो होते नहीं कि पहचाना जा सके। इस तेंदुए या उस बाघ ने जो कुछ भी किया वो अनापेक्षित था, उसने किसी प्रतिशोध में नहीं बल्कि हड़बड़ाहट और आत्मरक्षा में इंसान पर हमला बोला। जब खून करने वाले इंसान को आदमखोर घोषितकर उसकी मौत का फरमान जारी नहीं किया जाता तो फिर इन मूक जानवरों के साथ ऐसा क्यों किया जा रहा है। क्या इन्हें मनुष्य की माफिक जीने का हक नहीं। मनुष्य अपने खिलाफ हुए अत्याचार की आवाज उठा सकता है, लेकिन ये जानवर जाएं तो कहां जाएं। इनके लिए न तो कोई अदालत है, और न कोई सुनने वाला। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि एक तरफ हम इन जानवरों को बचाने के लिए पानी की तरह पैसा बहाए जा रहे हैं और दूसरी तरफ अपने ही हाथों से इन्हें मौत के घाट उतार रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;130 तेंदुओं की मौत&lt;br /&gt;पिछले साल करीब 130 तेंदुए मारे गए, जबकि गैर सरकारी संगठन ये आंकड़ा 240 के ऊपर बता रहे हैं। इस दौरान तकरीबन 17 तेंदुए मनुष्य से टकराव की भेंट चढ़े, 19 सड़क हादसों में मारे गए और लगभग आठ को वन विभाग ने मार गिराया। बाकी संभवत: शिकारियों का शिकार बने। 2009 में करीब 160 तेंदुओं का शिकार किया गया, जबकि 2008 में यह संख्या 157 थी। 2007 की गणना के मुताबिक देश में महज 2300 तेंदुए ही बचे हैं, और बाघों की संख्या इससे काफी कम 1100 के आसपास है। लेकिन असल आंकड़ा निश्चित तौर पर इससे काफी कम होगा। पिछले कुछ वक्त से बाघ, तेंदुए की मौतों की संख्या में काफी तेजी देखी गई है, तेंदुए की बात करें तो लगभग हर रोज कहीं न कहीं से इसकी मौत की खबर सुनने को मिल जाती है। जिसमें मनुष्य से टकराव की घटनाएं यादा हैं (शिकार छोड़कर)।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बर्बरता का खेल&lt;br /&gt;वैसे मूक जानवरों के साथ बर्बरता केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, दुनिया के बाकी हिस्सों में भी कमोबश ऐसा ही हो रहा है। इंडोनेशिया में इन दिनों जंगलों की कटाई चल रही है, जिसका असर यहां रहने वाले आरंगुटान प्रजाति के बंदरों पर सबसे यादा पड़ा है। इंसानों की हैवानियत का आलम ये है कि इन बंदरों को चुन-चुनकर या तो मारा जा रहा है या उन्हें जंजीरों में जकड़कर अपने मनोरंजन के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।  मनुष्य की यह निर्दयता जानवरों का अस्तित्व समाप्त कर रही है, अगर सबकुछ ऐसे ही चलता रहा तो आने वाले दिनों में न तो जंगल रहेंगे और न उसमें रहने वाले जानवर। फिर न कोई तेंदुआ रिहायशी इलाके का रुख करेगा, फिर न कोई बाघ आदमखोर घोषित किया जाएगा। अब ये हमें सोचना है कि हम कैसा कल चाहते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-8861911101000362327?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/8861911101000362327/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=8861911101000362327' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/8861911101000362327'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/8861911101000362327'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='एक तेंदुए का एनकाउंटर'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-1052556906652786316</id><published>2010-12-26T22:41:00.001-08:00</published><updated>2010-12-26T22:41:40.356-08:00</updated><title type='text'>सचिन की आलोचना और आलोचकों का तर्क</title><content type='html'>नीरज नैयर&lt;br /&gt;सचिन तेंदुलकर एक ऐसा नाम है जिसके साथ तारीफों से यादा आलोचनाएं जुड़ती रहीं। सचिन जैसे-जैसे सफलता के शिखर पर चढ़ते गए आलोचना करने वालों के मुंह और चौड़े होते गए। अभी हाल ही में जब इस लिटिल मास्टर ने टेस्ट मैचों में शतकों का पचासा पूरा किया तब भी आलोचना करने वालों के मुंह बंद नहीं हुए। इस बार भी तर्क वहीं पुराना था, सचिन महज रिकॉर्ड के लिए खेलते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि टीम इंडिया को दक्षिण अफ्रीका से पहले टेस्ट में पारी और 25 रनों से हार का सामना करना पड़ा। हालांकि टीम में 10 खिलाड़ी और भी थे,  लेकिन उनके चलने न चलने पर किसी ने सवाल नहीं उठाया। वैसे सचिन पर सवाल उठाना उनकी विश्वसनीयता को और पुख्ता करता है। जिससे सबसे यादा उम्मीदें होती हैं, उसी से करिश्मे अपेक्षाएं की जाती हैं। मगर इसका ये मतलब नहीं होना चाहिए कि अपेक्षाओं के पूरा न होने की स्थिति में क्षमताओं पर ही संदेह प्रकट किया जाए। सचिन तेंदुलकर के हजारों-करोड़ों प्रशंसकों के साथ ऐसे लोगों की जमात भी कम नहीं है जो हर पल सवाल उठाते हैं कि सचिन अहम मौकों पर क्यों असफल हो जाते हैं। दरअसल सचिन आम इंसान न रहकर लोगों के लिए रन बनाने की मशीन बन गए हैं, और जब इस मशीन के बल्ले से रन नहीं निकलते तो आलोचनाओं का दौर शुरू हो जाता है। हालांकि आलोचना करने वालों के पास अपनी बातों को सही साबित करने का कोई ठोस आधार नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चंद मौकों को छोड़ दिया जाए तो क्रिकेट की दुनिया ये भगवान हर मोड़ पर अपनी श्रेष्ठता सिध्द करता आया है। जो लोग ये बोलते हैं कि  सचिन अहम मुकाबलों में कोई कमाल नहीं कर पाते, वो शायद इतिहास से अंजान है या फिर जानबूझ कर अंजान बने बैठे हैं। 1990-91 का एशिया कप, 1994-95 की विल्स वर्ल्ड सीरिज, 1997-1998 का कोका कोला कप, सिंगर-अकाई कप, इंडिपेंडस कप, 1998-99 की चैम्पियन्स ट्रॉफी,  2007-08 में खेली गई सीबी ट्राई सीरिज, कॉम्पैक कप और टाइटन कप के फाइनल में सचिन के शानदार प्रदर्शन को कैसे भूला जा सकता है। कोका कोला कप में तेंदुलकर ने 131 गेंदों में 134 रनों की पारी खेली थी, ऐसे ही अकाई कप में 128, चैम्पियंस ट्रॉफी में 121, सीबी ट्राई सीरिज में 117, कॉम्पैक कप में 138, इंडिपेंडस कप में 95, टाइटप कप में 67, विल्स सीरिज में 66 रन और एशिया कप के फाइनल में 70 गेंदों में 53 रन बनाए थे। कुछ ऐसे ही 1998 में खेले गए मिनी वर्ल्ड कप के क्वार्टर फाइनल में सचिन ने ऑस्ट्रेलिया के विरुध्द 141 रन और पांच विकेट लेकर टीम को जीत दिलाई थी। क्रिकेट देखने वाले हर शख्स को धूल भरी आंधी के बीच शारजहां कप का वो मैच जरूर याद होगा जिसमें तेंदुलकर ने 131 गेंदों में 141 रनों की तूफानी पारी खेलकर अपने बूते भारत को फाइनल में पहुंचाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मैच का सबसे अफसोसजनक हिस्सा था सचिन का आऊट होना, अफसोसजनक इसलिए क्योंकि लिटिल मास्टर के पवेलियन लौटने के बाद टीम के बाकी खिलाड़ी जीत के लिए चंद रन भी नहीं जुटा सके। इस मैच में सचिन को गिलक्रिस्ट ने विकेटों के पीछे लपका, लेकिन उन्होंने खुद ने इसकी अपील नहीं की और न ही अंपायर ने उन्हें आऊट दिया फिर भी खेल भावना का परिचय देते हुए सचिन स्वयं चले गए। यहां गौर करने वाली बात ये है कि अगर वो महज रिकॉर्ड के लिए खेलते तो क्या ऐसा कर पाते, जबकि वो 150 से महज 9 कदम दूर थे। 1999 में पाकिस्तान के खिलाफ टेस्ट मैच में सचिन ने कमर पर बर्फ का बैग लागाकर और दवाईयां खाकर मोर्चा संभाला, लेकिन जब वो आऊट हुए तो उनकी जमकर आलोचना की गई। क्योंकि हमारे दूसरे खिलाड़ी बचे हुए 16 रन भी नहीं बना सके। इसी तरह 2007 में वेस्टइंडीज के साथ मैच में 85 पर होने के बाद भी सचिन धोनी को स्ट्राइक देते रहे और आखिरी गेंद पर अपना शतक पूरा किया। क्या इतने सब के बाद भी कहा जा सकता है कि सचिन अहम मौकों पर असफल रहे या वो टीम के बजाए महज अपने रिकॉर्ड बनाने के लिए खेले। किसी गलती पर आलोचना करने में कोई बुराई नहीं है लेकिन हर बात पर आलोचना एक तरह की बीमारी है। और भारत जहां क्रिकेट को धर्म के रूप में देखा जाता है, इस बीमारी से पीड़ितों की कोई कमी नहीं है। सचिन को अगर क्रिकेट का भगवान कहा जाता है तो इसके पीछे सिर्फ उनके रिकॉर्ड ही नहीं मैदान के अंदर और बाहर सौम्य, विनम्र एवं मृदुभाषी व्यक्ति की छवि भी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बात जो हर इंसान को उनसे सीखने की जरूरत है वो ये कि सचिन चुनौती और आलोचनाओं का जवाब मुंह से नहीं बल्कि अपने बल्ले से देना पसंद करते है। उनके प्रदर्शन के आगे कोई भी आलोचना यादा देर तक नहीं टिक सकती। बीच में एक वक्त ऐसा भी आया जब अलोचकों ने उन्हें क्रिकेट से सन्यास लेने तक का मशवरा दे डाला, लेकिन सचिन ने बिना बोले इन सबका का जवाब बेहतरीन अंजाद में दिया। सचिन में एक अजीब सी जीवटता है जो उन्हें दूसरों के अलग बनाती है, और शायद उनकी सफलता की वजह है। सचिन आज भी जब क्रीज पर उतरते हैं तो उनके लिए व्यक्तिगत रिकॉर्ड से यादा तिरंगे की शान बनाए रखना यादा मायने रखता है। वो सचिन तेंदुलकर ही थे जिन्होंने अपने व्यक्तिगत दर्द को दरकिनार करते हुए पिछले विश्व कप में भारत की झोली में कई जीतें डाली। अगर सचिन महज अपने लिए खेलते तो पितृशोक की खबर सुनने के बाद विश्व कप छोड़कर भारत लौट आते। मुझे और मेरे जैसे बहुत से लोगों को सचिन और उनका खेल पसंद है, लेकिन इसे अंधभक्ति नहीं कहा जा सकता। सचिन आज जिस मुकाम पर हैं वो उन्होंने खुद ही हासिल किया है, उन्हें यदि क्रिकेट का भगवान कहा जाता है तो वो जगह उन्होंने कई साल मैदान पर पसीना बहाकर कमाई है। क्रिकेट की दुनिया में भारत ने जो ऊंचाईयां छुई हैं उनमें सचिन का योगदान सबसे यादा है। सचिन रमेश तेंदुलकर की आलोचना करने वाले आखिर कैसे इन तथ्यों को नजरअंदाज कर सकते हैं, कैसे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-1052556906652786316?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/1052556906652786316/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=1052556906652786316' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/1052556906652786316'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/1052556906652786316'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2010/12/blog-post_26.html' title='सचिन की आलोचना और आलोचकों का तर्क'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-5659359378731834198</id><published>2010-12-14T21:28:00.001-08:00</published><updated>2010-12-14T21:29:23.994-08:00</updated><title type='text'>जांच क्या कि हंगामा हो गया</title><content type='html'>नीजर नैयर&lt;br /&gt;अमेरिकी हवाई अड्डे पर भारतीय राजदूत मीरा शंकर की तलाशी क्या हुई दिल्ली में बैठे राजनीतिक दलों को हो-हल्ला मचाने का मौका मिल गया। भाजपा ने तो लगे हाथ रैली भी निकाल डाली। सियासी पार्टियां इस मुद्दे पर भी सरकार को घेर रही हैं, जैसे सरकार ने खुद अमेरिकी अधिकारियों से कहा हो कि मीरा की तलाशी ली जाए। हां, वो इस बात पर जरूर सरकार को घेर सकती हैं कि केंद्र सरकार अमेरिका से किस लहजे में नाराजगी व्यक्त करती है। वैसे प्रकरण के सामने आने के तुरंत बाद विदेशमंत्रालय ने थोड़ी बहुत गर्जना जरूर की, और इसका त्वरित असर भी देखने को मिला। अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने स्वयं खेद व्यक्त करते हुए भरोसा दिलाया कि इस घटना की पुर्नवृत्ति नहीं होगी। हालांकि, अमेरिका ने ये भी साफ किया कि जो कुछ भी हुआ वो कानून के मुताबिक हुआ। अमेरिका के ट्रांसपोर्ट सिक्यूरिटी असोसिएशन (टीएसए)के तहत राजनयिकों को तलाशी में छूट नहीं दी जाती। दरअसल मीरा शंकर ने भारतीय पारंपरिक परिधान यानी साड़ी पहनी हुई थी, और टीएसए के मुताबिक तलाशी के कारणों में ढेर सारे कपड़े पहनना भी शामिल है। अब ऐसे देखा जाए तो साड़ी और बुर्के में फर्क केवल इतना ही है कि एक में चेहरा दिखता है और दूसरे में नहीं। मीरा शंकर के साथ जो गलत हुआ वो ये कि राजनयिक जैसे ओदे पर होने के बाद भी पारदर्शी बाक्स में ले जाकर उनकी हाथों से तलाशी ली गई। जबकि एयरपोर्ट अधिकारियों को दिए दिशा-निर्देशों में यह साफ किया गया है कि यदि कोई यात्री सबके सामने तलाशी नहीं देना चाहता तो उसकी जांच गोपनीय तौर पर होनी चाहिए। मीरा कुमार के साथ दूसरे कुछ अधिकारी भी, लेकिन उन्हें भी अनसुना कर दिया गया। वैसे ये कोई पहला मौका नहीं, जब अमेरिका में उच्च दर्जा प्राप्त भारतीयों को इस तरह की जांच से गुजरना पड़ा हो। पिछले साल बॉलिवुड स्टार शाहरुख खान को न्यूयार्क के लिबर्टी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सिर्फ इसलिए रोककर पूछताछ की गई, क्योंकि उनके नाम के आगे खान जुड़ा था। इसी साल नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल से शिकागो के ओ हेयर अड्डे पर पूछताछ की गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इस पूछताछ की वजह इतनी थी उनका नाम और जन्मतिथि उस शख्स से मेल खा रही थी, जो अमेरिका की वॉच लिस्ट में था। इससे पीछे चलें तो राजग सरकार में रक्षामंत्री रहे जार्ज फर्नांडीस को भी अमेरिकी एयरपोर्ट पर तलाशी से गुजरना पड़ा था, और जैसा मुझे याद है उनके तो कपड़े उतरवाकर तलाशी ली गई थी। वो घटना निश्चित तौर पर अप्रत्याशित और चौंकाने वाली थी, एक रक्षामंत्री के साथ इस तरह का व्यावहार करना कहीं से उचित नहीं माना जा सकता। लेकिन इसके बाद की जो घटनाएं हैं, उन पर इतना हो-हल्ला मचाना बिल्कुल ही जायज नहीं लगता। शाहरुख खान को बेशक भारत में स्पेशल ट्रीटमेंट दिया जाता हो, उन्हेंसुरक्षा जांच जैसे झंझटों से मुक्त रखा जाता हो मगर दूसरे मुल्कों से तो ये अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वो भी वैसे ट्रीटमेंट दें। बॉलीवुड स्टार के लिए अमेरिका अपने सुरक्षा नियमों में तो बदलाव नहीं कर सकता। 911 के बाद अमेरिकी बहुत यादा सतर्क हो गए हैं, इसमें कोई दोराय नहीं कि इस सतर्कता से अमेरिकी आवाम को भी कई बार परेशानी का सामना करना पड़ता है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि उस एक आतंकी हमले के बाद दहशतगर्द अमेरिका की तरफ आंख उठाने तक ही हिमाकत नहीं कर पाए हैं। अमेरिका पर हमला करने वाले अल कायदा के आतंकवादी थे, जो मूलरूप से मुसलमान थे। इसलिए अगर किसी नाम के आगे खान जुड़ा देखकर वो अति सतर्क हो जाते हैं तो इस पर बवाल मचाने वाली क्या बात है। शाहरुख खान यदि इस घटना को सामान्य तौर पर लेते तो इतना हंगामा मचता ही नहीं। इसी तरह प्रफुल्ल पटेल की बात करें तो, वो गलतफहमी का शिकार हुए। अगर उनका नाम और जन्मतिथी किसी वांछित अपराधी से मेल खाता है और जांच अधिकारियों ने उनसे कुछ सवालात पूछ लिए तो मुझे नहीं लगता कि इसमें अपमान जैसी कोई बात है। उल्टा हमें इससे सीख लेना चाहिए कि अमेरिकी अधिकारी सुरक्षा के मुद्दे पर रुतबे के दबाव में नहीं आते। अब सवाल करने वाले पूछ सकते हैं कि क्या अमेरिकी नेताओं के साथ भी होता होगा, इसका जवाब काफी हद तक हां में है। अमेरिका में जिन लोगों को सुरक्षा जांच में छूट मिली है उनकी फेहरिस्त हमारी तरह इतनी लंबी नहीं है। हमारे यहां तो एक अदना सा नेता भी रुबाब झाड़ने से पीछे नहीं हटता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी बात अपने देश के नेताओं को सब पहचानते हैं, अगर अमेरिकी अधिकारी अपने अफसरान को कुछ रियायत देते भी हैं तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता। कायदे में होना यही चाहिए कि जब आम आदमी को सुरक्षा के झंझावत से गुजरना पड़ता है तो वीवीआई भी इंसान ही हैं। और वैसे भी सुरक्षा नियम सबको सुरक्षित रखने के लिए ही बनाए जाते हैं। भारतीयों में समस्या ये है कि ऊंचे पद पर पहुंचने के साथ ही उनका अहम ऊंचा उठने लगता है। भारत में उन्हें सुविधाएं मिलती हैं उनके वो आदी हो जाते हैं और जब उनसे आम इंसान की तरह व्यवहार किया जाता है तो उनके अहम को चोट लग जाती है। बड़क्पपन जैसी कोई चीज हमारे अंदर बची ही नहीं है, हमारे नेताओं को अभिनेताओं को कम से कम इस मामले में तो अमेरिकियों का कायल होना चाहिए कि उनकी प्राथमिकता में राष्ट्र सुरक्षा सबसे पहले है। इस मामले में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का कोई जवाब नहीं, गत साल इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर अमेरिका की काँटिनेंटल एयरलाइंस के अधिकारियों ने  कलाम साहब को जहाज में सवार होने से पहले पूरी सुरक्षा जांच से गुजारा। जबकि प्रोटोकाल के तहत भारत में उन्हें इस तरह की जांच से छूट मिली हुई है। इसके पीछे एयरलाइंस का तर्क था कि उन्हें आदेश हैं कि किसी को भी बिना तलाशी के सवार न होने दिया जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तलाशी को लेकर एयरपोर्ट से संसद तक बहुत बवाल मचा, कई सांसदों ने तो उस एयरलाइंस का लाइसेंस तक रद्द करने की सिफारिश कर डाली। लेकिन कलाम साहब ने अपने मुंह से ऊफ तक नहीं किया। यह घटना 24 अप्रैल की थी, जबकि इसका खुलासा जुलाई में हुआ और वो किसी तीसरे ने इस पर प्रकाश डाला कलाम साहब ने नहीं। अफसोस की बात है कि हमारे नेता पूर्व राष्ट्रपति तक से प्रेरण नहीं ले सके। मीरा शंकर की जगह अगर अब्दुल कलाम होते तो गुस्से में ये नहीं बोलते कि अब यहां नहीं आएंगे। निश्चित तौर पर हर व्यक्ति एक जैसा नहीं हो सकता, लेकिन किसी दूसरे के अच्छे गुणों को तो ग्रहण किया ही जा सकता है। मीरा शंकर के मामले में जो गलत है केवल उसी पर विरोध जताया जाना चाहिए। सुरक्षा जांच से गुजरने में कोई बडा व्यक्ति छोटा नहीं हो जाता। सच कहा जाए तो हम भारतीयों को हर छोटी बात को खींचकर बड़ा करने की बीमारी है, फिर चाहे वही उच्च पदों पर आसीन व्यक्ति हो या आम आदमी। जब तक हम जरूरी और गैर जरूरी में फर्क करना नहीं सीख लेते इस तरह की घटनाओं पर हो-हल्ला करते रहेंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ण ण&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-5659359378731834198?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/5659359378731834198/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=5659359378731834198' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/5659359378731834198'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/5659359378731834198'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2010/12/blog-post_4051.html' title='जांच क्या कि हंगामा हो गया'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-7285601635408976113</id><published>2010-12-14T21:28:00.000-08:00</published><updated>2010-12-14T21:29:18.834-08:00</updated><title type='text'>जांच क्या कि हंगामा हो गया</title><content type='html'>नीजर नैयर&lt;br /&gt;अमेरिकी हवाई अड्डे पर भारतीय राजदूत मीरा शंकर की तलाशी क्या हुई दिल्ली में बैठे राजनीतिक दलों को हो-हल्ला मचाने का मौका मिल गया। भाजपा ने तो लगे हाथ रैली भी निकाल डाली। सियासी पार्टियां इस मुद्दे पर भी सरकार को घेर रही हैं, जैसे सरकार ने खुद अमेरिकी अधिकारियों से कहा हो कि मीरा की तलाशी ली जाए। हां, वो इस बात पर जरूर सरकार को घेर सकती हैं कि केंद्र सरकार अमेरिका से किस लहजे में नाराजगी व्यक्त करती है। वैसे प्रकरण के सामने आने के तुरंत बाद विदेशमंत्रालय ने थोड़ी बहुत गर्जना जरूर की, और इसका त्वरित असर भी देखने को मिला। अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने स्वयं खेद व्यक्त करते हुए भरोसा दिलाया कि इस घटना की पुर्नवृत्ति नहीं होगी। हालांकि, अमेरिका ने ये भी साफ किया कि जो कुछ भी हुआ वो कानून के मुताबिक हुआ। अमेरिका के ट्रांसपोर्ट सिक्यूरिटी असोसिएशन (टीएसए)के तहत राजनयिकों को तलाशी में छूट नहीं दी जाती। दरअसल मीरा शंकर ने भारतीय पारंपरिक परिधान यानी साड़ी पहनी हुई थी, और टीएसए के मुताबिक तलाशी के कारणों में ढेर सारे कपड़े पहनना भी शामिल है। अब ऐसे देखा जाए तो साड़ी और बुर्के में फर्क केवल इतना ही है कि एक में चेहरा दिखता है और दूसरे में नहीं। मीरा शंकर के साथ जो गलत हुआ वो ये कि राजनयिक जैसे ओदे पर होने के बाद भी पारदर्शी बाक्स में ले जाकर उनकी हाथों से तलाशी ली गई। जबकि एयरपोर्ट अधिकारियों को दिए दिशा-निर्देशों में यह साफ किया गया है कि यदि कोई यात्री सबके सामने तलाशी नहीं देना चाहता तो उसकी जांच गोपनीय तौर पर होनी चाहिए। मीरा कुमार के साथ दूसरे कुछ अधिकारी भी, लेकिन उन्हें भी अनसुना कर दिया गया। वैसे ये कोई पहला मौका नहीं, जब अमेरिका में उच्च दर्जा प्राप्त भारतीयों को इस तरह की जांच से गुजरना पड़ा हो। पिछले साल बॉलिवुड स्टार शाहरुख खान को न्यूयार्क के लिबर्टी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सिर्फ इसलिए रोककर पूछताछ की गई, क्योंकि उनके नाम के आगे खान जुड़ा था। इसी साल नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल से शिकागो के ओ हेयर अड्डे पर पूछताछ की गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इस पूछताछ की वजह इतनी थी उनका नाम और जन्मतिथि उस शख्स से मेल खा रही थी, जो अमेरिका की वॉच लिस्ट में था। इससे पीछे चलें तो राजग सरकार में रक्षामंत्री रहे जार्ज फर्नांडीस को भी अमेरिकी एयरपोर्ट पर तलाशी से गुजरना पड़ा था, और जैसा मुझे याद है उनके तो कपड़े उतरवाकर तलाशी ली गई थी। वो घटना निश्चित तौर पर अप्रत्याशित और चौंकाने वाली थी, एक रक्षामंत्री के साथ इस तरह का व्यावहार करना कहीं से उचित नहीं माना जा सकता। लेकिन इसके बाद की जो घटनाएं हैं, उन पर इतना हो-हल्ला मचाना बिल्कुल ही जायज नहीं लगता। शाहरुख खान को बेशक भारत में स्पेशल ट्रीटमेंट दिया जाता हो, उन्हेंसुरक्षा जांच जैसे झंझटों से मुक्त रखा जाता हो मगर दूसरे मुल्कों से तो ये अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वो भी वैसे ट्रीटमेंट दें। बॉलीवुड स्टार के लिए अमेरिका अपने सुरक्षा नियमों में तो बदलाव नहीं कर सकता। 911 के बाद अमेरिकी बहुत यादा सतर्क हो गए हैं, इसमें कोई दोराय नहीं कि इस सतर्कता से अमेरिकी आवाम को भी कई बार परेशानी का सामना करना पड़ता है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि उस एक आतंकी हमले के बाद दहशतगर्द अमेरिका की तरफ आंख उठाने तक ही हिमाकत नहीं कर पाए हैं। अमेरिका पर हमला करने वाले अल कायदा के आतंकवादी थे, जो मूलरूप से मुसलमान थे। इसलिए अगर किसी नाम के आगे खान जुड़ा देखकर वो अति सतर्क हो जाते हैं तो इस पर बवाल मचाने वाली क्या बात है। शाहरुख खान यदि इस घटना को सामान्य तौर पर लेते तो इतना हंगामा मचता ही नहीं। इसी तरह प्रफुल्ल पटेल की बात करें तो, वो गलतफहमी का शिकार हुए। अगर उनका नाम और जन्मतिथी किसी वांछित अपराधी से मेल खाता है और जांच अधिकारियों ने उनसे कुछ सवालात पूछ लिए तो मुझे नहीं लगता कि इसमें अपमान जैसी कोई बात है। उल्टा हमें इससे सीख लेना चाहिए कि अमेरिकी अधिकारी सुरक्षा के मुद्दे पर रुतबे के दबाव में नहीं आते। अब सवाल करने वाले पूछ सकते हैं कि क्या अमेरिकी नेताओं के साथ भी होता होगा, इसका जवाब काफी हद तक हां में है। अमेरिका में जिन लोगों को सुरक्षा जांच में छूट मिली है उनकी फेहरिस्त हमारी तरह इतनी लंबी नहीं है। हमारे यहां तो एक अदना सा नेता भी रुबाब झाड़ने से पीछे नहीं हटता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी बात अपने देश के नेताओं को सब पहचानते हैं, अगर अमेरिकी अधिकारी अपने अफसरान को कुछ रियायत देते भी हैं तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता। कायदे में होना यही चाहिए कि जब आम आदमी को सुरक्षा के झंझावत से गुजरना पड़ता है तो वीवीआई भी इंसान ही हैं। और वैसे भी सुरक्षा नियम सबको सुरक्षित रखने के लिए ही बनाए जाते हैं। भारतीयों में समस्या ये है कि ऊंचे पद पर पहुंचने के साथ ही उनका अहम ऊंचा उठने लगता है। भारत में उन्हें सुविधाएं मिलती हैं उनके वो आदी हो जाते हैं और जब उनसे आम इंसान की तरह व्यवहार किया जाता है तो उनके अहम को चोट लग जाती है। बड़क्पपन जैसी कोई चीज हमारे अंदर बची ही नहीं है, हमारे नेताओं को अभिनेताओं को कम से कम इस मामले में तो अमेरिकियों का कायल होना चाहिए कि उनकी प्राथमिकता में राष्ट्र सुरक्षा सबसे पहले है। इस मामले में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का कोई जवाब नहीं, गत साल इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर अमेरिका की काँटिनेंटल एयरलाइंस के अधिकारियों ने  कलाम साहब को जहाज में सवार होने से पहले पूरी सुरक्षा जांच से गुजारा। जबकि प्रोटोकाल के तहत भारत में उन्हें इस तरह की जांच से छूट मिली हुई है। इसके पीछे एयरलाइंस का तर्क था कि उन्हें आदेश हैं कि किसी को भी बिना तलाशी के सवार न होने दिया जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तलाशी को लेकर एयरपोर्ट से संसद तक बहुत बवाल मचा, कई सांसदों ने तो उस एयरलाइंस का लाइसेंस तक रद्द करने की सिफारिश कर डाली। लेकिन कलाम साहब ने अपने मुंह से ऊफ तक नहीं किया। यह घटना 24 अप्रैल की थी, जबकि इसका खुलासा जुलाई में हुआ और वो किसी तीसरे ने इस पर प्रकाश डाला कलाम साहब ने नहीं। अफसोस की बात है कि हमारे नेता पूर्व राष्ट्रपति तक से प्रेरण नहीं ले सके। मीरा शंकर की जगह अगर अब्दुल कलाम होते तो गुस्से में ये नहीं बोलते कि अब यहां नहीं आएंगे। निश्चित तौर पर हर व्यक्ति एक जैसा नहीं हो सकता, लेकिन किसी दूसरे के अच्छे गुणों को तो ग्रहण किया ही जा सकता है। मीरा शंकर के मामले में जो गलत है केवल उसी पर विरोध जताया जाना चाहिए। सुरक्षा जांच से गुजरने में कोई बडा व्यक्ति छोटा नहीं हो जाता। सच कहा जाए तो हम भारतीयों को हर छोटी बात को खींचकर बड़ा करने की बीमारी है, फिर चाहे वही उच्च पदों पर आसीन व्यक्ति हो या आम आदमी। जब तक हम जरूरी और गैर जरूरी में फर्क करना नहीं सीख लेते इस तरह की घटनाओं पर हो-हल्ला करते रहेंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ण ण&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-7285601635408976113?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/7285601635408976113/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=7285601635408976113' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/7285601635408976113'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/7285601635408976113'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2010/12/blog-post_14.html' title='जांच क्या कि हंगामा हो गया'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-6949712870440805936</id><published>2010-12-08T21:02:00.000-08:00</published><updated>2010-12-08T21:03:35.663-08:00</updated><title type='text'>जेपीसी पर हंगामे का औचित्य</title><content type='html'>नीरज नैयर&lt;br /&gt;आधुनिकता की सियासत ने राजनीति के मूल्य ही बदलकर रख दिए हैं। कभी गंभीर बहस और लोकहित के फैसलों के लिए पहचाने जाने वाले लोकतंत्र के मंदिर आज अखाड़े में तब्दील हो चुके हैं। बात चाहे संसद की हो या विधानसभाओं की सियासी पार्टियों को एक दूसरे को नीचा दिखाने की इससे मुफीद ागह कोई नहीं लगती। संसद का शीतकालीन सत्र सरकार और विपक्ष की नोंकझोंक की भेंट चढ़ा जा रहा है। जब तक ये लेख प्रकाशित होगा और कुछ दिन हंगामे पर कुर्बान हो चुके होंगे। शीतकालीन सत्र 9 नवंबर से शुरू हुआ था, लोकसभा में पहले दिन जरूर कुछ काम हुआ मगर रायसभा तो पहले दिन से ही नहीं चल पाई। मौजूदा स्थिति ये है कि सत्र समाप्त होने में चंद दिन ही बचे हैं और हंगामा चरम पर है। दरअसल विपक्ष स्पेक्ट्रम और दूसरे तमाम घोटालों की जांच संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी से कराने पर अड़ा है, लेकिन सरकार इसके सख्त खिलाफ है। सरकार का तर्क है कि जब जांच सीबीआई कर रही है तो फिर जेपीसी गठन का सवाल ही नहीं बनता। जेपीसी गठन का सवाल है या नहीं, सवाल ये नहीं है असल सवाल ये है कि आखिर इसको लेकर इतना बवाल क्यों मचाया जा रहा है। विपक्ष क्यों इतना उतारू है और सरकार क्यों इससे इतना बच रही है। ऐसा नहीं है कि इससे पहले कभी जेपीसी का गठन किया ही नहीं गया। संसदीय इतिहास में अब तक चार बार जेपीसी जांच हो चुकी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे पहले बोफोर्स कांड को लेकर विपक्ष के लगभग 45 दिनों तक संसद में हंगामे के परिणाम स्वरूप संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया गया था। इसके बाद हर्षद मेहता कांड की जांच जेपीसी से कराई गई, इस मामले में जेपीसी गठन के लिए 17 दिनों तक संसद में गतिरोध बरकरार रहा। केतन मेहता मामले में भी तकरीबन 14 दिनों के हंगामें के बाद जेपीसी जांच को मंजूरी मिल सकी। चौथी जेपीसी शीतलपेय पेप्सी-कोला में कीटनाशकों की रिपोर्ट आने के बाद सरकार ने गठित की। जेपीसी गठन दो तरह से किया जाता है, या तो एक सदन इसका प्रस्ताव रखे और दूसरा उस पर सहमति जताए। या फिर दोनों सदनों के अध्यक्ष आपस में मिलकर इसका फैसला लें। जेपीसी में कितने सदस्य होंगे इसके लिए कोई संख्या निर्धारित नहीं की गई है। हां, इतना जरूर है कि इस समिति में लोकसभा सदस्यों की संख्या रायसभा सदस्यों से दोगुनी होती है। यानी अगर रायसभा के 5 सदस्य समिति का हिस्सा हैं तो लोकसभा सदस्यों की संख्या 10 होगी। जेपीसी के पास जांच के पूरे अधिकार होते हैं, वो मामले की रिपोर्ट तलब कर सकती है। इस संबंध में पूछताछ के लिए सम्मन जारी कर सकती है, सम्मान की तामील न होने पर संबंधित व्यक्ति पर सदन की अवेहलना के तहत कार्रवाई कर सकती है। जेपीसी जांच में एक अच्छी बात सब यही है कि उसे अपनी कार्रवाई के लिए किसी अनुमति का इंतजार नहीं करना पड़ता। इसके अलावा शायद ही कोई फायदा होता हो, क्योंकि अगर होता तो एक न एक मामले में तो दोषियों को सजा मिल गई होती। बोफोर्स कांड में जेपीसी ने 26 अप्रैल 1986 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, लेकिन विपक्ष ने इसके विरोध में बायकॉट किया। कुल मिलाकर नतीजा रहा, सिफर। ऐसे ही हर्षद मेहता कांड में न तो जेपीसी की सारी सिफारिशों को ही माना गया और न ही सरकार ने उन्हें कार्यान्वित किया। कुछ इसी तरह केतन मेहता मामले में भी हुआ, 2002 में सौंपी गई जेपीसी रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। कोला-पेप्सी कांड की जांच के लिए शरद पवार की अध्यक्षता में बनाई गई संयुक्त जांच समिति ने चार फरवरी 2004 को सदन में रखी अपनी रिपोर्ट में शीतलपेय में कीटनाशकों की पुष्टि की मगर उसे सरकार ने कितनी गंभीरता से लिया सब जानते हैं। जेपीसी की सबसे बड़ी खामी ये है कि इसकी जांच सार्वजनिक नहीं होती, जबकि कई मुल्कों में इसमें पारदर्शिता बरती जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; विपक्ष में बैठे दल को जांच के लिए जेपीसी सबसे भरोसेमंद लगती है और सरकार हमेशा से इससे बचना चाहती है। यहां गौर करने वाली बात ये है कि क्या जेपीसी इतनी सक्षम होती है कि बड़े से बड़े घोटालों की पेचीदगी को समझ सके। जेपीसी में महज अलग-अलग दल के राजनीतिक लोगों का जमावड़ा होता है, और हमारी नेताओं की काबलियत जगजाहिर है। जो काम सीबीआई या दूसरी जांच एजेंसी के वो अधिकारी कर सकते हैं जिनका काम ही बड़े से बड़े घोटालों में सिर खपाना, क्या वो हमारे नेता कर सकते हैं। निश्चित तौर पर इसके यादातर जवाब नहीं में मिलेंगे। दरअसल जेपीसी के माध्यम से खुद को पाकसाफ बताने वाले दलों को आरोपों में घिरी पार्टी के अंदरूनी हालात का काफी अच्छे से जायजा लेने का मौका मिल जाता है। और ऐसे में आर्थिक और राजनीतिक हितों के सधने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। जेपीसी का अब तक का इतिहास बिल्कुल भी अच्छा नहीं रहा है तो फिर विपक्ष का इसके लिए अड़ियल रुख अख्तियार करना समझ से बाहर है, ऐसे ही सरकार का अपने फैसले पर अडिग हो जाना भी आश्चर्यचिकत करने वाला है। सरकार जेपीसी की कीमत पर संसद का कीमती वक्त बर्बाद करे जा रही है। सदन की कार्यवाही पर खर्च होने वाला एक-एक पैसा जनता की जेब से आता है, लेकिन सदन में हंगामा करने वालों को इससे कोई सरोकार नहीं। अच्छा होता अगर सरकार संयुक्त संसदीय समिति से जांच कराने की विपक्ष की मांग को मानकर जनता के सामने अच्छा उदाहरण पेश करती। मौजूदा वक्त में सदन की कार्यवाही बाधित करने के लिए जनता की नजरों में जितना दोषी विपक्ष है उतना ही सत्तापक्ष भी है। ऐसा लगता है जैसे विपक्ष और सरकार मिलकर अरबों के घोटालों का टैक्स जनता के वसूलने का मन बना चुके हैं। स्पेक्ट्रम आदि घोटालों में जितनी रकम जानी थी वो जा चुकी और सब जानते हैं कि दोषियों का बाल भी बांका होने वाला नहीं है, ऐसे जेपीसी को लेकर संसद में जारी गतिरोध जनता के लिए कोड़ में खाज के समान है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-6949712870440805936?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/6949712870440805936/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=6949712870440805936' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/6949712870440805936'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/6949712870440805936'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='जेपीसी पर हंगामे का औचित्य'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-3744507082489142171</id><published>2010-11-30T22:05:00.000-08:00</published><updated>2010-11-30T22:06:06.553-08:00</updated><title type='text'>बाघ बचाने के लिए इच्छाशक्ति की जरूरत</title><content type='html'>नीरज नैयर&lt;br /&gt;बाघों की घटती संख्या के बीच बाघ सरंक्षण की कोशिशें भी परवान चढ़ रही हैं। ऐसी कोशिशें सुखद अहसास तो कराती ही हैं साथ ही उम्मीद भी जगाती हैं कि शायद वाली पीढ़ी जंगल में विचरण करते बाघ का दीदार कर सकेगी। दुनिया भर में बाघ जितनी तेजी से गायब हुए हैं उतनी तेजी से तो शायद कुछ और गायब हो ही नहीं सकता। मौजूदा वक्त में खुले जंगल में रहने वाले बाघों की तादाद महज 3000 है, पिछले एक दशक में बाघों की संख्या में 40 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। सबसे यादा बाघ भारत में है, ताजा गणना के मुताबिक हमारे यहां 1400 के आसपास बाघ हैं। हालांकि चीन में बाघों की तादाद को दुनिया भर में सर्वाधिक कहा जा सकता है, लेकिन ये बाघ जंगलों के बजाए पिंजरों में कैद हैं। चीन में बाघ के अंगों की जबरदस्त मांग है, इसी मांग को पूरा करने के लिए फार्मिंग के उद्देश्य से बाघों को दबड़ों में भेज दिया गया। वैसे चीनी सरकार ने बाघों के अंगों से बने उत्पाद पर प्रतिबंध लगा रखा है, जिस वजह से फार्मिंग का धंधा लगभग बंद सा पड़ा हुआ है। लेकिन इस लॉबी के दबरदस्त दबाव के चलते सरकार प्रतिबंध हटाने पर गंभीरता से विचार कर रही है। अगर प्रतिबंध हटता है तो जंगलों में बचे-कुचे बाघ भी दुनिया छोड़ जाएंगे। भारत में हो रहे इस खूबसूरत प्राणी के सफाए में चीन की मांग का बहुत बड़ा हाथ है। दूसरी जगहों की अपेक्षा भारत में शिकारी यादा आसानी से अपने काम को अंजाम दे सकते हैं। शिथिल कानून, कमजोर तंत्र और गैरजिम्मेदाराना सरकारी रवैये की वजह से भारत शिकारियों के लिए स्वर्ग साबित हो रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वयं प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद भी हालात जस के तस हैं, कुछ बदला है तो बस फाइलें रखने वाली अलमारियों का आकार। प्रोजेक्ट टाइगर के नाम पर हर साल करोड़ों-अरबों फूंके जा रहे हैं, लेकिन सरंक्षण जैसी बात कहीं नजर नहीं आती। दूसरे मुल्कों में जहां बाघ बचे हैं वहां भी कमोबश यही स्थिति है, इसी स्थिति से निपटने के लिए रूस के शहर सेंट पीटर्सबर्ग में बीते दिनों एक बैठक आयोजित की गई। 13 देशों के प्रतिनिधियों ने इस बैठक में हिस्सा लिया, बैठक में मुख्य तौर पर बाघ के प्राकृतिक आवास को बचाने, शिकार को रोकने और बचाव अभियान को आर्थिक मदद मुहैया करवाने जैसे विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई। संभवत: ऐसा पहली बार हुआ है कि  विश्व के तमाम नेता एक प्रजाति को बचाने के लिए साथ आए। बाघ बचाने को लेकर इतनी सक्रीयता अच्छी बात है, लेकिन इस सक्रीयता के सार्थक परिणाम भी तो निकलने चाहिए। अमूमन बड़ी-बड़ी बैठकों में बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं पर वो धरातल पर नहीं उतर पाते। इस बैठक में चीन ने भी शिरकत की, चीन पर बाघ बचाओ अभियान में जुटे लोगों के लिए किसी खलनायक की तरह है। चीनी सरकार दावा करती है कि देश में बाघ अंगों और खाल के गैरकानूनी व्यापार पर लगी पाबंदी का पूरी तरह से पालन हो रहा है। लेकिन इस दावे की हकीकत कई बार सामने आ चुकी है। चीन में बाघ की खाल और अंग हासिल करना उतना ही आसान है, जितना भारत में ड्रग्स जैसे नशीले पदार्थ। चीन इस गैरकानूनी टे्रड का हब है, और ये सबकुछ सरकार के सरंक्षण में ही फल-फूल रहा है। चीनी आर्मी खुद बाघों की खाल और अंगों से बने उत्पाद की सबसे बड़ी उपभोक्ता है। कुछ साल पहले दलाई लामा के आव्हान के बाद जरूर तिब्बत में बाघों की खाल की उसी तरह होली जलाई गई थी जैसे स्वदेशी अपनाओ नारे के बाद भारत में विदेशी कपड़ों की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;णतिब्बतियों ने अपने धर्म गुरू की भावनाओं का आदर करते हुए बाघ से जुड़े उत्पादों का उपयोग पूर्णत: बंद कर दिया था, लेकिन अब सबकुछ पहले की माफिक हो गया है। तिब्बत में सालाना होने वाले पारंपरिक आयोजन में चीनी सैन्य अधिकारियों की मौजूदगी में तिब्बती बाघों की खालों को तन पर लपेटे देखने को मिल सकते हैं। चीन में बाघ की एक पूर्ण खाल की कीमत तकरीबन 20 हजार डॉलर है। इस ट्रेड से जुड़े व्यापारी, ग्राहकों को उनकी मनमुताबिक जगहों पर डिलेवरी तक ही सुविधा उपलब्ध कराते हैं। चीन में बाघ की खाल को शानौ-शौकत का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही धार्मिक लिहाज से भी चीनी और तिब्बती इनका उपयोग करते हैं। सबसे यादा फार्मेसी क्षेत्र में बाघ के अंगों का इस्तेमाल होता है, कामोत्तेजक दवाई के लिए बाघ की हड्डियां प्रयोग में लाई जाती हैं और चीन में इसका बहुत बड़ा बाजार है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की तरफ से चीनी सरकार को कई बार आईना दिखाया गया मगर उसने हालात बदलने के लिए कुछ नहीं किया। दरअसल बीजिंग  के लिए भी बाघों का गैरकानूनी व्यापार कमाई का बहुत बड़ा जरिया है, इसलिए वो इस पर प्रतिबंध का दिखावा तो कर सकता है पर पूर्णत: रोक नहीं लगा सकता। जहां तक बात भारत सरकार की है तो उसके पास इच्छाशक्ति का अभाव है। हमारे यहां नए-नए प्रोजेक्टों को फाइलों से हकीकत में आने बरसों लग जाते हैं। सरिस्का में बाघों के सफाए के बाद से अब तक कई योजनाएं बनाई गईं उनमें से कुछ परवान भी चढ़ी मगर बाघों को बचाने के लिए कुछ नहीं किया जा सका। बाघ सरंक्षण हमारे देश में एक तरह से पार्ट टाइम नौकरी के माफिक हो गया है, सरकार अपने आप को संवेदनशील साबित करने के लिए यह काम किए जा रही है और अधिकारीगण महज अपनी नौकरी बचाने के लिए। यही वजह है कि तमाम तामझाम के बाद भी बाघ बचने के बजाए तेजी से शिकारियों के हत्थे चढ़ते जा रहे हैं। और जो रही सही कसर है वो जंगल में बढ़ती मानवीय गतिविधियों की वजह से पूरी हो रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;णमानव बाघ संघर्ष के किस्से अब आम हो चले हैं। जंगलों का सिकुड़ना लगातार जारी है, भोजन-पानी की कम उपलब्धता के चलते बाघ आदि जंगली जानवरी बाहर की ओर रुख करते हैं और मनुष्य के हाथों मारे जाते हैं। बाघ सरंक्षण के लिए सरकार कागज पर लकीरें खींचने के अलावा कुछ नहीं कर पाई है। अगर कागजी कार्रवाई के अलावा कुछ भी किया गया होता तो परिणाम अब तक नजर आने लगते। कुल मिलाकर कहा जाए तो बाघों को बचाने के लिए बड़ी-बड़ी बैठकें करने के बजाए इच्छाशक्ति विकसित करने की जरूरत है। क्या भारत या दूसरे देश इतने भी सक्षम नहीं कि एक प्राणी की जान बचा सकें, बिल्कुल हैं लेकिन इच्छाशक्ति के अभाव के चलते सक्षमता भी नगण्य हो चली है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-3744507082489142171?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/3744507082489142171/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=3744507082489142171' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/3744507082489142171'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/3744507082489142171'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2010/11/blog-post_30.html' title='बाघ बचाने के लिए इच्छाशक्ति की जरूरत'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' 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तकनीकों के निर्यात पर लगी पाबंदी से मुक्ति का आश्वासन इसके अलावा पाकिस्तान को थोड़ी बहुत फटकार। कुल मिलाकर कहा जाए तो भारत की झोली में केवल आवश्वासन ही आए, जहां तक बात पाकिस्तान को कोसने की है तो उसमें भी ओबामा ने कंजूसी से काम लिया। उन्होंने आतंकवाद के मुद्दे पर पाक के खिलाफ महज उतना ही बोला जितना इस्लामाबाद आसानी से हजम कर सके। अमेरिकी राष्ट्रपति ने तो स्थिर और प्रगतिशील पाकिस्तान को भारत के हित में बता डाला। बकौल ओबामा पाक की स्थिरता सुनिश्चित करने में सबसे यादा दिलचस्पी किसी देश की हो सकती है तो वह भारत है। यदि पाकिस्तान अस्थिर है तो इसका सबसे अधिक नुकसान भारत को ही झेलना होता है। हालांकि  संसद को संबोधित करते वक्त उन्होंने जरूर पाकिस्तान के खिलाफ कुछ एक बातें कहीं लेकिन उनमें कड़े शब्दों के इस्तेमाल जैसी कोई बात नजर नहीं आई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुरक्षा परिषद में भारत की दावेदारी और तकनीकों के निर्यात पर प्रतिबंध हटाने जैसे मुद्दों पर अमल की कोई समय सीमा नहीं है। वैसे भी सुरक्षा परिषद का विस्तार हाल-फिलहाल तो होने वाला नहीं है, ओबामा खुद भी जानते हैं कि यह रास्ता बहुत टेढ़ा है। शायद इसलिए ही उन्होंने खुलेतौर पर भारत के समर्थन की बात कही। ओबामा ने एक तरह से बुरे दौर से उभरने के लिए भारत का इस्तेमाल किया। तेजी से आगे बढ़ता भारत दुनिया के नक्शे पर एक बिजनेस हब के रूप में उभरा है, चीन से लेकर अमेरिका तक सबकी रुचि नई दिल्ली के साथ यादा से यादा व्यापार बढ़ाने की है। ओबामा भी इसी एजेंडे के साथ भारत आए, उन्होंने अपने एक बयान में कहा भी कि जब मैं वापस जाऊं तो अपने लोगों को बता सकूं की मैं उनके लिए क्या लेकर आया हूं। अपने इस दौरे में ओबामा ने जो एक अच्छी बात करी वो ये कि उन्होंने कश्मीर पर कोई बेफिजुल की बयानबाजी नहीं की, लेकिन सिर्फ इसलिए ओबामा के भारत दौरे को एतिहासिक बता देना नासमझी से यादा कुछ नहीं। ओबामा ने दोनों हाथों से भारत से बटोरा और बदले में आश्वासन थमा गए, बावजूद इसके उनकी यात्रा को भारत के लिए अहम बताने वालों की कमी नहीं है। सरकार का ऐसा करना तो समझ में आता है, मगर मीडिया का ओबामा के प्रति दीवानापन समझ से परे है। अमेरिकी राष्ट्रपति के आने से लेकर जाने तक मीडिया ने उन्हें एक नायक के रूप में पेश किया, देश भर के अखबारात ऐतिहासिक दौरे की खोखली उपलब्धियों से भरे रहे। मसलन, एक प्रमुख हिंदी दैनिक की सुर्खी थी- ओबामा ने किया निहाल। अखबार ने लिखा कि ओबामा ने सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट और पाकिस्तान से आतंकवादी ठिकाने खत्म करने की पैरवी कर खुश किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संसद में अपने प्रभावशाली संबोधन से ओबामा ने भारतीयों का दिल जीता। ऐसे ही एक दूसरे अखबार ने जय हिंद, भारत को ओबामा का सलाम नामक शीर्षक से लिखा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने रिश्तों को नई ऊंचाई की राह खोल दी है। एक अंग्रेजी दैनिक ने ओबामा की तारीफों के पुल बांधते हुए लिखा कि ओबामा ने भारत की स्थाई सदस्या की मांग का समर्थन करके सबको अचंभित कर दिया। ऐसा लग रहा था कि ओबामा की उंगलियों पर अंबेडकर और चांदनी चौक जैसी जगहें थीं। भारतीय मीडिया की यही सबसे बड़ी कमजोरी और लाचारी है कि  वो भी अमेरिकी मेहमानों के सत्कार में सरकार की तरह पूरी तरह बिछ जाती है, उसे मुद्दों की गहराई में उतरने तक का ख्याल नहीं आता। शायद ही कोई ऐसा अखबार या टीवी चैनल रहा हो जिसने सरकार से ये पूछने की कोशिश की हो कि आखिर ओबामा के दौरे से भारत को सिवाए आश्वासनों के क्या मिला। पाकिस्तान और आतंकवाद पर ओबामा की अधखुली जुबान से साफ है कि ओबामा की नजर में नई दिल्ली से दोस्ती इस्लामाबाद की कीमत पर नहीं हो सकती। मुंबई हमलों के गुनाहगारों को सजा देने की बात करने वाले ओबामा अच्छे से जानते हैं कि पूरी साजिश पाकिस्तान में तैयार की गई। इसके बाद भी वो पाक पर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का दबाव नहीं बना सके। अमेरिका को अफगानिस्तान में बने रहने के लिए पाक का साथ चाहिए, मौजूदा वक्त में पाकिस्तान उसका सबसे बड़ा रणनीतिक साझेदार है। जहां तक भारत का सवाल है तो अमेरिका की नजर में वो केवल आर्थिक जरूरतों को पूरा करने का एक जरिया मात्र है। ओबामा भारत से 54 हजार नौकरियों की जुगाड़ तो कर गए लेकिन उन्होंने आउटसोर्सिंग जैसे मुद्दे पर एक शब्द भी नहीं बोला और न ही हमने उनसे बोलने के लिए कहा। मीडिया ने भी ओबामा की खुमारी में इसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। जबकि कुछ वक्त पहले तक यही मीडिया इस खबर को बढ़ाचढाकर दिखा रहा था। ओबामा की आउटसोर्सिंग विरोधी मुहिम के चलते भारतीय आईटी सेक्टर को काफी नुकसान झेलना पड़ा है। इसके अलावा पाकिस्तान को बदस्तूर जारी अमेरिकी मदद के मुद्दे पर भी भारतीय नेतृत्व कड़ी नाराजगी जाहिर करने में लगभग नाकाम रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओबामा भारत आने से ठीक पहले ही पाकिस्तान की जेब भरके आए थे। दरअसल भारत की हालत काफी हद तक उन बादलों की तरह है जो गरजते बहुत हैं मगर बरसते नहीं। भारत कई मौकों पर पाक को अमेरिकी रसद पर एतराज जता चुका है, लेकिन जब ओबामा के सामने बैठकर उन्हें सही-गलत का अहसास कराने का मौका आया तो हम महज मेहमाननवाजी में ही उलझे रहे। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, इससे पहले भी कई बार भारतीय नेतृत्व और मीडिया अमेरिका से आने वाले अतिथियों के सम्मान में मूल मुद्दाें को दरकिनार कर चुके हैं। अमेरिकी आते हैं, सम्मान करवाते हैं, भारतीयों को अच्छी लगने वाली कुछ बातें बोलते हैं और अपने के लिए मुनाफे के समझौते कर चलते बनते हैं। बराक हुसैन ओबामा का भारत दौरा अगर किसी के लिए ऐतिहासिक कहा जा सकता है तो सिर्फ और सिर्फ अमेरिका के लिए। भारत की झोली पहले भी खाली थी और अब भी खाली है। ओबामा की यात्रा को भारत के लिए ऐतिहासिक बताने वालों को दिमाग पर थोड़ा सा जोर डालकर जरा सोचने की जरूरत है कि  आखिर ओबामा भारत का आश्वासनों के सिवाए क्या देके गए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8665675729542464962-5038753638473270571?l=suchthetruth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://suchthetruth.blogspot.com/feeds/5038753638473270571/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8665675729542464962&amp;postID=5038753638473270571' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/5038753638473270571'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8665675729542464962/posts/default/5038753638473270571'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://suchthetruth.blogspot.com/2010/11/blog-post_27.html' title='ओबामा के दौरे से हमें क्या मिला?'/><author><name>Neeraj Nayyar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05458062628513031200</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_0MZ7cVscNfk/SGD_Nswg1pI/AAAAAAAAACw/Vm_9UfhXPP4/S220/just_thinking_time_we_spent_together.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8665675729542464962.post-5872715542172500686</id><published>2010-11-01T00:02:00.000-07:00</published><updated>2010-11-01T00:03:36.218-07:00</updated><title type='text'>ओबामा की यात्रा पर विशेष----हम भारतीय बहुत संतोषी हैं</title><content type='html'>नीरज नैयर&lt;br /&gt;अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा के भारत आने में बस कुछ ही दिन बचे हैं। उनके स्वागत से लेकर लगभग सारी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं, और जो कुछ-एक बची भी हैं वो उनके आने से पहले पूरी हो जाएंगी। ओबामा मुंबई के उसी होटल ताज में रुकेंगे जो पाकिस्तानी आतंकवादियों का निशाना बना था। शायद ये उनकी आतंकवाद के आगे न झुकने वाली सोच को प्रदर्शित करने का एक तरीका है। ओबामा की यात्रा के लिए मुंबई को खासतौर पर सजाया जा रहा है, ताज की खूबसूरती तो पहले से ही कमाल की है, फिर भी ओबामा को कहीं कोई कमी न दिख जाए इसका होटल प्रबंधन ने पूरा ख्याल रखा है। इसके साथ ही कभी न चमकने वाली सड़कों का सूरत-ए-हाल भी बदला जा रहा है। डिवाइडरों को गहरे पीले रंग से रंगा गया है, कि कहीं ओबामा हल्के कलर को देखकर मुंबईवासियों को हल्का न समझ बैठें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओबामा के स्वागत से लेकर सुरक्षा तैयारियों में सरकार ने पानी की तरह पैसा बहाया है। उनकी दिल्ली यात्रा के दौरान सुरक्षा के लिए दुनिया की सबसे अत्याधुनिक प्रणाली सी4आई तैनात की जाएगी। इसे लगभग 150 करोड क़ी लागत से इजरायल से मंगाया गया है। संभवत ये पहला मौका है जब भारत में किसी विदेशी अतिथि की सुरक्षा के लिए इसका इस्तेमाल हो रहा है। कुल मिलाकर अमेरिकी राष्ट्रपति की इस यात्रा को यादगार बनाने के लिए सबकुछ किया गया है। सरकार के साथ-साथ मीडिया भी इस दौरे को लेकर उत्साहित है, वैसे उसका उत्साहित होना इसलिए भी लाजमी है क्योंकि इसी मीडिया ने ओबामा की ताजपोशी को जंग जीतने जैसा पेश किया था। देखा जाए तो बराक ओबामा की भारत यात्रा नई दिल्ली के लिए दो मायनों में अहम है, पहली तो यही कि ओबामा अपने पहले कार्यकाल में भारत आ रहे हैं। जबकि बुश और बिल क्लिंटन सेकेंड टर्म में आए थे। दूसरी, ओबामा पहले ऐसे राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं जो भारत दौरे के साथ पाकिस्तान नहीं जाएंगे। इससे पहले जितने भी अमेरिकी प्रेसिडेंटों ने नई दिल्ली का रुख किया वो या तो वाया इस्लामाबाद किया या फिर बाद में पाकिस्तान गए। ओबामा के साथ मुलाकात में जिन मुद्दों पर चर्चा होगी उनमें परमाणु करार, द्विपक्षीय व्यापार, चीन, पाकिस्तान और संयुक्त राष्ट्र में स्थाई सदस्यता शामिल है। इनमें अमेरिकी पसंद के केवल दो ही मुद्दे हैं, परमाणु करार और व्यापार, बाकी भारत की चिंताओं और अपेक्षाओं से जुड़े हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जार्ज डब्लू बुश के कार्यकाल में भारत-अमेरिका के बीच हुईएटमी डील के पूरी तरह अमल में आने का तत्कालीक तौर पर सबसे बड़ा फायदा अगर किसी को होगा तो अमेरिका को। करार के रास्ते अमेरिकी कंपनियां भारत में करोड़ों-अरबों का व्यापार कर मोटा मुनाफा वसूल सकेंगी। ऐसी भी चर्चाएं हैं कि ओबामा कश्मीर पर कुछ फॉर्मूले सुझा सकते हैं, हालांकि अमेरिकी प्रशासन ने इससे इंकार किया है। वैसे कश्मीर पर ओबामा कुछ कहें इसकी संभावना इसलिए भी कम है क्योंकि उनका यह दौरा पूरी तरह से अमेरिकी फायदे पर केंद्रित है यानी करार से होने वाले मुनाफे पर। अमेरिकी प्रतिनिधियों की वैसे भी ये फितरत रही है कि भारत आने के बाद वो भारत को पसंद आने वाली बातें ही करते हैं। कुछ वक्त पहले अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने नई दिल्ली में खडे होकर पाकिस्तान के खिलाफ कुछ कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया, और बदले में करोड़ों के एंड यूजर समझौते को सील करवां गईं। ओबामा अपनी यात्रा में निश्चित तौर पर पाकिस्तान को लेकर भारत की चिंताओं पर गंभीरता दिखाएंगे, और ये भी हो सकता है कि वो भारतीय नेतृत्व के चेहरे खिलाने वाला कोई ऐसा बयान दे डालें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय बहुत ही संतोषी होते हैं, ओबामा के इतना भर करने से ही खुश हो जाएंगे और भूल जाए
